- SC ने अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के कुछ प्रावधानों के खिलाफ याचिका की सुनवाई से इनकार किया
- याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम की कई धाराओं को संविधान के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकारों का उल्लंघन बताया
- मुख्य चुनौती धारा 18-ए को दी गई, जिसमें FIR दर्ज करने से पहले जांच और गिरफ्तारी की अनुमति आवश्यक नहीं मानी गई
सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के कुछ प्रावधानों के खिलाफ अर्जी दाखिल की गई. इस जनहित याचिका में एक्ट के कई प्रावधानों को समानता के अधिकार के खिलाफ बताया गया और उनमें बदलाव की मांग हुई. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से ही इनकार कर दिया. बेंच ने कहा कि इस कानून को 2020 में तीन जजों की बेंच बरकरार रख चुकी है. इसके अलावा इस कानून में पहले से ही कई सेफगार्ड मौजूद हैं. इनके माध्यम से लोगों के हितों की रक्षा की जा सकती है, जिन्हें चिंता है कि गलत मुकदमा दर्ज हुआ है.
इस मामले में अर्जी दाखिल करने वालों का पक्ष रखते हुए वकील विष्णु जैन ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इसमें सजा की दर बहुत कम है, जबकि गलत केस पर करोड़ों मुआवजा भी दिया गया है. वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से बृजभूषण सैनी और 18 अन्य याचिकाकर्ताओं ने दायर याचिका में अधिनियम की धारा 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18-A और 19 को चुनौती दी थी. याचिका में दावा किया गया कि इन प्रावधानों में से कुछ संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 में दिए गए समानता, जीने एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा कानूनी प्रक्रिया के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस को एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी की प्रक्रिया के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की है. इस अर्जी मुख्य तौर पर धारा 18-A को लेकर चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान के तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति भी जरूरी नहीं है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और पुलिस को आरोपों की प्रारंभिक जांच के बिना कार्रवाई करनी पड़ सकती है.
अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने 2018 के संशोधन के जरिए धारा 18-A जोड़े जाने को सुप्रीम कोर्ट के 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले के संदर्भ में चुनौती दी है. उनका कहना है कि संसद ने न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों को प्रभावहीन करने के लिए यह प्रावधान बनाया. याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है. याचिका के अनुसार यह प्रावधान एससी/एसटी एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत के रास्ते को प्रतिबंधित करता है और इससे झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों के मामले में व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है.
अनुमान से जुड़े प्रावधानों पर भी जताई गई आपत्ति
इसी तरह धारा 8 में कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ अनुमान से जुड़े प्रावधानों को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के विरुद्ध बताया गया है. वहीं धारा 19 के तहत अधिनियम के तहत दोषसिद्ध मामलों में परिवीक्षा संबंधी राहत उपलब्ध नहीं होने को भी चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि कानून के कुछ प्रावधानों के दुरुपयोग से निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी और लंबे समय तक मुकदमे की स्थिति पैदा हो सकती है. इसके अलावा अंतरिम राहत की मांग भी की गई.
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