देश में फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज के लिए राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में फोरेंसिक जांच के लिए बुनियादी ढांचे की कमी पर गंभीर चिंता जताई. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई बार चार्जशीट तो जल्दी दाखिल हो जाती है लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट आने में ही करीब दो साल लग जाते हैं. कोर्ट ने कहा कि पहले जमीनी स्तर पर राज्य स्तरीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और उनकी क्षमता को मजबूत करने की जरूरत है, उसके बाद नियामक मानकों की बात की जा सकती है.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई राज्यों में बड़ी संख्या में मामलों के बावजूद फोरेंसिक लैब और मानव संसाधन पर्याप्त नहीं है. खासकर मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में जांच के लिए प्रयोगशालाओं की कमी के कारण रिपोर्ट आने में लंबा समय लग रहा है. पीठ ने उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब जैसे राज्य में जहां ड्रग्स से जुड़े मामलों की संख्या काफी अधिक है, वहां प्रयोगशालाओं में लंबी कतार देखने को मिलती है. इसका सीधा असर आपराधिक न्याय व्यवस्था पर पड़ता है और आरोपी भी इसका लाभ उठा सकते हैं.
चार्जशीट जल्दी, फोरेंसिक रिपोर्ट दो साल बाद
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची की ओर से यह बताया गया कि किसी रिकवरी केस में आदर्श स्थिति में 48 घंटे के भीतर चार्जशीट दाखिल की जा सकती है, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट आने में करीब दो साल तक लग जाते हैं. कोर्ट के सामने यह भी मुद्दा आया कि कई बार जांच एजेंसियां आरोपी को वैधानिक जमानत का लाभ मिलने से रोकने के लिए फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किए बिना चार्जशीट दाखिल कर देती हैं. बाद में जब जांच अधिकारी से जिरह होती है, तब फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश की जाती है
‘कानून किताब में कुछ और, हकीकत में कुछ और'
पीठ ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि वास्तव में देश में कितनी फॉरेंसिक लैब डीएनए विश्लेषण जैसी महत्वपूर्ण जांच करने में सक्षम हैं. कोर्ट ने टिप्पणी की कि इससे पता चलेगा कि कानून की किताब में क्या व्यवस्था है और जमीन पर उसकी वास्तविक स्थिति क्या है. याचिकाकर्ता ने ब्रिटेन की तर्ज पर फोरेंसिक लैब के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था बनाने और सभी प्रयोगशालाओं के लिए एक समान मानक तय करने की मांग की थी. इस पर कोर्ट ने संकेत दिया कि सिर्फ नियामक संस्था बनाना पर्याप्त नहीं होगा. पहले राज्य स्तर पर पर्याप्त संख्या में प्रयोगशालाएं, प्रशिक्षित कर्मचारी और आधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी.
प्राथमिक स्कूल के बिना ही IIT स्थापित करने की मांग
जस्टिस बागची ने कहा कि राज्य स्तर की प्रयोगशालाओं का बुनियादी ढांचा तैयार करना प्राथमिकता होनी चाहिए. उन्होंने याचिकाकर्ता के दृष्टिकोण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे प्राथमिक स्कूलों की व्यवस्था किए बिना ही आईआईटी स्थापित करने की मांग की जा रही हो. पीठ ने भी कहा कि पहले जमीनी स्तर का बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए, फिर नियामक मानकों पर विचार किया जा सकता है.
सरकारी कॉलेजों के विशेषज्ञों का क्यों न हो इस्तेमाल?
सुनवाई में फॉरेंसिक क्षमता बढ़ाने के एक संभावित रास्ते पर भी चर्चा हुई. जस्टिस बागची ने कहा कि देश के लगभग हर राज्य में बड़ी संख्या में सरकारी कॉलेज हैं, जहां रसायन विज्ञान और जैव रसायन जैसे विषयों में पढ़ाई और शोध हो रहा है तथा पीएचडी स्तर के विशेषज्ञ उपलब्ध हैं. सवाल उठाया गया कि इन योग्य विशेषज्ञों को उचित प्रक्रिया के तहत फोरेंसिक विश्लेषण के लिए विशेषज्ञ के रूप में नामित क्यों नहीं किया जा सकता? कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या भारत में पहले से मौजूद मजबूत विज्ञान शिक्षा व्यवस्था का इस्तेमाल फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने PIL में संशोधन को कहा
सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी जनहित याचिका में संशोधन करने को कहा. कोर्ट की टिप्पणियों से संकेत मिला कि फोकस केवल राष्ट्रीय नियामक संस्था बनाने की मांग पर नहीं, बल्कि राज्यों में फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की संख्या, मानव संसाधन, डीएनए जांच क्षमता और रिपोर्ट में होने वाली देरी जैसी जमीनी समस्याओं पर भी होना चाहिए.
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