- सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में फ्रीबीज देने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की तत्काल सुनवाई से फिलहाल इनकार किया है.
- CJI ने इस मुद्दे को अत्यंत महत्वपूर्ण और जनहित से जुड़ा बताते हुए तीन न्यायाधीशों की पीठ की आवश्यकता जताई.
- याचिकाकर्ता ने भारत पर बढ़ते कर्ज का जिक्र करते हुए बताया कि देश पर लगभग ₹250 लाख करोड़ का कर्ज है.
सुप्रीम कोर्ट में फ्रीबीज के खिलाफ PIL दाखिल हुई, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन तुरंत सुनवाई से इनकार किया. सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में मुफ्त सुविधाएं (फ्रीबीज़) देने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया. भाजपा नेता एवं वकील अश्विनी उपाध्याय ने अपनी लंबित याचिका का उल्लेख करते हुए कहा कि पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और अब 'सूरज और चांद छोड़कर सब कुछ' देने के वादे किए जा रहे हैं, जो भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आते हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण और जनहित से जुड़ा है तथा इसकी सुनवाई तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा की जानी चाहिए, हालांकि अदालत ने फिलहाल कोई तारीख देने से इनकार करते हुए कहा कि फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में फिर उल्लेख किया जाए, तब इस पर विचार किया जाएगा.
याचिकाकर्ता ने किया था भारत पर कर्ज का जिक्र
बता दें कि इससे पहले भी इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला आया था जिस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इसे “बहुत ही महत्वपूर्ण मामला” करार दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये ऐसा मुद्दा है जिस पर गंभीर विचार की जरूरत है.याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान देश पर बढ़ते कर्ज की ओर दिलाते हुए कहा था कि भारत पर वर्तमान में लगभग ₹250 लाख करोड़ का कर्ज है. इसी पर सीजेआई ने कहा था कि कुछ हद तक ये नीतिगत निर्णय का विषय हो सकता है, लेकिन यह भी विचार करने की जरूरत है कि क्या राज्य के राजस्व का एक हिस्सा केवल राज्य के विकास कार्यों के लिए सुरक्षित नहीं किया जाना चाहिए?
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CJI ने कहा था कि स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मुफ्त सुविधाएं संवैधानिक जिम्मेदारी के दायरे में
इस मामले में सीजेआई ने ये भी साफ किया यदि राज्य शिक्षा स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं मुफ्त में देता है तो उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी में आता है. ऐसे में राज्य अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहा होता है. इस पर वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने उदाहरण दिया कि कुछ राज्य महिलाओं को राज्य परिवहन की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देते हैं. इस पर सीजेआई ने कहा कि राज्य की संपदा का इस तरह वितरण करना होगा कि उसका इस्तेमाल कल्याणकारी योजनाओं में हो. ये एक ऐसा मुद्दा है जिस पर गंभीर विचार की जरूरत है. कोर्ट ने कहा कि वह ये तह करेंगे कि किन मामलों को बेंच के आगे सूचीबद्ध किया जाना चाहिए.
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