जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आरएसएस ने शनिवार को पहली बार पंथ संचलन आयोजित किया. इस आयोजन को लेकर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने प्रतिक्रिया सामने आई है. उन्होंने रविवार को कहा कि जेएनयू में इसका आयोजन होना एक अच्छी शुरुआत है. साथ ही उन्होंने पोस्टरों में विपक्षी नेताओं को देवी-देवताओं के रूप में दिखाए जाने पर आपत्ति भी जताई और इसे अपराध करार दिया.
'जेएनयू में ये होना कोई हैरानी की बात नहीं'
आईएएनएस के अनुसार इंद्रेश कुमार ने रविवार को कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है. अगर लोग अराजकता छोड़कर लोकतंत्र को अपनाते हैं, तो जेएनयू के अंदर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पथ संचलन होना कोई हैरानी की बात नहीं है. अराजक तत्वों को लोकतंत्र का रास्ता अपनाना चाहिए, न कि वह रास्ता जो संविधान को नष्ट करने की ओर ले जाता है. इसलिए, यह एक अच्छी शुरुआत है। आगे जाकर यही राष्ट्रीयता की नींव और आरजता को कुचलते हुए आगे बढ़ेगी.
'देवी-देवताओं की तस्वीरों का गलत इस्तेमाल करना सही नहीं'
पोस्टरों में विपक्षी नेताओं को देवी-देवताओं के रूप में दिखाए जाने पर सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा कि देवी-देवताओं की तस्वीरों का गलत इस्तेमाल करना अधार्मिक, पापपूर्ण और एक अपराध है. इसलिए, विपक्षी नेताओं को ऐसे अधार्मिक, पापपूर्ण और आपराधिक कार्यों में शामिल नहीं होना चाहिए. गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) इकाई द्वारा विजयादशमी उत्सव के अवसर पर शनिवार को पथ संचलन किया गया. स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में सहभागिता करते हुए अनुशासन, संगठन एवं सामूहिकता प्रदर्शित की.
आपको बता दें कि इससे पहले 9 अक्टूबर को इंद्रेश कुमार ने कहा था कि खुदा, अल्लाह, ईश्वर, परमेश्वर और गॉड को मानने वाले सभी लोगों का मूल सत्य यही है कि वे इंसान हैं. मनुष्य को शैतान बनने के बजाय इंसानियत से भरपूर होना चाहिए. दुनिया में लोगों की पहचान उनके देश से होती है और भारत में रहने वाले सभी लोग भारतीय, हिंदुस्तानी और इंडियन हैं.
उन्होंने कहा कि भारत के लोग अपने पूर्वजों, वतन और परंपराओं के आधार पर एक हैं। देश के 99 प्रतिशत से अधिक मुसलमान न तो विदेशी हैं और न ही पराए बल्कि वे इसी देश के थे, हैं और रहेंगे. हर व्यक्ति को अपने-अपने तरीके से इबादत करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. किसी को दूसरे की इबादत में दखल नहीं देना चाहिए, बल्कि एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में सम्मानपूर्वक शामिल होना चाहिए. आपसी सहयोग और सद्भाव से दंगा-मुक्त भारत का निर्माण किया जा सकता है.
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