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NSA में जेल जाने वाले सोनम वांगचुक से हॉस्पिटल में अनशन तुड़वाने 2-2 केंद्रीय मंत्री पहुंचे, कैसे बदली तस्वीर?

सोनम वांगचुक खुद को गांधीवादी बताते हैं और विरोध के लिए अहिंसक तरीकों, जैसे कि लंबे उपवास को चुनते हैं. पिछले दिनों उन पर एनएसए लगाया गया और करीब छह महीने बाद सोनम वांगचुक को जेल से रिहा किया गया था.

NSA में जेल जाने वाले सोनम वांगचुक से हॉस्पिटल में अनशन तुड़वाने 2-2 केंद्रीय मंत्री पहुंचे, कैसे बदली तस्वीर?
सोनम वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में अपनी हंगर स्ट्राइक तोड़ी. (Photo: X/@Wangchuk66)
नई दिल्ली:

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले करीब एक महीने से पेपर लीक मुद्दे पर अनशन करने वाले एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने अपनी हंगर स्ट्राइक तोड़ दी है. उन्होंने अनशन के 27वें दिन 23 और 24 जुलाई की दरमियानी रात अपनी स्ट्राइक तोड़ी. यह खबर रात क़रीब साढ़े बारह बजे सामने आई. सोनम वांगचुक ने पीएम नरेंद्र मोदी के छात्रों के नाम वीडियो मैसेज के बाद अनशन तोड़ा. इस दौरान उनके साथ केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह अस्पताल में मौजूद थे. 

सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ने के बाद सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "अभी-अभी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, डॉ. जितेंद्र सिंह और लेह-लद्दाख की शीर्ष संस्था के सीनियर लीडर्स की मौजूदगी में मैंने आखिरकार 26 दिनों बाद अपना अनशन तोड़ा है. इससे पहले, अलग-अलग सियासी दलों के 65 सांसदों ने मुझसे मिलकर या पत्र लिखकर अनशन तोड़ने की गुजारिश की थी."

उन्होंने आगे कहा कि यह कदम कई शर्तों पर लंबी बातचीत और देश में संभावित हिंसा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है. मैं बहुत जल्द एक अलग वीडियो में इन शर्तों के बारे में विस्तार से बताऊंगा. इस बीच, मैं आप सभी से गुजारिश करता हूं कि आप बहुत सतर्क रहें और कहीं भी किसी भी तरह की हिंसा न होने दें.

कुछ ही दिनों में बदली तस्वीर...

'कॉकरोच जनता पार्टी' के साथ शिक्षा सुधार को लेकर विरोध-प्रदर्शन करने वाले सोनम वांगचुक वही शख्स हैं, जो पिछले दिनों जेल में थे. उन्हें प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी एहतियाती हिरासत में रखा गया था. उन पर एनएसए लगाया गया. सुप्रीम कोर्ट में कई बार सुनवाई हुई और करीब छह महीने बाद सोनम वांगचुक को रिहा किया गया था. पिछले साल, लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांगों को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के हिंसक हो जाने के बाद, सोनम वांगचुक एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत करीब छह महीने तक हिरासत में रखा गया था.

इसी साल शनिवार, 14 मार्च को गृह मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा था, "उचित विचार-विमर्श के बाद, भारत के नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत वांगचुक की हिरासत को 'तत्काल प्रभाव' से खत्म करने का फैसला किया गया है."

तब वक्त कुछ और था, आज समय का पहिया अलग दिशा में चल रहा है. जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक ने आमरण अनशन शुरू किया और फिर यह आंदोलन पूरे देश में फैलने लगा. अलग-अलग राज्यों से स्टूडेंट्स दिल्ली पहुंचने लगे. सियासी गलियारों से लेकर सिनमाई दुनिया के बड़े चेहरों ने स्टूडेंट प्रोटेस्ट और सोनम वांगचुक का सपोर्ट करना शुरू कर दिया. वक्त बदला और परिस्थियां ऐसी बनीं कि सोनम वांगचुक से मिलने और उनका अनशन तुड़वाने के लिए केंद्र सरकार के दो मंत्री हॉस्पिटल पहुंचे. सोनम वांगचुक पिछले 26 दिनों से हंगर स्ट्राइक पर थे. उन्होंने जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की थी लेकिन बाद में दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया था.

कौन हैं सोनम वांगचुक?

सोनम वांगचुक (59) लद्दाख के जाने-माने एक्टिविस्ट और एजुकेटर हैं. उनकी शिक्षा संबंधी सोच ही '3 इडियट्स' फिल्म के किरदार 'फुंसुक वांगडू' के लिए मुख्य प्रेरणा रही है. सोनम वांगचुक पर्यावरण के लिए आवाज उठाने वाले शख्स हैं और लद्दाख को ज्यादा स्वायत्तता दिलाने के आंदोलन में एक अहम चेहरा बन गए. उन्हें सितंबर में हिरासत में लिया गया और बाद में उन पर एनएसए के तहत आरोप लगाए गए. यह कार्रवाई उन विरोध प्रदर्शनों के बाद हुई, जिनमें चार लोगों की मौत हो गई थी और दर्जनों लोग घायल हो गए थे. उन्हें इस हिंसा के लिए वांगचुक के भाषणों को जिम्मेदार ठहराया था. वांगचुक भूख हड़ताल पर थे और मांग कर रहे थे कि या तो लद्दाख को पूर्ण संघीय राज्य का दर्जा दिया जाए या फिर वहां के आदिवासी समुदायों, जमीन और नाजुक पर्यावरण को संवैधानिक सुरक्षा दी जाए.

वांगचुक का जन्म साल 1966 में लेह के उलेतोकपो में हुआ था, जो नदी के किनारे बसा एक गांव है. उनके पिता, सोनम वांग्याल, लद्दाख के एक जाने-माने राजनेता थे. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मंत्री के तौर पर भी काम किया था, जब लद्दाख उस राज्य का हिस्सा हुआ करता था. वांग्याल ने 1984 में लद्दाख के लिए 'शेड्यूल्ड ट्राइब' (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा पाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल का नेतृत्व किया था. 1998 में उनका निधन हो गया.

शुरुआत में वांगचुक की पढ़ाई उनकी मां ने घर पर ही कराई थी क्योंकि उनके गांव में कोई स्कूल नहीं था. नौ साल की उम्र के बाद उन्होंने श्रीनगर और नई दिल्ली में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. उनके पास NIT श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री है, उस वक्त इसे 'रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (श्रीनगर)' के नाम से जाना जाता था.

एजुकेशन के लिए एक्टिविज्म...

डिग्री पूरी करने के बाद, सोनम वांगचुक ने 1988 में लेह में एक वैकल्पिक शिक्षण स्कूल- स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) शुरू किया. SECMOL का अहम मकसद लद्दाख में एजुकेशन सिस्टम प्रणाली को बेहतर बनाना था. उस वक्त, स्कूलों में क्लास 8 तक पढ़ाई का मीडियम उर्दू था और कक्षा 9 और 10 में अंग्रेजी. SECMOL ने इन समस्याओं को हल करने के लिए 'ऑपरेशन न्यू होप' शुरू किया. यह मुहिम एक कैंपस में बदल गई, जहां 700 से ज्यादा शिक्षकों, शिक्षा अधिकारियों और एडमिनिस्ट्रेटर्स को ट्रेनिंग दी गई. 1998 में, दलाई लामा ने SECMOL के शैक्षिक कार्यों के लिए 1,50,000 रुपये का विशेष योगदान दिया.

लद्दाख के प्राइमरी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने के लिए खास तौर पर नई किताबें तैयार की गईं. इससे लद्दाख के स्कूलों में 10वीं क्लास के छात्रों का पास होने का रेशियो 1980 के दशक के आखिर में 5% से बढ़कर 2000 के दशक में 75% तक पहुंचने में मदद मिली. साल 2005 में वांगचुक को मानव संसाधन विकास मंत्रालय में एलिमेंट्री एजुकेशन (प्रारंभिक शिक्षा) के लिए नेशनल गवर्निंग काउंसिल का सदस्य नियुक्त किया गया.

पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर एक्टिविज्म

एक रिसर्चर और इनोवेटर के तौर पर काम करते हुए, सोनम वांगचुक ने अपने इलाके के पर्यावरण की नाज़ुक स्थिति को देखते हुए, सबसे करीबी और जरूरी मुद्दों को हल करने पर ध्यान दिया. भौगोलिक बनावट की वजह से लद्दाख में साल के ज्यादातर समय पानी की कमी रहती थी. गर्मियों में पानी की सप्लाई बढ़ाने, पानी जमा करने और धीरे-धीरे उसे छोड़ने के लिए वांगचुक ने आइस स्तूप नाम के कृत्रिम ढांचे बनाए.

लद्दाख के लोगों की समस्याओं पर वांगचुक की रिसर्च ने उन्हें स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को उठाने के लिए प्रेरित किया। वांगचुक ने इलाके की समस्याओं का अध्ययन किया और उनके समाधान सुझाए, जिनमें सोलर टेंट का प्रोटोटाइप और लद्दाख के लिए एग्री-वोल्टाइक रोडमैप जैसी पहलें शामिल हैं। 2018 में, वांगचुक और उनकी पत्नी ने लद्दाख के छात्रों को अनुभव-आधारित शिक्षा देने के लिए 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ़ अल्टरनेट लर्निंग' (HIAL) की स्थापना की। इसी साल उन्हें समुदाय के नेतृत्व में शिक्षा सुधार के क्षेत्र में उनके काम के लिए 'रेमन मैग्सेसे पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।

और फिर पॉलिटिकल एक्टिविज्म

अगस्त 2019 में हुए संवैधानिक बदलावों के बाद, जब जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांटा गया, तो सोनम वांगचुक इस फैसले का स्वागत करने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे. वांगचुक ने एक बयान भी दिया कि लद्दाख के लिए केंद्र शासित प्रदेश बनने के बजाय जम्मू-कश्मीर के साथ रहना बेहतर था. एक साल बाद, उन्होंने लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की अपनी मांग को लेकर आमरण अनशन का ऐलान किया. सितंबर 2025 में, उनके 21 दिन के अनशन के दौरान विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए और पुलिस फायरिंग में लेह के चार स्थानीय लोग मारे गए. इसके बाद, वांगचुक को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत जेल में डाल दिया गया और छह महीने तक जोधपुर जेल में रखा गया. उनके संस्थान का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया. मार्च 2026 में आरोप वापस ले लिए गए और वांगचुक लेह लौट आए.

वांगचुक के ‘गांधीवादी' विरोध प्रदर्शन

सोनम वांगचुक खुद को गांधीवादी मानते हैं और विरोध के लिए अहिंसक तरीकों, जैसे कि लंबे उपवास को चुनते हैं. सितंबर 2024 में वांगचुक ने कुछ समर्थकों के साथ नई दिल्ली तक मार्च किया, जिससे केंद्र सरकार पर लद्दाख को 'छठी अनुसूची' के तहत सुरक्षा देने का दबाव बनाया जा सके. उन्हें राजधानी के बाहरी इलाके में हिरासत में ले लिया गया.

मार्च 2024 में वांगचुक ने लद्दाख में पश्मीना बकरियां पालने वाले चरवाहों के लिए चरागाह भूमि को बहाल करने के मकसद से 'पश्मीना मार्च' का ऐलान किया. उन्होंने इस मार्च को 1930 में अंग्रेजों के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा किए गए दांडी मार्च की तर्ज पर आयोजित किया था.

लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने के आंदोलन से जुड़ने के बाद से, उन्होंने कहा है कि उनके 21 दिन के उपवास इस बात पर आधारित हैं कि गांधी जी का सबसे लंबा उपवास 21 दिन का था.

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