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'महिला है, सिलेंडर नहीं उठा पाएगी' कहकर IOC ने छीनी थी नौकरी, सुप्रीम कोर्ट ने लगाया ₹12 लाख का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने IOC को एक महिला उम्मीदवार को ₹12 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया है. मामला उस महिला से जुड़ा है, जिसे एलपीजी सिलेंडर उठाने की क्षमता को लेकर नौकरी देने से इंकार कर दिया गया था.

'महिला है, सिलेंडर नहीं उठा पाएगी' कहकर IOC ने छीनी थी नौकरी, सुप्रीम कोर्ट ने लगाया ₹12 लाख का जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) को एक महिला को ₹12 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया है. महिला को LPG बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर/कैजुअल खलासी के पद पर नियुक्ति से कथित तौर पर सिर्फ महिला होने के आधार पर वंचित किया गया था. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोलीकी पीठ ने इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि महिला को केवल इसलिए नौकरी से वंचित करना कि वह महिला है, महिला के सम्मान और गरिमा का अपमान है. पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा- आपने उनको  सिर्फ इसलिए नियुक्ति नहीं दी क्योंकि वह एक महिला है?  यह नारीत्व का अपमान है.

अदालत ने मुआवजा देने का दिया निर्देश

अदालत ने यह भी कहा कि महिलाएं अपने घरों में रोज LPG सिलेंडर उठाती और बदलती हैं. ऐसे में यह कहना कि महिला सिलेंडर उठाने वाला काम नहीं कर सकती, उचित नहीं है.  पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता अब सेवानिवृत्ति की उम्र प्राप्त कर चुकी है, लेकिन उसने इतने वर्षों तक अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी है. इसलिए अब नियुक्ति देने के बजाय अदालत ने एकमुश्त मुआवजा देना उचित समझा. 

याचिकाकर्ता पंजाब के गुड़ा गांव की निवासी थी. वह उन 49 लोगों में शामिल थी, जिनके नाम डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली स्थानीय समिति ने IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट में रोजगार के लिए सुझाए थे.  महिला ने कैजुअल खलासी/चपरासी/रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था. हालांकि, उसे नियुक्ति पत्र नहीं मिला, जबकि 43 अन्य उम्मीदवारों को नियुक्त कर लिया गया. 

ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि महिला निर्धारित योग्यता पूरी करती थी और एक बचाव पक्ष के गवाह की गवाही से यह सामने आया कि उसे महिला होने के कारण नियुक्ति नहीं दी गई.  ट्रायल कोर्ट ने उसे कैजुअल कर्मचारी/प्रशासनिक पद/चपरासी के पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था. 

SC से आया सुप्रीम फैसला

हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया. उसका कहना था कि महिला का नाम केवल सिफारिश के तौर पर था और उसका अंतिम चयन नहीं हुआ था.  इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा. 14 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने भी प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि महिला को नियुक्ति का कोई कानूनी या निहित अधिकार प्राप्त नहीं था.  अब सुप्रीम कोर्ट ने, महिला की सेवानिवृत्ति की उम्र और लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई को देखते हुए, नियुक्ति के बजाय ₹12 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

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