दिल्ली की सड़कों पर चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का प्रदर्शन तीसरे दिन भी जारी है...लेकिन इस सियासी हलचल के बीच एक दिलचस्प तस्वीर भी निकलकर सामने आ रही है. यह तस्वीर विपक्षी रणनीति से ज्यादा राहुल गांधी के तौर-तरीकों और उनके बदले हुए राजनीतिक तेवर की ओर इशारा करती है. संसद से सड़क तक जब इंडिया ब्लॉक के सांसद प्रदर्शन कर रहे हैं, तो दोपहर के लंच के लिए किसी फाइव स्टार होटल, क्लब या संसद की वीआईपी कैंटीन के बजाय दिल्ली के आम, जाने-पहचाने सागर रत्ना और मोएट्स जैसे मिडिल क्लास रेस्टोरेंट्स को चुना जा रहा है.अगर ऐसा एक बार होता तो इत्तेफाक कहा जा सकता था लेकिन ये प्रदर्शन के तीनों दिन हुआ है. ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ लंच पॉलिटिक्स है या फिर राहुल और उनकी टीम आम शहरी और मध्यम वर्ग के मतदाता को अलग संदेश देना चाहते हैं.
पहले दिन रोल, दूसरे दिन सागर रत्ना और तीसरे दिन मोएट्स
इस नए राजनीतिक अंदाज की शुरुआत प्रदर्शन के पहले दिन ही देखने को मिली थी. आकाशवाणी भवन के सामने धरने पर बैठे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने दोपहर में किसी वीआईपी लंच के बजाय सामान्य नागरिकों की तरह रोल मंगाकर खाया.
तीसरे दिन, इस सिलसिले को जारी रखते हुए लंच की जगह बदलकर कनॉट प्लेस का जाना-माना रेस्टोरेंट 'मोएट्स' (Moets) कर दिया गया. ये भी कोई बहुत बड़ा रेस्टोरेंट नहीं है. इन तीन दिनों के लंच पॉलिटिक्स को अगर गहराई से देखा जाए, तो यह साफ होता है कि यह केवल लंच की जगहें नहीं बदली जा रही थीं, बल्कि लुटियंस दिल्ली की उस पारंपरिक और संभ्रांत छवि को तोड़ने की कोशिश की जा रही थी, जिससे विपक्षी नेता आमतौर पर घिरे रहते हैं.
अब 'मिडिल क्लास कनेक्ट' का नया दांव
देखा जाए भारतीय राजनीति में नेताओं का किसी गरीब या दलित के घर जाकर जमीन पर बैठकर खाना खाना एक बहुत पुरानी और आजमाई हुई परंपरा रही है. खुद राहुल गांधी भी अपनी भारत जोड़ो यात्राओं के दौरान कई बार ऐसा कर चुके हैं. लेकिन राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर प्रदर्शन के दौरान अपने गठबंधन के तमाम दिग्गजों को फाइव स्टार की जगह मिडिल क्लास रेस्टोरेंट्स में ले जाना एक बिल्कुल अलग प्रयोग है. विपक्षी सांसद चाहते तो किसी भी बड़े लक्जरी होटल में टेबल बुक कर सकते थे, लेकिन राहुल गांधी ने जानबूझकर उन जगहों को चुना जहां दिल्ली का आम युवा, कामकाजी वर्ग और मध्यमवर्गीय परिवार अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में खाना खाने जाता है.
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आम लोगों जैसा दिखना और खर्चीली राजनीति की छवि तोड़ना
इस सियासी प्रयोग के जरिए राहुल गांधी कई संदेश एक साथ देने की कोशिश में हैं. पहला संदेश यह है कि वे खुद को सत्ता की चमक-दमक और लुटियंस की फाइव स्टार संस्कृति से दूर, एक सामान्य नागरिक के तौर पर दिखाना चाहते हैं. दूसरा और सबसे बड़ा संदेश मध्यम वर्ग और युवाओं को लेकर है, जो अमूमन कांग्रेस से थोड़ा दूर माना जाता रहा है. जनपथ और कनॉट प्लेस के आम रेस्टोरेंट में बैठकर खाना खाने से वे यह जताना चाहते हैं कि वे उसी दुनिया का हिस्सा हैं जिसमें देश का आम मिडिल क्लास जीता है. इसके अलावा, यह विपक्षी नेताओं के बीच की औपचारिकता को खत्म कर एक अनौपचारिक और सहज माहौल बनाने का भी जरिया भी हो सकता है.कुल मिलाकर राहुल गांधी का यह अंदाज बताता है कि वे अब केवल पारंपरिक प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते. सड़क पर रोल खाने से लेकर सागर रत्ना और मोएट्स में नेताओं की दावत कराने तक, यह नई सियासत बताती है कि राहुल गांधी अपनी छवि को एक ऐसे नेता के रूप में गढ़ रहे हैं जो जनता के बीच का लगे, न कि किसी बंद कमरे या फाइव स्टार होटल का कैदी.
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