- कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए जेएनयू को नोटिस जारी किया है और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है
- बिमोल अकोइजम पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे और मुख्य सुरक्षा अधिकारी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी
- जेएनयू शिक्षक संघ ने बर्खास्तगी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे और कार्रवाई को नियमों के अनुरूप नहीं माना था
दिल्ली हाई कोर्ट ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के उस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसके तहत कांग्रेस सांसद और प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम को सेवा से बर्खास्त किया गया था. अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जेएनयू को नोटिस जारी किया है और मामले में जवाब दाखिल करने के लिए 25 जनवरी तक का समय दिया है.यह फैसला बिमोल अकोइजम के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि विश्वविद्यालय ने हाल ही में उन्हें यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के बाद नौकरी से हटाने का आदेश जारी किया था.
क्या था पूरा मामला?
जेएनयू के मुख्य सुरक्षा अधिकारी की शिकायत पर 11 अक्टूबर को वसंत कुंज नॉर्थ थाने में बिमोल अकोइजम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी. मामला यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ा है और इसकी जांच अभी जारी है.
जांच के बाद हुई थी बर्खास्तगी
जेएनयू प्रशासन ने 9 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में कहा था कि विश्वविद्यालय की आंतरिक समिति ने यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच की थी. जांच के बाद समिति ने उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की थी. इसके आधार पर विश्वविद्यालय ने उन्हें तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया था. बिमोल अकोइजम मणिपुर की इनर मणिपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद भी हैं. उनकी बर्खास्तगी के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया था.
शिक्षक संघ ने भी उठाए थे सवाल
बर्खास्तगी के फैसले के बाद जेएनयू शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन पर सवाल उठाए थे. संघ का कहना था कि कार्रवाई की प्रक्रिया विश्वविद्यालय के नियमों के अनुरूप नहीं थी. जेएनयूटीए ने आरोप लगाया था कि कुलपति कार्यालय ने निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया. दिल्ली हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल बर्खास्तगी पर रोक लग गई है. हालांकि यौन उत्पीड़न मामले की जांच और अदालत में चल रही कानूनी प्रक्रिया अभी जारी रहेगी.
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