पंजाब का अर्थ है- 'पांच नदियों की भूमि'. हरित क्रांति का केंद्र रहे इस राज्य के हरे-भरे खेत लंबे समय से भारत की खाद्य सुरक्षा के मुख्य आधार रहे हैं. फिर भी, सूरज की रोशनी में चमकती फसलों के नीचे एक कड़वा सच छिपा है और वह है एक बढ़ता हुआ संकट. पंजाब के कई इलाकों में ग्राउंडवॉटर का स्तर तेजी से गिर रहा है. इससे न केवल खेती-बाड़ी का संकट पैदा हो रहा है, बल्कि लोगों की सेहत के लिए भी एक बड़ा खतरा खड़ा हो रहा है.
दशकों से लगातार पानी निकालने, सस्ती बिजली और नीतियों में ढिलाई के कारण पंजाब में ग्राउंडवॉटर का स्तर खतरनाक हद तक गिर चुका है. जो शुरुआत में खेती में एक चमत्कारिक बदलाव के तौर पर शुरू हुआ था, वह अब एक जटिल आपातकालीन स्थिति में बदल रहा है. आज, जब किसान गायब होते पानी तक पहुंचने के लिए सदियों पुरानी चट्टानों की परतों में सैकड़ों फीट गहरे बोरवेल खोद रहे हैं, तो राज्य कई मोर्चों पर संकट का सामना कर रहा है. खेती की बढ़ती लागत से कर्ज का बोझ बढ़ रहा है, मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और पानी की आपूर्ति में मौजूद जहरीले तत्वों के कारण स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं पैदा हो रही हैं.
पानी खत्म होने का गणित
पंजाब के ग्राउंडवॉटर से जुड़े आंकड़े सालों से 'रेड जोन' में हैं. पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के डॉ. कमल वट्टा राज्य में गिरते जल स्तर की ओर इशारा करते हैं. वे संसद में पेश किए गए सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) के सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए बताते हैं कि हर साल जमीन से इतना पानी निकाला जा रहा है जो प्राकृतिक रूप से इसके भरने की क्षमता से कहीं ज्यादा है.
डॉ. वट्टा बताते हैं, 'स्थिति बेहद गंभीर है. सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के 2025 के अनुसार, पंजाब ने 26.27 अरब क्यूबिक मीटर ग्राउंडवॉटर निकाला, जबकि सालाना निकाले जा सकने योग्य पानी की मात्रा केवल 16.80 अरब क्यूबिक मीटर थी. इसका मतलब है कि पानी निकालने की दर 156.36% है. यानी, हर 100 लीटर पानी के बदले पंजाब लगभग 156 लीटर पानी निकाल रहा है.'
यह कमी किसी खास इलाके तक सीमित नहीं है. यह पूरे राज्य में फैली हुई है. इससे पानी की कमी का एक ऐसा भयावह परिदृश्य बना है जहां 'सेफ जोन' अब आम बात नहीं बल्कि अपवाद बन गए हैं.
डॉ. वट्टा बताते हैं कि जमीनी स्तर पर यह संकट कैसे बढ़ रहा है. उन्होंने बताया कि 'राज्य के 153 ब्लॉकों में से 111 ब्लॉक, यानी 72.55%, में पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जबकि 25 अन्य ब्लॉक 'क्रिटिकल' गंभीर) या 'सेमी-क्रिटिकल' श्रेणी में हैं.' वे चौंकाने वाले आंकड़ों की ओर इशारा करते हैं जिनसे पता चलता है कि राज्य के केवल 17 ब्लॉक ही 'सुरक्षित' श्रेणी में बचे हैं.
हालांकि सरकारी आंकड़ों में संख्याओं में मामूली बदलाव दिखता है. 2023 में पानी निकालने की दर 164% थी जो 2025 में घटकर 156% हो गई है. लेकिन डॉ. वट्टा चेतावनी देते हैं कि इसे 'प्राकृतिक सुधार' का संकेत नहीं माना जाना चाहिए.

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लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के सॉइल एंड वॉटर इंजीनियरिंग विभाग की प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. समनप्रीत कौर बावेजा बताती हैं कि वॉटर टेबल कितनी तेजी से नीचे जा रही है. डॉ. बावेजा के अनुसार, देश में लगभग किसी भी अन्य जगह की तुलना में पंजाब के एक्विफर (भूजल भंडार) ज्यादा तेजी से खत्म हो रहे हैं. उन्होंने कहा, 'पूरे राज्य में 1998 के बाद से वॉटर टेबल में लगभग 14 मीटर की गिरावट आई है. यह जमीन के नीचे 8 मीटर से कम गहराई से गिरकर 21 मीटर से ज्यादा नीचे चली गई है, क्योंकि किसान ज्यादा पानी की जरूरत वाली धान-गेहूं की फसल के लिए और गहराई से पानी पंप कर रहे हैं.'
हालांकि पूरे राज्य में गिरावट का औसत लगभग आधा मीटर प्रति वर्ष है. डॉ. बावेजा चेतावनी देती हैं कि मध्य क्षेत्र के गंभीर रूप से प्रभावित इलाकों में यह गिरावट दोगुनी गति से हो रही है. वह कहती हैं, 'गिरावट का औसत लगभग आधा मीटर प्रति वर्ष है, लेकिन सबसे बुरी तरह प्रभावित मध्य जिलों - संगरूर और बरनाला - में वॉटर टेबल हर साल एक मीटर से ज्यादा नीचे जा रही है. इसका कारण पंपों की लगातार बढ़ती संख्या है.'
उन्होंने कहा कि पंजाब में हर साल प्राकृतिक रूप से दोबारा भरे जा सकने वाले पानी की तुलना में 13 अरब क्यूबिक मीटर ज्यादा पानी निकालता है. इस कमी को केवल एक्विफर से पानी निकालकर पूरा किया जाता है.
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संकट की असल वजह
यह स्थिति एक साफ सवाल खड़ा करती है कि नदियों से प्राकृतिक रूप से पानी पाने वाले राज्य में भूजल का स्तर इतना कम कैसे हो गया?
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के एनवायरनमेंट साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर सुनील मित्तल इस संकट की जड़ में मौजूद पॉलिसी इंसेंटिव और फसल चुनने के तरीकों पर सवाल उठाते हैं. वह कहते हैं, 'पंजाब में भूजल स्तर में तेजी से गिरावट की मुख्य वजह धान-गेहूं की फसल प्रणाली के लिए भूजल का बेतहाशा इस्तेमाल है, जो राज्य के भूजल संसाधनों का 80% से ज्यादा हिस्सा इस्तेमाल करती है. मुफ्त या बहुत ज्यादा सब्सिडी वाली बिजली ने लाखों ट्यूबवेल से बेरोकटोक पानी निकालने को बढ़ावा दिया है, जिससे पानी निकालने की दर प्राकृतिक रूप से पानी के दोबारा भरने (रीचार्ज) की दर से कहीं ज्यादा हो गई है.'

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इंसानों की वजह से पैदा हुए इन कारकों के असर को मौसम में बदलाव और शहरी विकास और भी बढ़ा देते हैं, जो पानी के प्राकृतिक रूप से जमीन के नीचे जाने के रास्तों को रोक देते हैं. जैसा कि प्रोफेसर मित्तल बताते हैं, 'जलवायु में बदलाव, बढ़ता तापमान, मॉनसून में देरी और ज्यादा वाष्पीकरण ने असरदार रीचार्ज को और कम कर दिया है.'
भूजल रीचार्ज को और मुश्किल बनाते हुए, तेजी से हो रहे शहरीकरण में पानी सोखने वाली मिट्टी की जगह कंक्रीट ले रहा है, जिससे बारिश का पानी नीचे जाकर एक्विफर को फिर से भरने से रुक जाता है.
आर्थिक, ढांचागत और कृषि संबंधी दबाव
जैसे-जैसे कम गहराई वाले पानी के स्रोत खत्म हो रहे हैं, खेती का काम काफी महंगा होता जा रहा है. और ज्यादा गहराई में मौजूद पानी तक पहुंचने के लिए, किसानों को गहरे बोरवेल खोदने और ज्यादा क्षमता वाले पंप लगाने पड़ते हैं, जिससे पंजाब के पहले से ही कर्ज में डूबे किसान महंगे खर्चों के जाल में फंस जाते हैं.
डॉ. वट्टा इस बढ़ते आर्थिक दबाव के बारे में बताते हैं, 'इसका तुरंत असर यह होता है कि पानी का स्तर लगातार गिरता जाता है. किसानों को ट्यूबवेल गहरे करने पड़ते हैं, ज्यादा शक्तिशाली पंप लगाने पड़ते हैं और ज्यादा बिजली इस्तेमाल करनी पड़ती है, जिससे खेती की लागत और सरकार पर बिजली सब्सिडी का बोझ, दोनों बढ़ जाते हैं. छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि वे गहरे कुएं बनवाने का खर्च नहीं उठा सकते.'

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इस चलन से जुड़े भौतिक और संचालन संबंधी जोखिमों पर जोर देते हुए, डॉ. बावेजा चेतावनी देती हैं कि बहुत ज्यादा पानी निकालने से सरकारी खजाना और जमीन, दोनों ही टूटने की कगार पर पहुंच रहे हैं. उन्होंने कहा, 'जैसे-जैसे पानी और नीचे जाता है, किसानों को उसे निकालने के लिए ज्यादा शक्तिशाली ट्यूबवेल और ज्यादा बिजली की जरूरत होती है, जिससे राज्य का बिजली सब्सिडी बिल बढ़ जाता है. बड़े पंपसेट और ट्यूबवेल की ज्यादा संख्या के साथ-साथ पानी का स्तर गिरने से जमीन धंस सकती है.'
समस्या सिर्फ पानी की भारी कमी तक ही सीमित नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि सिंचाई के पानी की गुणवत्ता भी खराब हो रही है, जिससे खेती वाली मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है. प्रोफेसर मित्तल दक्षिण-पश्चिमी पंजाब में गहरे कुओं से पानी निकालने से जमीन में होने वाले बदलाव के बारे में बताते हैं कि 'दक्षिण-पश्चिमी पंजाब में, अत्यधिक दोहन से खारेपन का विकास तेज हो गया है और कुल घुलनशील ठोस (टीडीएस) का स्तर बढ़ गया है, जिससे सिंचाई की उपयुक्तता कम हो गई है और मिट्टी में खारापन बढ़ गया है. खराब गुणवत्ता वाले भूजल से लंबे समय तक सिंचाई करने से मिट्टी की पारगम्यता कम हो जाती है, पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित होती है और फसलों की पैदावार घट जाती है.'
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पानी की कमी से बीमारी तक
जैसे-जैसे उथले एक्विफर खत्म हो रहे हैं, पंजाब के जल संकट का सबसे चिंताजनक पहलू सामने आ रहा है. जब ट्यूबवेल पुरानी जलोढ़ मिट्टी में और गहरे खोदे जाते हैं, तो पानी और चट्टानों के बीच लंबे समय तक संपर्क से जमीन के नीचे की केमिस्ट्री पर असर पड़ता है, जिससे पानी की सप्लाई में जहरीले खनिज मिल जाते हैं.
प्रोफेसर मित्तल गहरे स्तर से पानी निकालने से होने वाली केमिकल प्रतिक्रियाओं के बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं, 'जैसे-जैसे भूजल गहरी जलोढ़ मिट्टी से होकर गुजरता है, उसमें घुले हुए लवण (salts), बाइकार्बोनेट, नाइट्रेट, फ्लोराइड और यूरेनियम की मात्रा अक्सर बढ़ जाती है, जिससे पानी की गुणवत्ता लगातार खराब होती जाती है.'
मालवा जैसे इलाकों में, इस बदलाव ने पीने के पानी की गंभीर समस्या पैदा कर दी है. प्रोफेसर मित्तल के मुताबिक, 'खराब गुणवत्ता वाला भूजल पंजाब में, खासकर मालवा क्षेत्र में, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती है. यहां भूजल में अक्सर यूरेनियम, फ्लोराइड, खारापन (salinity), नाइट्रेट, कठोरता (hardness) और TDS/EC की मात्रा पीने के पानी के लिए तय सीमा से ज्यादा होती है.'

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पानी की इस खराब गुणवत्ता का असर ग्रामीण आबादी पर बड़े पैमाने पर और गंभीर रूप से पड़ रहा है. प्रोफेसर मित्तल बताते हैं, 'यूरेनियम-युक्त पानी के लंबे समय तक सेवन से किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और रेडियोलॉजिकल और केमिकल स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं. फ्लोराइड की अधिकता से दांतों और हड्डियों में फ्लोरोसिस हो सकता है, जबकि नाइट्रेट का उच्च स्तर शिशुओं में मेथेमोग्लोबिनेमिया ('ब्लू बेबी सिंड्रोम') का कारण बन सकता है और लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में योगदान दे सकता है. ज्यादा खारापन और सोडियम की मात्रा से हाइपरटेंशन और हृदय संबंधी तनाव का खतरा बढ़ जाता है.'
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हालात बदलना: 2039 तक की उल्टी गिनती
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि पंजाब के जल संकट के कारण हो सकता है कि पूरे राज्य में रातो-रात नल सूख न जाएं, लेकिन सरकारी अनुमान एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं जो बताती है कि एक्विफर की ऊपरी परतें पूरी तरह से खत्म हो सकती हैं.
डॉ. बावेजा कहती हैं, 'CGWB ने चेतावनी दी है कि पंजाब 2039 तक 300 मीटर की गहराई तक अपने एक्विफर का पानी खत्म कर देगा. यह बहुत चिंताजनक स्थिति है क्योंकि इससे ग्रामीण संकट बढ़ेगा.'
इस जरूरी स्थिति को समझते हुए, डॉ. वट्टा जोर देते हैं कि भले ही पानी का कम होना एक धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रिया है, लेकिन मौजूदा रास्ते पर चलते रहने से पंजाब की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा. उन्होंने कहा, 'ऐसा नहीं है कि पंजाब में एक ही तारीख को हर जगह भूजल खत्म हो जाएगा, लेकिन जिस तरह से अभी काम हो रहा है, वह लंबे समय तक नहीं चल सकता. लंबे समय में, पानी की कमी से पीने के पानी की सुरक्षा को खतरा है, पानी की गुणवत्ता और खारेपन की समस्याएं बढ़ सकती हैं, और पंजाब की धान-गेहूं आधारित अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में इसके योगदान पर बुरा असर पड़ सकता है.'

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खेती से जुड़ी आजीविका और लोगों की सेहत, दोनों को बचाने के लिए विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि आने वाले दशक में नीतिगत कदम तेजी से, तालमेल के साथ और संरचनात्मक स्तर पर उठाए जाने चाहिए. डॉ. वट्टा सुधार के लिए जरूरी रोडमैप बताते हुए कहते हैं, 'अगर तेजी से बदलाव नहीं हुआ, तो खेती और महंगी, असमान और जोखिम भरी होती जाएगी. पंजाब को अच्छी कमाई वाली फसल विविधता, लंबे समय तक खेत में रहने वाली धान की किस्मों के तहत रकबे में कमी, कम समय में तैयार होने वाली किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने, सीधे बीज बोने (DSR) और 'अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' (खेत को बारी-बारी से गीला और सूखा रखने) जैसी तकनीकों के साथ-साथ बेहतर नहर सिंचाई और भूजल रिचार्ज की जरूरत है. अगला दशक बहुत अहम होगा.'
चूंकि ये अनुमान चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में आने वाले कृषि, स्वास्थ्य और वित्तीय संकट को टालने के लिए पंजाब के जल संकट से सफलतापूर्वक निपटना बहुत जरूरी है.
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