सियासत के अखाड़े में आज सबसे बड़ी खबर आई है. महिला पहलवानों से यौन शोषण मामले में बृज भूषण शरण सिंह को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने बरी कर दिया है. बृजभूषण शरण सिंह को सबूतों के अभाव में बरी किया गया है. जनवरी 2023 से चला आ रहा ये विवाद और 6 अंतरराष्ट्रीय पहलवानों के वो गंभीर आरोप तीन साल पहले मीडिया की सुर्खियां बने थे. उस वक्त बृज भूषण शरण सिंह को काफी आलोचना और भारी दबाव का सामना करना पड़ा था. ऐसे में आज आपको उस इंसान की कहानी बताते हैं, जिसका सिक्का पूर्वांचल की राजनीति में दशकों से चलता आ रहा है. वो बाहुबली- जिसने छात्र राजनीति से लेकर संसद तक का सफर अपने बाहुबल और रसूख के दम पर तय किया.
कहानी शुरू होती है 1970 और 80 के दशक में, अयोध्या के साकेत कॉलेज से. ये वो दौर था जब पूर्वांचल के कॉलेजों में छात्र राजनीति का मतलब होता था बाहुबल और वर्चस्व की सीधी लड़ाई. यहीं से बृजभूषण सिंह ने अपना पहला दांव चला और 1979-80 में छात्रसंघ अध्यक्ष बनकर अपनी ताकत का लोहा मनवाया. 80 का दशक आते-आते गोंडा और आसपास के इलाकों में सरयू नदी के खनन से लेकर रेलवे के ठेकों तक, हर तरफ एक ही नाम गूंजने लगा. यहीं से जन्म हुआ एक ऐसे 'दबंग' नेता का, जिसकी मर्जी के बिना उस इलाके का पत्ता भी नहीं हिलता था.
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विवादित ढांचा और सांसद बृजभूषण शरण
फिर आया 90 का दशक, जब पूरे देश में राम मंदिर आंदोलन की लहर थी. इस लहर में बृजभूषण ने वो छलांग लगाई जिसने उन्हें सीधे लालकृष्ण आडवाणी के करीब ला खड़ा किया. उनके इस उग्र तेवर को देखते हुए बीजेपी ने 1991 में उन्हें गोंडा से टिकट दिया और वे पहली बार संसद पहुंच गए. 6 दिसंबर 1992 को जब विवादित ढांचा गिरा, तो उसमें भी उनका नाम प्रमुखता से उछला, हालांकि बाद में वे इससे भी बरी हो गए.

लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब उन पर दाऊद के गुर्गों को पनाह देने का आरोप लगा और टाडा (TADA) जैसा सख्त कानून उन पर ठोंक दिया गया. उन्हें तिहाड़ जेल जाना पड़ा. अब आप सोचेंगे कि नेता जेल गया तो खेल खत्म, लेकिन नहीं. यहीं से उनके असली रसूख का पता चलता है.
1996 के चुनाव में जेल की सलाखों के पीछे से उन्होंने अपनी पत्नी केतकी देवी सिंह को गोंडा से चुनाव लड़वाया और भारी मतों से जितवा कर सबको चौंका दिया. ये इस बात का सबूत था कि गोंडा में हवा का रुख अब उनके इशारों पर बदलता था. बाद में सीबीआई जांच के बाद कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया था.

बीजेपी से नाराजगी और सपा का साथ
राजनीति के इस अखाड़े में बृजभूषण सिंह सिर्फ एक सीट के मोहताज नहीं रहे. गोंडा हो, बलरामपुर हो या कैसरगंज, उन्होंने 6 बार सांसद बनकर दिखाया कि उनका वोट बैंक किसी पार्टी का नहीं, बल्कि उनके अपने नाम का मोहताज है. जब 2008 में बीजेपी से अनबन हुई, तो वे साइकिल पर सवार होकर सपा में चले गए और वहां से भी जीत कर दिखा दिया. 2014 में वापस बीजेपी में आए और फिर परचम लहराया.
ये ताकत सिर्फ खौफ से नहीं आती. उन्होंने पूर्वांचल में 50 से ज्यादा डिग्री, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खोलकर अपना एक ऐसा सामाजिक और शैक्षणिक साम्राज्य खड़ा किया है, जिसने हजारों युवाओं को रोजगार दिया. आज वहां के लोग उन्हें सिर्फ बाहुबली नहीं, बल्कि अपना रहनुमा और संरक्षक मानते हैं, जो सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहता है.

बृजभूषण शरण का बेटा और बहू
इसी रसूख की सबसे ताजा मिसाल हमने 2024 के लोकसभा चुनाव में देखी. महिला पहलवानों के भारी विरोध और बवाल के बाद, जब बीजेपी पर दबाव बढ़ा तो पार्टी ने उनका टिकट तो काट दिया. लेकिन पार्टी भी इस बाहुबली के रसूख को नजरअंदाज नहीं कर पाई और टिकट दिया तो उनके ही छोटे बेटे करण भूषण सिंह को. करण ने भारी मतों से जीत दर्ज की, और ये साबित कर दिया कि चेहरा चाहे बेटा का हो, कैसरगंज की सियासत की लगाम आज भी बृजभूषण शरण सिंह के हाथों में ही है.
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