- राज्य बार काउंसिलों को दो सप्ताह में प्रतिनिधि चुनने का निर्देश.
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा - राज्य बार काउंसिलों की रिपोर्ट के बाद BCI के पुनर्गठन पर विचार करेंगे .
- पांच साल के कार्यकाल पर कोर्ट ने उठाए सवाल.
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कामकाज को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए. कोर्ट ने कहा कि जब तक नए सिरे से निर्वाचित बार काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन नहीं हो जाता, तब तक BCI के सभी महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के समक्ष रखा जाएगा और उन्हें संबंधित बैठकों में आमंत्रित किया जाएगा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह निर्देश दिया है.
राज्य बार काउंसिलों को दो सप्ताह में प्रतिनिधि चुनने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन राज्य बार काउंसिलों का नए सिरे से गठन हो चुका है, वे अपनी संरचना अधिसूचित होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर वैधानिक पदाधिकारियों का चुनाव करें और BCI के लिए अपने-अपने प्रतिनिधि का भी चुनाव करें. सभी राज्य बार काउंसिलों को इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी. इन रिपोर्टों के मिलने के बाद कोर्ट BCI के पुनर्गठन के मुद्दे पर विचार करेगा. मामले में BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को हटाने की मांग भी की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि BCI के नियमों के तहत चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल दो वर्ष का है, जबकि अप्रैल 2025 की अधिसूचना के जरिए इसे पांच वर्ष तक बढ़ाकर 2030 तक कर दिया गया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मिश्रा के खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया. कोर्ट ने फिलहाल राज्य बार काउंसिलों की चुनावी प्रक्रिया पूरी होने और उसके बाद BCI के पुनर्गठन पर ध्यान केंद्रित किया है.
पांच साल के कार्यकाल पर कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने 21 अप्रैल 2025 की उस अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें BCI चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल पांच साल तक किए जाने की बात कही गई है. इस पर जस्टिस बागची ने सवाल किया, “चेयरपर्सन का कार्यकाल पांच साल निर्धारित करने वाली अधिसूचना किस कानूनी प्रावधान के तहत जारी की गई?'' दीवान ने कहा कि BCI Rule 12(2) के तहत चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल केवल दो वर्ष है. इस पर कोर्ट ने भी टिप्पणी की कि यदि नियम दो साल का कार्यकाल निर्धारित करता है तो कोई अधिसूचना उसे कैसे बढ़ा सकती है.
CJI सूर्यकांत ने भी पांच साल के कार्यकाल और नियमों में निर्धारित दो साल की अवधि के बीच के अंतर पर सवाल उठाया. हालांकि, कोर्ट ने अभी इस अधिसूचना की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है. सुनवाई के दौरान BCI द्वारा बनाए गए PEARL Trust का मुद्दा भी उठा. वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने आरोप लगाया कि इस ट्रस्ट में कुछ व्यक्तियों को ऐसे स्थायी प्रबंध न्यासी बनाया गया है, जो BCI की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी ट्रस्टी बने रह सकते हैं.
इस पर कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि BCI एक निर्वाचित और बदलती हुई संस्था है, तो क्या उसके मौजूदा निर्वाचित सदस्य BCI की संपत्तियों से ऐसा ट्रस्ट बना सकते हैं जिसमें वे खुद स्थायी ट्रस्टी बने रहें? पीठ ने कहा कि यदि किसी पद के साथ ex-officio ट्रस्टीशिप जुड़ी है तो व्यक्ति के पद छोड़ने के साथ उसकी ट्रस्टी की भूमिका भी समाप्त हो सकती है. लेकिन किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से स्थायी ट्रस्टी बना देना अलग स्थिति है. याचिकाकर्ताओं की ओर से PEARL Trust और अन्य ट्रस्टों के कामकाज की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की गई है. फिलहाल, कोर्ट ने इस संबंध में कोई जांच समिति गठित करने का आदेश नहीं दिया है.
कोर्ट ने कहा- व्यक्ति नहीं, संस्था की जांच
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाकर कार्यवाही नहीं कर रहा है. उन्होंने कहा कि अदालत का ध्यान संस्था और उसके वैधानिक ढांचे पर है. कोर्ट की तत्काल प्राथमिकता राज्य बार काउंसिलों की बची हुई वैधानिक प्रक्रिया पूरी कराकर BCI का पुनर्गठन करना है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार अब तीन प्रमुख प्रक्रियाएं पूरी होनी हैं-
- राज्य बार काउंसिलों में आवश्यक Co-Option प्रक्रिया पूरी करना.
- नए राज्य बार काउंसिलों के पदाधिकारियों का चुनाव.
- प्रत्येक राज्य बार काउंसिल द्वारा BCI के लिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव.
इन प्रक्रियाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट BCI के पुनर्गठन पर विचार करेगा
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