एक मासूम भारतीय बच्चा, जिसे ऑस्ट्रेलिया के एक अमीर जोड़े ने गोद लिया. उसकी जिंदगी संवर गई, हर सहूलियत मिली. लेकिन ठीक 25 साल बाद उसी लड़के का एक ऐसा सच सामने आया, जिसने पूरी दुनिया को भावुक कर दिया. महज 5 साल की उम्र में कोई बच्चा अपनी मां की आंचल की छांव से दूर हो जाए. न शहर का पता हो, न रास्ते का ठिकाना. और फिर पूरे 25 साल बाद वही बच्चा अपनी मां के गले लग जाए, तो आंखें नम होंगी या नहीं? यह कहानी है सरू ब्रायरली की.

एक अंधेरी रात और वो छूटती ट्रेन
बात 80 के दशक की है. 5 साल का नन्हा सरू, गरीबी इतनी कि मां ईंट-सीमेंट ढोकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती थी. सरू और उसके भाई रेलवे स्टेशन पर छोटे-मोटे सिक्के और खाना तलाशते थे.
एक रात, सरू अपने बड़े भाई गुड्डू के साथ स्टेशन गया. थकान से पस्त सरू प्लेटफॉर्म पर खड़ी एक खाली ट्रेन की बोगी में ले गया और आंख लग गई. भाई गुड्डू ने कहा था- "यहीं रुकना, मैं अभी आया." लेकिन वो 'अभी' कभी नहीं आया.
जब सरू की नींद खुली, तो पांवों तले जमीन खिसक गई. ट्रेन हवा से बातें कर रही थी. न भाई गुड्डू था, न अपना स्टेशन. चीखता-चिल्लाता सरू उस लोहे के डिब्बे में अकेला बंद था.
ट्रेन दौड़ती रही और जब रुकी, तो सरू अपने घर से 1600 किलोमीटर दूर कोलकाता पहुंच चुका था. एक 5 साल का मासूम, जिसे न अपने गांव का नाम पता था, न मां का नाम. कोलकाता की अनजान सड़कें, भूखे पेट, और दरिंदों से बचती-छुपती जिंदगी. पुलिस ने उसके घरवालों को ढूंढने की बहुत कोशिश की, थक-हारकर प्रशासन ने उसे अनाथ आश्रम भेज दिया. वहां से ऑस्ट्रेलिया के एक भले परिवार ने उसे गोद ले लिया.
फिर किस्मत उसे सात समंदर पार ले गई. सीधे ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में. सू और जॉन ब्रायली ऑस्ट्रेलियाई कपल ने उसे गोद ले लिया. उसे एक नया नाम मिला, एक नया घर, शानदार परवरिश और बेइंतहा प्यार मिला.

सात समंदर पार, लेकिन दिल तो भारत में ही था
लेकिन कहते हैं न कि 'खून का रिश्ता कभी धुंधला नहीं पड़ता.' सरू बड़ा हो रहा था, लेकिन उसकी रातों की नींद उड़ चुकी थी. रह-रहकर बचपन की धुंधली यादें कौंधती थीं. वो रेलवे स्टेशन, वो पानी की टंकी, वो पुरानी गलियां और मां का वो धुंधला सा चेहरा.
सरू के मन में बार-बार एक ही सवाल आता- "आखिर वह कौन है? उसका असली घर कहां है?"
तब न तो सोशल मीडिया था और न कोई सुराग. लेकिन सरू ने हार नहीं मानी. समय बदला और नई तकनीक आई. सरू ने गूगल अर्थ का सहारा लिया.
दिन बीतते गए, महीने और साल गुजर गए. सरू रोज कंप्यूटर स्क्रीन पर भारत की रेल पटरियां को खंगालता. हजारों किलोमीटर की पटरियों का पीछा करते-करते. एक दिन अचानक उसकी नजरें एक जगह पर ठिठक गईं. वही रेलवे स्टेशन, वही प्लेटफॉर्म और वही पानी की टंकी. सरू का दिल जोरों से धड़क उठा- उसे उसका बचपन मिल चुका था.

25 साल का लंबा इंतजार और वो ऐतिहासिक मिलन
2012 में सरू भारत आया. सीधा अपने पुराने गांव बुरहानपुर पहुंचा. दिल धक-धक कर रहा था- क्या मां जिंदा होगी? क्या वो उसे पहचान पाएगी?
जैसे ही सरू उस छोटी सी झोपड़ी के सामने पहुंचा, एक बुजुर्ग महिला बाहर निकली. दोनों की नजरें मिलीं. 25 साल का लंबा फासला चंद सेकंडों में सिमट गया. मां ने बिना किसी सबूत के, अपनी औलाद को सीने से लगा लिया.

इसी दिल छू लेने वाली कहानी पर आगे चलकर हॉलीवुड में 'लायन' (Lion) नाम की फिल्म बनी, जिसे 6 ऑस्कर नॉमिनेशंस मिले. लेकिन ऑस्कर से भी बड़ा इनाम था- एक मां का अपने बच्चे को 25 साल बाद सीने से लगाना.
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