- कांग्रेस ने 2025 में भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाया था, लेकिन अब उन्हें असम भेज दिया गया है
- पंजाब कांग्रेस में राजा वडिंग को लेकर विवाद हुआ, चन्नी समर्थक नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष बदलने की मांग की
- कांग्रेस ने अब सचिन पायलट को नया प्रभारी बनाया है, जो प्रदेश में नेताओं के बीच सहमति बनाने की चुनौती संभालेंगे
कहते हैं कि शेर की सवारी करने वाले से जरा सी चूक होने पर वो खुद शेर का शिकार बन जाता है. कांग्रेस आलाकमान ने 2025 की शुरुआत में जब भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाया तो सूत्रों के मुताबिक उन्होंने पार्टी नेतृत्व से जानना चाहा कि क्या प्रदेश नेतृत्व को बदलने को लेकर कोई विचार है? बीते पंजाब विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के फौरन बाद नवजोत सिंह सिद्धू की जगह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए राजा वडिंग को पद पर तीन साल होने वाले थे. राजा वडिंग और विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा एक ही जाति से आते हैं. लेकिन बघेल को यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश मिला और इसके बाद उन्होंने राजा वडिंग के साथ मिलकर संगठन पर काम करना शुरू कर दिया.
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री बघेल को जब पंजाब भेजा गया, तब कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब के पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को हिमाचल प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाने की पेशकश की थी. जालंधर से सांसद चन्नी ने तब पार्टी को संदेश दिया था कि वो पंजाब में ही काम करना चाहते हैं.
पंजाब कांग्रेस में कहां से शुरू हुआ विवाद?
लेकिन इस साल की शुरुआत से ही पंजाब कांग्रेस में अचानक खींचतान शुरू हो गई. दलित समाज से आने वाले चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग को लेकर पंजाब कांग्रेस के कई नेताओं ने पार्टी आलाकमान को चिट्ठी लिखी. गतिरोध बढ़ता देख कांग्रेस अध्यक्ष खरगे और राहुल गांधी ने पंजाब के वरिष्ठ नेताओं के साथ कई दौर की बातचीत की और सभी नेताओं को बयानबाजी से दूर रहने की हिदायत दी गई. विवाद बढ़ता देख कांग्रेस नेतृत्व ने अजय माकन की अध्यक्षता में एक कमेटी बना कर रिपोर्ट देने को कहा. सूत्रों के मुताबिक तमाम फीडबैक और सर्वे के आधार पर माकन ने अपनी रिपोर्ट में भी चन्नी को कमान सौंपने की पैरवी की थी. लेकिन लंबे इंतज़ार के बाद एक जुलाई को कांग्रेस ने ऐलान किया कि राजा वडिंग प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बने रहेंगे. चन्नी को प्रचार समिति का प्रमुख बनाया गया.

इससे ना केवल चन्नी बल्कि सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा, विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा, विधायक परगट सिंह, राणा गुरजीत, पूर्व सांसद विजय इन्द्र सिंगला जैसे तमाम नेता नाराज़ हो गए. उन्होंने पार्टी को अंदरखाने संदेश दे दिया कि उन्हें राजा का नेतृत्व मंज़ूर नहीं है और वो उनके साथ मंच तक साझा नहीं करेंगे. इसके बाद भूपेश बघेल ने चंडीगढ़ जाकर नाराज़ नेताओं को मानने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे. इस दौरान नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सवाल पूछे जाने पर बघेल ने कहा था कि “ये कोई गुड्डा-गुड़िया का खेल नहीं है”.
इसके कुछ समय बाद जब बघेल बूथ कार्यकर्ताओं की बैठक करने दोबारा पंजाब पहुंचे तो तमाम जगहों पर उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा. कुछ जगहों पर “बघेल गो बैक” के पोस्टर लगे नजर आए. इसकी वजह ये थी कि बघेल की छवि राजा के संरक्षक की बन गई थी.
भूपेश बघेल का क्यों हुआ तबादला?
हालांकि बघेल के करीबी सूत्रों का कहना है कि वो किसी के समर्थन या विरोध में नहीं थे. पहले पार्टी आलाकमान बदलाव के मूड में नहीं थी और बाद में बघेल ने दलील दी कि चुनाव से ठीक पहले प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदला जाना चाहिए. इसकी वजह ये थी कि जिला स्तर पर मौजूदा संगठन राजा वडिंग ने तैयार किया था. ज्यादातर जिला अध्यक्ष भी राजा वडिंग के साथ हैं. यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का विश्वास जीत चुके राजा वडिंग ने बीते विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की लहर के बावजूद अपनी सीट बचाई और बाद में लोकसभा चुनाव में लुधियाना से भी जीत दर्ज की. इन सबकी वजह से दिल्ली की नजर में उनकी स्थिति मजबूत थी. लेकिन इसके बावजूद उनकी कार्यशैली और बयानबाजी को लेकर वरिष्ठ नेताओं के विरोध स्वरूप बदलाव का मन बना लिया गया.

कांग्रेस के उच्च सूत्रों की मानें तो कांग्रेस नेतृत्व ने जून में विजय इन्द्र सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला कर लिया था. सिंगला पार्टी के प्रमुख हिंदू चेहरों में से एक हैं और दिल्ली दरबार के करीबी माने जाते हैं. बताया जाता है पहले सभी नेता इस पर राजी हुए थे लेकिन आखिरी वक्त में चन्नी खुद को कमान सौंपने की पैरवी करने लगे. इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व को समझ आ गया कि राजा विरोधी मोर्चा एकजुट नहीं है और इनके बीच आम सहमति भी नहीं है.
चरणजीत सिंह चन्नी क्यों नहीं बन सके प्रदेश अध्यक्ष?
सवाल उठता है कि आख़िर सर्वे रिपोर्ट में आगे होने के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने चन्नी को पंजाब का प्रदेश अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया? सूत्रों के मुताबिक जो दलित कार्ड चन्नी के पक्ष में जाता है वही उनके खिलाफ भी है. पिछले पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह चन्नी को सीएम बनाया. पंजाब का पहला दलित सीएम होने और राज्य में देश की सबसे बड़ी दलित आबादी के बावजूद चुनाव में दलित वोटर तो एकजुट नहीं हुए उल्टे जट सिख ख़िलाफ़ में गोलबंद हो गए. चन्नी ख़ुद दो सीटों से चुनाव हारे और हार के बाद क़रीब साल भर तक सियासी गतिविधियों से दूर रहे. इस दौरान काफ़ी समय तक वो विदेश में रहे. लोकसभा चुनाव में जालंधर में बड़ी जीत दर्ज कर उन्होंने वापसी की, लेकिन उनका हिमाचल का ऑफ़र ठुकराना पार्टी आलाकमान को रास नहीं आया. चन्नी के ख़िलाफ़ चल रहे ईडी मामलों में कोई बड़ी कार्रवाई नहीं किए जाने से भी पार्टी आलाकमान के भीतर उनकी निष्ठा को लेकर दुविधा पैदा हुई. इन सब के बावजूद जिस तरह चन्नी ने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए दबाव बनाने की कोशिश की वो भी उनके ख़िलाफ़ गई. इसके बावजूद बड़े दलित चेहरे के तौर पर उन्हें प्रचार अभियान समिति की कमान सौंपी गई.

लेकिन चन्नी ने विरोध का झंडा उठाए रखा और आख़िरकार कांग्रेस नेतृत्व को भूपेश बघेल को पंजाब से हटाना पड़ा, क्योंकि उनकी छवि "तटस्थ" नहीं रह गई थी. उन्हें अब असम का प्रभारी बनाया गया है. इस फेरबदल से आलाकमान ने पंजाब के नाराज़ नेताओं को साधने की कोशिश की है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष बदलने की उनकी मांग बरक़रार है.
भूपेश बघेल के प्रभारी पद के हटने से चन्नी खेमे में खुशी
चन्नी अब यह तो मान बैठे हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा, लेकिन वो और दूसरे नेता राजा वडिंग को किसी भी सूरत में प्रधान पद से हटवाना चाहते हैं. भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने को कामयाबी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए चन्नी कैम्प के उच्च सूत्रों ने एनडीटीवी से कहा कि “राजा वडिंग को हटाने की हमारी मांग बरकरार है. दलित समाज से आने वाले देश के पूर्व गृह मंत्री बूटा सिंह को लेकर दिए गए उनके बयान से कांग्रेस को काफ़ी नुक़सान हो रहा है. उन्हें जितनी जल्दी हटाया जाए उतना बेहतर होगा.”
आने वाले बदलावों की तरफ़ इशारा करते हुए कांग्रेस के एक उच्च सूत्र ने कहा, “आधा सफ़र पूरा हुआ है, अभी आधा और बाक़ी है.”

सचिन पायलट क्या दूर कर पाएंगे गतिरोध?
ज़ाहिर है जिस तरह दबाव में आकर प्रभारी को बदला गया है उससे साफ़ है दबाव और बढ़ा तो देर-सवेर कांग्रेस आलाकमान को प्रदेश अध्यक्ष भी बदलना होगा. उसके बिना गतिरोध दूर होना मुश्किल है. अगले अध्यक्ष के तौर पर वरिष्ठ नेता और फिलहाल विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा का नाम सबसे आगे है. विजय सिंगला भी रेस में हैं. नए प्रभारी सचिन पायलट के पास व्यापक राजनीतिक अनुभव है. सूत्रों के मुताबिक वो पहले प्रदेश के सभी वरिष्ठ नेताओं से बात करने के बाद पार्टी आलाकमान से चर्चा करेंगे. पायलट के सामने पहली चुनौती यही होगी कि बिना राजा को बदले क्या वो सभी नेताओं को साथ ला पाएंगे? अगर बदलाव हुआ तो बाजवा के नाम पर रंधावा को कैसे मनाया जाएगा? पायलट बघेल वाली गलती दोहराने से बचना चाहेंगे. कांग्रेस के पास समय बेहद सीमित है.
सब कुछ ठीक होने के बाद ही राहुल गांधी पंजाब का दौरा करेंगे और पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश देने की कोशिश करेंगे. अंदरूनी लड़ाई खत्म किए बिना चुनाव में कांग्रेस शायद ही आम आदमी पार्टी सरकार को कोई चुनौती दे पाए. अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आप के अलावा अकाली दल, बीजेपी और वारिस पंजाब दे भी मैदान में हैं.
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