मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार भले ही छाती में संक्रमण का इलाज करा रहे हों, लेकिन उनकी राजनीति अब भी उतनी ही सक्रिय दिखाई दे रही है. अस्पताल के कमरे से ही उनकी विरोधी अजीत पवार गुट के बड़े नेता प्रफुल्ल पटेल से हुई मुलाकात ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या एनसीपी के दोनों धड़े फिर से एक होने वाले हैं. इससे ठीक एक दिन पहले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शरद पवार को फोन किया था. मोदी ने कथित तौर पर पवार से कहा कि वे अब आराम करें और बाकी सब कुछ उन पर और सुप्रिया सुले पर छोड़ दें. इसे लेकर महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या पवार परिवार के दो धड़े फिर एक हो सकते हैं? क्या शरद पवार का गुट NDA का हिस्सा बनने की तैयारी में है? और अगर ऐसा हुआ तो महाविकास अघाड़ी (MVA) और INDIA गठबंधन पर इसका क्या असर पड़ेगा?
सत्ता सबसे ऊपर, इसी दर्शन ने गढ़ी पवार की राजनीति
पिछले छह दशकों में शरद पवार ने खुद को महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे अप्रत्याशित नेता साबित किया है. उनके आलोचक और प्रशंसक, दोनों इस बात से सहमत हैं कि उनके अगले कदम का अनुमान लगाना लगभग असंभव होता है. साल 2019 में शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा था कि शरद पवार के दिमाग को समझने के लिए सौ जन्म लेने पड़ेंगे. महाराष्ट्र की राजनीति में एक पुरानी कहावत भी प्रचलित है कि पवार कुछ कहते हैं, कुछ और करते हैं और कई बार ठीक इसका उल्टा भी. पवार के राजनीतिक सफर को देखें तो एक सूत्र बार-बार दिखाई देता है. उनके लिए राजनीति का अंतिम लक्ष्य सत्ता हासिल करना और सत्ता में बने रहना रहा है. विचारधारा, पुराने राजनीतिक मतभेद या नैतिक दावे अक्सर इस लक्ष्य के सामने गौण होते दिखाई दिए हैं. शायद यही वजह है कि उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति का 'मैकियावेली' कहा जाता है.
विपक्ष का जनादेश मिला, लेकिन NCP को सत्ता में पहुंचा दिया
1999 में शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) की स्थापना कर दी. लेकिन उसी साल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली.
उसके बाद उन्होंने अपने लंबे समय के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी शिवसेना के साथ हाथ मिलाया और महाविकास अघाड़ी सरकार के गठन की पटकथा लिखी. यह कदम उनके राजनीतिक यथार्थवाद का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है.
जब बीजेपी की सरकार बचाने में भी निभाई थी अहम भूमिका
2014 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी और शिवसेना के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण थे. दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े थे और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बहुमत से दूर थी. ऐसे समय में शरद पवार ने बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर सबको चौंका दिया. उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र को दोबारा चुनाव में नहीं धकेला जाना चाहिए. बाद में विश्वास मत के दौरान NCP के 41 विधायक सदन से बाहर चले गए, जिससे प्रभावी बहुमत का आंकड़ा घट गया और बीजेपी सरकार को राहत मिल गई.
मोदी और पवार के रिश्ते हमेशा रहे चर्चा में
2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बारामती के दौरे के दौरान सार्वजनिक मंच से शरद पवार को अपना राजनीतिक मार्गदर्शक बताया था. इसके दो साल बाद 2017 में केंद्र सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया. यही वजह है कि आज भी जब मोदी और पवार के बीच किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत संवाद की खबर सामने आती है तो उसके राजनीतिक अर्थ तलाशे जाने लगते हैं.
2019 में अजित पवार की पहली बगावत 48 घंटे में कुचल दी थी
नवंबर 2019 में अजित पवार ने पहली बार बगावत करते हुए बीजेपी के साथ सरकार बनाने का दांव चला था. उस समय ऐसा लगा था कि NCP टूट जाएगी, लेकिन शरद पवार ने अपनी राजनीतिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए हालात पलट दिए. दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की चेतावनी देकर उन्होंने 48 घंटे के भीतर लगभग सभी बागी विधायकों को वापस अपने खेमे में ला खड़ा किया और अजित पवार का पहला विद्रोह विफल हो गया.
दूसरी बगावत के बाद बदल गए हालात
हालांकि दूसरी बगावत के बाद परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं. अजित पवार के अलग होने से शरद पवार का संगठन कमजोर पड़ा है. लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी उनके गुट का प्रदर्शन अपेक्षित स्तर का नहीं रहा. सियासी विश्लेषकों का मानना है कि एकनाथ शिंदे द्वारा शिवसेना में सफल विभाजन के बाद पवार को भी अपने बचे हुए सांसदों और विधायकों के भविष्य की चिंता हो सकती है. ऐसे में सत्ता पक्ष के साथ जाने से न केवल सरकार में हिस्सेदारी मिल सकती है बल्कि पार्टी के अस्तित्व को भी सुरक्षा मिल सकती है.
पुनर्मिलन पर अंतिम फैसला सुप्रिया सुले के हाथ?
पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर अजित पवार के गुट से कानूनी लड़ाई लड़ रहे शरद पवार ने पिछले साल अपने रुख में नरमी के संकेत दिए थे. एक अंग्रेजी दैनिक को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी के कुछ नेता दोनों गुटों के पुनर्मिलन के पक्ष में हैं. हालांकि इस बारे में अंतिम निर्णय अगली पीढ़ी के नेताओं, विशेषकर सुप्रिया सुले, को लेना होगा. राजनीतिक हलकों में चर्चा यह भी है कि यदि औपचारिक विलय नहीं भी होता, तब भी NCP (SP) NDA के साथ जाने का रास्ता चुन सकती है.
कांग्रेस और उद्धव गुट से दूरी के संकेत?
कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि हाल के दिनों में शरद पवार के कुछ सार्वजनिक रुख भी उनके बदलते राजनीतिक समीकरणों की ओर संकेत करते हैं. उन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' को लेकर कांग्रेस की विशेष सत्र बुलाने की मांग का समर्थन नहीं किया. वहीं विभिन्न देशों में भेजे गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों का विरोध करने पर उन्होंने शिवसेना (UBT) की भी आलोचना की. इन बयानों को केंद्र सरकार के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैये के रूप में देखा गया.
पार्थ पवार की नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर सवाल
इस साल विमान दुर्घटना में अजित पवार की मौत के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार ने गुट की औपचारिक जिम्मेदारी संभाली. हालांकि पार्टी के भीतर यह धारणा है कि वास्तविक फैसले उनके बेटे पार्थ पवार लेते हैं. पार्थ पवार चुनावी राजनीति में अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं हासिल कर सके हैं, लेकिन उन्हें हाल ही में राज्यसभा भेजा गया. पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. कई नेता अनौपचारिक बातचीत में उनके व्यवहार और कार्यशैली को लेकर नाराजगी जताते हैं. यही वजह है कि पार्टी का एक वर्ग मानता है कि दोनों गुटों का पुनर्मिलन होना चाहिए और संयुक्त पार्टी की कमान किसी अनुभवी नेता, खासकर शरद पवार, के हाथ में रहनी चाहिए.
अगर पवार NDA में गए तो MVA और INDIA का क्या होगा?
अगर शरद पवार का गुट सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले धड़े के साथ एक हो जाता है और बाद में NDA का हिस्सा बनता है, तो इसका सबसे बड़ा राजनीतिक असर महाविकास अघाड़ी पर पड़ेगा. MVA के गठन में शरद पवार सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिकारों में रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन को आकार देने में भी उनकी भूमिका केंद्रीय रही है. ऐसे में उनका पाला बदलना सिर्फ एक दल के पुनर्गठन की कहानी नहीं होगी, बल्कि महाराष्ट्र और राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति में शक्ति संतुलन बदलने वाला घटनाक्रम बन सकता है. इसलिए ब्रीच कैंडी अस्पताल के एक कमरे में भर्ती शरद पवार की गतिविधियों पर आज सिर्फ उनके समर्थक ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की पूरी राजनीति नजर गड़ाए हुए है. क्योंकि इतिहास बताता है कि जब भी शरद पवार कोई चाल चलते हैं, उसका असर सिर्फ उनकी पार्टी तक सीमित नहीं रहता.
ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र की सियासत में फिर हलचल, बीमार शरद पवार से हॉस्पिटल में मिले प्रफुल्ल पटेल, क्या फिर NCP में होगा बदलाव?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं