आपने जंग के मैदान की बहुत सी कहानियां सुनी होंगी. तोपों की गूंज, सैनिकों की बहादुरी और गोलियों की बौछार. लेकिन आज हम आपको दूसरे विश्व युद्ध की एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिस पर शायद आप पहली बार में यकीन न करें. सोचिए, आसमान से बम बरस रहे हों, और खंदकों के बीच एक 250 किलो वजनी विशालकाय भालू अपने पंजों में तोप के गोले उठाकर दौड़ रहा हो. एक सीरियन ब्राउन भालू जिसका नाम था- 'वोयटेक' (Wojtek).
हिटलर ने दिया धोखा, स्टालिन ने सिखाया सबक
तारीख थी 1 सितंबर 1939. पोलैंड पर दो तरफा कहर टूटा. एक तरफ से हिटलर की जर्मन सेना ने धावा बोला, तो दूसरी तरफ से स्टालिन की सोवियत सेना ने. नतीजा- लाखों पोलिश सैनिकों को बंदी बनाकर साइबेरिया के ठंडे, जमे हुए लेबर कैंपों में फेंक दिया गया. लेकिन 1941 में हिटलर ने स्टालिन को ही धोखा दे दिया और सोवियत संघ पर हमला कर दिया. बौखलाए स्टालिन ने तुरंत उन्हीं पोलिश कैदियों को आजाद किया और कहा- 'जाओ और जर्मनी के खिलाफ लड़ो.' यहीं से हमारी कहानी में एंट्री होती है हीरो की.
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अनाथ भालू और सैनिकों का बेटा
"साइबेरिया से छूटकर ये थके-हारे पोलिश सैनिक जब ईरान के रास्ते से गुजर रहे थे, तो उनकी मुलाकात एक युवा चरवाहे से हुई. उस चरवाहे के पास एक बोरी में एक छोटा सा सीरियन ब्राउन भालू का बच्चा था. शिकारियों ने उसकी मां को मार डाला था.
सैनिकों का दिल पसीज गया. उन्होंने अपनी कुछ चीजें देकर उस चरवाहे से उस भालू के बच्चे को खरीद लिया. उस दिन से वो भालू उनकी पलटन का हिस्सा बन गया. सैनिकों ने प्यार से उसका नाम रखा- 'वोयटेक' (Wojtek), जिसका मतलब होता है- खुशमिजाज योद्धा.
शुरुआत में वोयटेक को बोतल से कंडेंस्ड दूध पिलाया जाता था. दिमित्री और हेनरिक नाम के दो सैनिकों ने तो जैसे उसे अपना बेटा ही मान लिया था. हेनरिक हमेशा साये की तरह उसके साथ रहता. लेकिन जैसे-जैसे वोयटेक बड़ा हुआ, उसका स्वाद भी बदल गया. दूध की जगह अब वो कैंटीन का खाना खाने लगा था.

बीयर और सिगरेट का शौकीन
सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वोयटेक बिल्कुल इंसानों की तरह व्यवहार करने लगा था. वह सैनिकों के साथ बैठकर बाकायदा अपने एक खास मग से बीयर पीता था. जब मग खाली हो जाता, तो वह बड़ी उदास आंखों से तब तक घूरता रहता, जब तक उसे दोबारा न भर दिया जाए. इतना ही नहीं, उसे सिगरेट पीने का भी गजब का शौक था. हालांकि, वह सिगरेट का एक कश लगाता और बाकी सिगरेट को पूरा निगल जाता था.

कैंप का हीरो वोयटेक
धीरे-धीरे वोयटेक का वजन बढ़कर करीब 250 किलो (550 पाउंड) हो गया. उसे सैनिकों के साथ कुश्ती लड़ना बहुत पसंद था. जाहिर है, एक भालू से कुश्ती लड़ना बच्चों का खेल नहीं था. जो भी सैनिक उससे दो-दो हाथ करने की हिम्मत करता, उसके कपड़े अक्सर फट जाते थे. लेकिन सबसे खास बात ये थी कि वोयटेक ने कभी भी खेल-खेल में किसी सैनिक को खरोंच तक नहीं पहुंचाई.
ठंडी बीयर का इनाम
फिलिस्तीन पहुंचने पर उसे '22वीं ट्रांसपोर्ट कंपनी' का शुभंकर (Mascot) बना लिया गया. वहां एक रात कैंप में एक चोर घुसा. किस्मत खराब कि वो सीधे वोयटेक के तंबू में जा घुसा. अपने सामने एक विशालकाय भालू को देखकर चोर की घिग्घी बंध गई और उसने चीख मारकर पूरा कैंप उठा दिया. इस बहादुरी के लिए वोयटेक को इनाम में ठंडी बीयर पिलाई गई.

कहानी में आया मोड़
अब वोयटेक सैनिकों के साथ बड़ी सी रिकवरी ट्रक में बैठकर सफर करता था. लेकिन कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब 1943 में इस पलटन को इटली के युद्ध के मोर्चे पर जाने का आदेश मिला. लेकिन नियम साफ थे- 'जंग के मैदान में कोई जानवर नहीं जा सकता.'
सैनिकों ने कहा, 'वोयटेक कोई जानवर थोड़ी है, वो तो हमारा फौजी भाई है.' और फिर जो हुआ, वो इतिहास में कभी नहीं हुआ. उस भालू को बाकायदा पोलिश सेना में 'प्राइवेट' (Private) की रैंक पर भर्ती किया गया. उसका एक सर्विस नंबर जारी हुआ. यहां तक कि उसकी अपनी सैलरी भी तय की गई. अब वोयटेक सिर्फ एक भालू नहीं था, वो प्राइवेट वोयटेक था."

मोंटे कैसिनो की जंग
1944 में इटली के मोंटे कैसिनो (Monte Cassino) की ऐतिहासिक और खूनी जंग छिड़ी. दुश्मनों की तरफ से तोपों की भारी बारिश हो रही थी. हेनरिक जो वोयटेक को बेटा मानता था, आगे मोर्चे पर था और भालू को पीछे तोपखाने के पास छोड़ दिया गया था. लेकिन वोयटेक से शांत नहीं बैठा गया. अपने साथियों को तोप के भारी गोले ढोते देख, उसने इंसानों की नकल उतारनी शुरू कर दी.
जब उसने देखा कि उसके फौजी भाई थक रहे हैं और तोप के भारी गोले उठाने में उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है, तो वो खुद खड़ा हो गया. उसने 100-100 पाउंड के भारी गोला-बारूद के बक्से उठाए और गोलियों की परवाह किए बिना तोपों तक पहुंचाने लगा.
इस युद्ध में मित्र देशों (Allies) की जीत हुई. तब तक वोयटेक पूरे कैंप का हीरो बन चुका था. उसकी इस बहादुरी के सम्मान में 22वीं ट्रांसपोर्ट कंपनी ने अपना आधिकारिक Logo ही बदल दिया. नया लोगो था- 'अपने हाथों में तोप का गोला उठाए हुए एक भालू'."

सैनिकों की घर वापसी
जंग खत्म हुई. 1947 में वोयटेक की सैन्य टुकड़ी स्कॉटलैंड पहुंची. धीरे-धीरे सैनिकों को उनके घर वापस भेजा जाने लगा. वोयटेक के लिए वो विदाई का समय था. अपनी सेवा के बाद, वो 'प्राइवेट' से प्रमोट होकर 'कॉरपोरल' (Corporal) के पद से रिटायर हुआ.
रिटायरमेंट के बाद उसे स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग जू (Edinburgh Zoo) में रखा गया. वो वहां का सुपरस्टार बन गया था. टीवी शो वाले उसके पास आते थे. लेकिन उसे इंतजार रहता था अपनों का. जब भी कोई पुराना पोलिश सैनिक उससे मिलने आता और उसे उसके नाम से पुकारता. तो वोयटेक तुरंत उठकर बैठ जाता, अपना सिर हिलाता और जैसे इशारा करता कि- 'भाई, एक सिगरेट मिलेगी?'

वोयटेक ने अपनी पूरी जिंदगी 21 साल की उम्र तक स्कॉटलैंड में ही बिताई और 1963 में दुनिया को अलविदा कह दिया."
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