Delimitation Bill Explained In Simple Words: देश में इस समय डिलिमिटेशन बिल को लेकर काफी चर्चा हो रही है और लोग इसे समझना चाहते हैं. बात सिर्फ लोकसभा की सीटें बढ़ाने की नहीं है, बल्कि इससे पूरे चुनाव का नक्शा बदल सकता है. आम आदमी के मन में सवाल है कि ये डिलिमिटेशन क्या होता है और इससे किसे फायदा मिलेगा. आसान भाषा में समझें तो ये सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि संसद में किस राज्य की कितनी ताकत होगी. जैसे ही सीटों की संख्या बदलती है, वैसे ही राजनीति का संतुलन भी बदल जाता है. यही वजह है कि इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने सामने नजर आ रहे हैं.
डिलिमिटेशन बिल क्या होता है
डिलिमिटेशन का मतलब होता है चुनाव वाले इलाकों की सीमाएं तय करना या बदलना. ये काम एक खास आयोग करता है जिसे डिलिमिटेशन कमीशन कहते हैं. ये आयोग जनसंख्या के हिसाब से तय करता है कि किस इलाके में कितनी सीटें होंगी. अब जो बिल चर्चा में है, उसमें इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की बात है. अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं और इन्हें बढ़ाकर करीब 850 तक करने की चर्चा है. सरकार का कहना है कि आबादी बढ़ रही है, इसलिए लोगों को सही प्रतिनिधित्व देना जरूरी है.
किसे फायदा और किसे नुकसान
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. जिन राज्यों की आबादी ज्यादा है जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार, उन्हें ज्यादा सीटें मिल सकती हैं. वहीं दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल में आबादी धीरे बढ़ी है, इसलिए उन्हें डर है कि उनकी सीटें कम हो सकती हैं. सरकार का कहना है कि कुल सीटें बढ़ाकर संतुलन बनाया जाएगा ताकि किसी को नुकसान न हो. लेकिन विरोध करने वाले मानते हैं कि इससे कुछ राज्यों की ताकत बढ़ेगी और कुछ की कम होगी.
रिजर्वेशन से जुड़ा मामला
इस बिल को महिलाओं के 33 प्रतिशत रिजर्वेशन से भी जोड़ा जा रहा है. सरकार का कहना है कि नई सीटें बनने के बाद ही इसे सही तरीके से लागू किया जा सकता है. वहीं विपक्ष का कहना है कि मौजूदा सीटों पर भी आरक्षण लागू हो सकता है.
क्यों अहम है ये मुद्दा
डिलिमिटेशन अब सिर्फ एक साधारण प्रक्रिया नहीं रह गया है. ये देश की राजनीति को बदलने वाला बड़ा मुद्दा बन गया है. इससे चुनाव का पूरा गणित बदल सकता है और आने वाले समय में किसकी ताकत ज्यादा होगी, ये भी तय हो सकता है.
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