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परिसीमन पर दक्षिण के दर्द का क्या है समाधान... ऐसा क्या करे सरकार जो मान जाएं साउथ के स्टेट

परिसीमन का यह पूरा विवाद सिर्फ सीटों के गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भरोसे और संतुलन की राजनीति का सवाल बन चुका है. अगर दक्षिण भारत को यह भरोसा दिलाया जा सके कि उसकी आवाज और ताकत दोनों सुरक्षित रहेंगे, तो यह संकट टल सकता है. लेकिन अगर यह भरोसा नहीं बन पाया, तो परिसीमन आने वाले समय में देश के भीतर एक बड़ा क्षेत्रीय टकराव खड़ा कर सकता है.

परिसीमन पर दक्षिण के दर्द का क्या है समाधान... ऐसा क्या करे सरकार जो मान जाएं साउथ के स्टेट
  • परिसीमन की प्रक्रिया से लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण होगा, जिससे राजनीतिक पावर स्ट्रक्चर में बदलाव आएगा.
  • दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या, शिक्षा में बढ़िया प्रदर्शन किया, जिससे उन्हें पावर घटने की चिंता है.
  • अमित शाह ने कहा है कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत की सीटों की संख्या बढ़ेगी और उनकी राजनीतिक ताकत बनी रहेगी.
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नई दिल्ली:

2026 के बाद होने वाला परिसीमन भारत की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है. यह सिर्फ सीटों के पुनर्वितरण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश के पावर स्ट्रक्चर को नए सिरे से गढ़ने वाला कदम है. इससे दक्षिण भारत के राज्यों में बेचैनी साफ दिख रही है. सवाल उठ रहा है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और विकास में बेहतर प्रदर्शन किया, क्या अब उनकी राजनीतिक ताकत कम कर दी जाएगी? यही चिंता धीरे-धीरे गुस्से में बदल रही है और केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है.

क्या है पूरा मामला?

परिसीमन का मतलब है लोकसभा सीटों का बंटवारा जनसंख्या के आधार पर तय करना. अभी तक यह प्रक्रिया 1976 से फ्रीज है, ताकि परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को नुकसान न हो. लेकिन 2026 के बाद जब नई जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण होगा, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों- जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जबकि तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों का अनुपात घट सकता है. यही बदलाव पूरे विवाद की जड़ है.

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दक्षिण का गुस्सा क्यों बढ़ रहा है?

दक्षिण भारत का असंतोष इस बात से जुड़ा है कि उसने वर्षों तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य में बेहतर काम किया है. कम फर्टिलिटी रेट और बेहतर मानव विकास के चलते इन राज्यों ने देश पर जनसंख्या का दबाव कम किया. अब अगर जनसंख्या के आधार पर सीटें घटती हैं, तो यह एक तरह से 'सजा' जैसा महसूस होता है. इसके अलावा, दक्षिण भारत का देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है. फिर भी अगर उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम होती है, तो यह असंतुलन और ज्यादा गहरा हो सकता है.

दक्षिण के गुस्से पर सरकार का क्या कहना है?

हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान संसद में साफ कहा कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों में कटौती नहीं होगी. गृह मंत्री ने कहा कि परिसीमन विधेयक 2026 से दक्षिण के राज्यों को नुकसान नहीं बल्कि फायदा होगा. उन्होंने कहा कि 50% वृद्धि मॉडल के बाद लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों की संख्या 816 हो जाने से दक्षिण के सभी राज्यों की सीटों की संख्या बढ़ जाएगी. गृह मंत्री ने कहा कि लोकसभा में दक्षिण के राज्यों की मौजूद 129 सीटों की संख्या बढ़कर 195 हो जाएगी और सदन की कुल सीटों में दक्षिण के राज्यों की सीटों का प्रतिशत भी मौजूदा लगभग 24 प्रतिशत के समान रहेगा.

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क्या कहता है 'एक व्यक्ति, एक वोट' का सिद्धांत?

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संविधान और राजनीति के बीच संतुलन बनाने की है. 'एक व्यक्ति, एक वोट' का सिद्धांत जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व की मांग करता है, लेकिन इसे पूरी तरह लागू करने से क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ सकता है. इसके अलावा, सीटों का यह फेरबदल सीधे चुनावी राजनीति को प्रभावित करता है, इसलिए कोई भी फैसला राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है. यही वजह है कि सरकार अब तक कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं रख पाई है.

क्या हो सकता है समाधान?

नो-लॉस मॉडल

सबसे व्यावहारिक विकल्प यह है कि लोकसभा की कुल सीटें बढ़ा दी जाएं, लेकिन किसी भी राज्य की मौजूदा सीटें कम न हों. इससे उत्तर भारत को अतिरिक्त सीटें मिल जाएंगी, जबकि दक्षिण अपनी वर्तमान ताकत बनाए रखेगा. यह मॉडल टकराव को खत्म तो नहीं कर सकता, मगर कम जरूर करेगा. हालांकि इससे भी गुस्सा इस बात पर बढ़ने की संभावना है कि उत्तर की सीटें बढ़ेंगी लेकिन दक्षिण फिर भी कमजोर ही होगा.

हाइब्रिड फॉर्मूला

सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर न होकर, जनसंख्या नियंत्रण, टैक्स योगदान और विकास जैसे मानकों को भी ध्यान में रखकर किया जाए. इससे संतुलन बन सकता है और दक्षिण को न्याय का अहसास हो सकता है, हालांकि इसे लागू करना आसान नहीं होगा.

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राज्यसभा को मजबूत करना

अगर लोकसभा में संख्या का असंतुलन बढ़ता है, तो राज्यसभा को अधिक शक्तिशाली बनाकर राज्यों की आवाज को संतुलित किया जा सकता है. यह संघीय ढांचे को मजबूत करने का एक अहम तरीका हो सकता है.

आर्थिक संतुलन (Fiscal Balancing)

अगर राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आती है, तो केंद्र सरकार टैक्स शेयरिंग, ग्रांट्स और विकास परियोजनाओं के जरिए दक्षिणी राज्यों को अतिरिक्त समर्थन दे सकती है. इससे उन्हें यह महसूस होगा कि उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा.

परिसीमन का यह पूरा विवाद सिर्फ सीटों के गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भरोसे और संतुलन की राजनीति का सवाल बन चुका है. अगर दक्षिण भारत को यह भरोसा दिलाया जा सके कि उसकी आवाज और ताकत दोनों सुरक्षित रहेंगे, तो यह संकट टल सकता है. लेकिन अगर यह भरोसा नहीं बन पाया, तो परिसीमन आने वाले समय में देश के भीतर एक बड़ा क्षेत्रीय टकराव खड़ा कर सकता है.

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