- सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् के 2 या 6 पद को लेकर अहम सुनवाई हुई है.
- कोर्ट का कहना है कि 2 पद गाए जाएंगे या 6, यह तय करना सरकार का काम है, अदालत का नहीं.
- सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में केंद्र सरकार से 2 हफ्ते में जवाब तलब किया है.
वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है. जिसमें सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रगान क्या होगा या राष्ट्रीय गीत में कितने पद दो या छह होने चाहिए, यह तय करना अदालत का काम नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक सरकार का विषय है. हालांकि, अदालत इस सवाल की जांच करेगी कि वंदे मातरम् नहीं गाना दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिजॉय इमेनियुअल मामले में अदालत कानून स्पष्ट कर चुकी है कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान नहीं गाने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता और यह कानूनी स्थिति आज भी कायम है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा दंडात्मक कार्रवाई नहीं चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका सुनवाई करते यह बात कही है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई नागरिक अपने धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आवाज के कारण वंदे मातरम् गाने से गुरेज करता है, तो उस पर कोई आपराधिक मुकदमा या दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. बता दें कि कृष्णा ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में 2026 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है. इस संशोधन के जरिए राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी दंडात्मक संरक्षण दिए जाने को चुनौती दी गई है. इसके अलावा गृह मंत्रालय के उस निर्देश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह पद गाने की बात कही गई है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की है.
'बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य' का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस सवाल की जांच करेगा कि राष्ट्रीय गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है या नहीं. पीठ ने कहा कि 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो कानून घोषित किया था, वह अभी भी लागू है. अदालत ने उम्मीद जताई कि उस फैसले के सिद्धांत का पालन किया जाएगा और धार्मिक कारणों से राष्ट्रीय गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने पड़ेंगे.
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याचिकाकर्ता का तर्क
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका रखने वाले व्यक्ति या अंतरात्मा की आपत्ति रखने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए. पीठ ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् से जुड़ी राष्ट्रीय भावना या आकांक्षा क्या है, इसका फैसला करना अदालत का काम नहीं है. याचिका में वंदे मातरम् के अंतिम चार पदों को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इन पदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के संदर्भ हैं.
याचिकाकर्ता कृष्णा का तर्क है कि इन पदों को अनिवार्य रूप से गाने के लिए कहना नागरिकों को धार्मिक और वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए बाध्य करने जैसा है तथा यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के विपरीत है. वरिष्ठ वकील डॉ.एस. मुरलीधर, कृष्णा की तरफ से पेश हुए थे. उन्होंने कहा कि संशोधन में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि 'राष्ट्रीय गीत' से वास्तव में क्या अभिप्राय है उन्होंने यह भी दलील दी कि गृह मंत्रालय का कार्यालय ज्ञापन राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया है.
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