देश में विरोध-प्रदर्शनों और रैलियों के दौरान आम लोगों को होने वाली परेशानियों तथा आवश्यक सेवाओं में बाधा के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण रुख अपनाया है. अदालत ने इस संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताते हुए इसे पहले से लंबित जंतर-मंतर और प्रदर्शन स्थलों से जुड़े मामले के साथ टैग करने का निर्देश दिया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि कई बार प्रदर्शनों के कारण सड़कें बंद हो जाती हैं, जरूरी सेवाएं प्रभावित होती हैं और यह पहचानना भी मुश्किल हो जाता है कि प्रदर्शन में कौन शामिल है और कौन नहीं. अब सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर प्रदर्शन के अधिकार और आम जनता की सुविधा के बीच संतुलन पर विचार करेगा.
याचिकाकर्ता ने उठाई जरूरी सेवाओं की बाधा की चिंता
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि विभिन्न प्रदर्शनों और रैलियों के दौरान आम लोगों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों के कारण सड़कों पर आवागमन प्रभावित होता है और कई बार आवश्यक सेवाओं तक पहुंचने में भी कठिनाई होती है. इसके अलावा यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि मौके पर मौजूद लोग प्रदर्शनकारी हैं या सामान्य नागरिक.
सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामले के साथ जोड़ा
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि प्रदर्शन, धरना, रैली और सार्वजनिक जमावड़ों के लिए निर्धारित स्थानों से जुड़ा एक मामला पहले से अदालत में लंबित है. उन्होंने निर्देश दिया कि नई याचिका को उसी मामले के साथ जोड़ा जाए ताकि सभी संबंधित मुद्दों पर एक साथ विचार किया जा सके. हालांकि अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि इस तरह के मामलों में न्यायालय किस सीमा तक निर्देश जारी कर सकता है. इसके बावजूद पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करेगा. पहला, नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार और दूसरा, आम जनता की निर्बाध आवाजाही तथा आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता.
पहले भी कोर्ट ने दी थी अहम टिप्पणी
इससे पहले नीट पेपर लीक विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी भी तरह की अराजकता या आपराधिक गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा था कि यह नहीं माना जाना चाहिए कि कानून तोड़ने वाले तत्वों या अधिकारों का दुरुपयोग करने वालों को कोई छूट मिलेगी. अदालत ने यह भी कहा था कि न तो किसी पुलिस अधिकारी द्वारा की गई कथित ज्यादती को नजरअंदाज किया जाएगा और न ही प्रदर्शन की आड़ में शामिल आपराधिक तत्वों को बख्शा जाएगा.
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