विज्ञापन

अंदरूनी कलह से परेशान हैं पंजाब के राजनीतिक दल, क्या बिना एकता के मिल पाएगी चुनाव में जीत

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले वहां के राजनीतिक दलों की हालत का बयान कर रहे हैं मनजीत सहगल. आइए जानते हैं कि चुनाव जीतने के लिए किस दल को किस चीज की जरूरत है.

अंदरूनी कलह से परेशान हैं पंजाब के राजनीतिक दल, क्या बिना एकता के मिल पाएगी चुनाव में जीत
नई दिल्ली:

2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. राजनीतिक दलों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि लगभग हर पार्टी अपने अंदरूनी झगड़ों से जूझ रही है. कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा वडिंग के बीच खींचतान चल रही है. आम आदमी पार्टी में सत्ता विरोधी लहर और बगावत के डर से निपटने की कोशिशें जारी हैं. बीजेपी में आंतरिक असंतोष है. वहीं शिरोमणि अकाली दल में गुटबाजी, कट्टरपंथी रणनीति और गठबंधन को लेकर असमंजस की स्थिति है. इस हालत ने चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही राजनीतिक दलों की संगठनात्मक विश्वसनीयता को कमजोर किया है.

कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई आप को फिर दिला सकती है सत्ता 

कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच की दूरी कम करने में नाकाम रहा है. इससे साफ है कि पार्टी की समस्या सिर्फ नेताओं के बीच सामान्य राजनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के स्तर पर भी गंभीर संकट पैदा हो गया है.

पंजाब यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर आशुतोष कुमार के मुताबिक,''पार्टी नेतृत्व ने दोनों नेताओं के बीच विवाद खत्म करने के लिए कई बार कोशिश की. प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने लंबी बैठकें कीं और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी नेताओं को अनुशासन में रहने की सख्त चेतावनी दी. इसके बावजूद दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व न तो नेताओं के बीच समझौता करा पाया और न ही सत्ता और संगठन में जिम्मेदारियों के बंटवारे का कोई ऐसा फार्मूला बना सका, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें. उनका कहना है कि नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने के बजाय केंद्रीय नेतृत्व की निष्क्रियता ने विवाद को और बढ़ा दिया है. अब यह लड़ाई खुलकर सामने आ गई है. पार्टी के कार्यक्रमों का बहिष्कार, अलग-अलग क्षेत्रों में समानांतर बैठकें और सार्वजनिक रूप से पोस्टर के जरिए एक-दूसरे पर हमला इसके उदाहरण हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों और चुनावी विशेषज्ञों का कहना है कि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा वड़िंग और चन्नी खेमों के बीच चल रही आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति है. चंडीगढ़ के चुनावी विश्लेषक प्रोफेसर गुरमीत सिंह के मुताबिक, दोनों गुट एक-दूसरे पर साजिश और पार्टी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगा रहे हैं. वे कहते हैं कि इस तरह दोनों गुट अनजाने में विपक्ष का काम आसान कर रहे हैं.
चन्नी खेमा आरोप लगाता है कि वड़िंग का संगठन पर नियंत्रण पंजाब के दलित नेतृत्व को किनारे करने की कोशिश है.वहीं वड़िंग के समर्थकों का मानना है कि चन्नी संगठन में महत्वपूर्ण पद हासिल करने के लिए दबाव बना रहे हैं.ऐसे में कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई अगर इसी तरह जारी रहती है, तो इसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिल सकता है. पार्टी के सामने पहले से सत्ता विरोधी माहौल की चुनौती है,लेकिन कांग्रेस का आपसी संघर्ष उसके लिए चुनाव में बड़ी राहत साबित हो सकता है.

कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का फायदा कौन उठा सकता है

विशेषज्ञों का कहना है कि कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई अब आपसी अविश्वास और शक में बदल गई है. इसका असर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ रहा है. पार्टी के कार्यकर्ता अपने ही साथियों को शक की नजर से देखने लगे हैं. इससे कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच भरोसा कमजोर हो रहा है, जबकि चुनाव में एकजुट अभियान चलाने के लिए यही भरोसा सबसे जरूरी होता है.

पंजाक कांग्रेस के प्रमुख राजा वाडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की लड़ाई का नुकसान पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ सकता है.

पंजाक कांग्रेस के प्रमुख राजा वाडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की लड़ाई का नुकसान पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ सकता है.

ऐसे में सवाल यह है कि चुनाव में इस अंदरूनी कलह का क्या असर पड़ेगा? राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का सबसे बड़ा फायदा सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को मिल सकता है. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,''यह कांग्रेस की खुद से ही लड़ी जा रही लड़ाई है.'आप' भी कई इलाकों में सत्ता विरोधी माहौल और कानून-व्यवस्था को लेकर लोगों की नाराजगी का सामना कर रही है. लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी कलह उसे बड़ी राहत दे रही है. इससे कांग्रेस की अपनी विश्वसनीयता लगातार कमजोर हो रही है.''

सत्तारूढ़ आप ने कांग्रेस के इस आपसी विवाद को चुनावी मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है. पार्टी मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि कांग्रेस को वोट देना अपना वोट बर्बाद करने जैसा होगा. आप की इस रणनीति का असर उन मतदाताओं पर पड़ सकता है जो अभी तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें किस पार्टी को वोट देना है. कांग्रेस में जारी लड़ाई से भ्रमित होकर ये स्विंग वोटर दोबारा आप के पक्ष में जा सकते हैं.

भगवंत मान का कांग्रेस पर हमला

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी अपनी चुनावी सभाओं में कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई पर लगातार निशाना साध रहे हैं. उन्होंने कांग्रेस नेताओं पर तंज कसते हुए कहा है कि अगर कांग्रेस के नेताओं को एक रिक्शे में बैठने के लिए भी कहा जाए, तो वे इस बात पर लड़ने लगेंगे कि ड्राइवर की सीट पर कौन बैठेगा. मान ने कांग्रेस नेताओं के आपसी संबंधों पर कटाक्ष करते हुए कहा,''देखिए कांग्रेस के नेता एक-दूसरे से कितना प्यार करते हैं. रंधावा और चन्नी में टकराव है, चन्नी और बाजवा एक राय पर नहीं हैं और चन्नी और वडिंग के बीच तो खुली लड़ाई चल रही है.'' कांग्रेस की अंदरूनी कलह पर भगवंत मान की यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई है.

आम आदमी पार्टी कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी और राजा वाडिंग की लड़ाई का फायदा उठाना चाह रही है. इसिलए वह कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई को मुद्दा बना रही है.

आम आदमी पार्टी कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी और राजा वाडिंग की लड़ाई का फायदा उठाना चाह रही है. इसिलए वह कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई को मुद्दा बना रही है.

कुल मिलाकर, कांग्रेस का आपसी संघर्ष अगर चुनाव तक जारी रहता है, तो इससे पार्टी को जमीनी स्तर पर नुकसान हो सकता है. वहीं, 'आप' इस कमजोरी का फायदा उठाकर अपने खिलाफ मौजूद सत्ता विरोधी माहौल को कम करने की कोशिश कर रही है. 

सत्तारूढ़ 'आप' को भले ही चन्नी और वडिंग की लड़ाई का फायदा मिल रहा हो, लेकिन पंजाब में वह खुद भी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है. लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने के बावजूद पार्टी के खिलाफ नाराजगी बढ़ने की चुनौती बनी हुई है. सत्ता विरोधी माहौल से निपटने के लिए 'आप' ने पंजाब में विधानसभा क्षेत्रों के स्तर पर एक आक्रामक रणनीति अपनाई है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमन अरोड़ा और उनकी टीम ने अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में स्वतंत्र प्रदर्शन ऑडिट शुरू की है. कई महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी समन्वयकों को बदल दिया गया है. इसका उद्देश्य ऐसे नेताओं की पहचान करना है,जिन्हें मौजूदा विधायकों की जगह चुनाव मैदान में उतारा जा सके. साथ ही पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व संगठन पर अपनी पकड़ और अनुशासन मजबूत करना चाहता है. यह पूरी प्रक्रिया किसी कॉरपोरेट कंपनी की तरह प्रदर्शन की जांच करने जैसी है. इसका मकसद चुनाव में 'आप' के कमजोर होते प्रदर्शन को रोकना है.

2022 के विधानसभा चुनाव में पंजाब के शहरी इलाकों में 'आप' को करीब 42 फीसद वोट मिले थे. लेकिन हाल में हुए स्थानीय निकाय और नगर निगम चुनाव में उसका शहरी वोट शेयर घटकर करीब 36 फीसद रह गया है. हालांकि, 117 विधानसभा क्षेत्रों में समानांतर हलका (विधानसभा क्षेत्र) प्रभारी नियुक्त करने की रणनीति ने पार्टी के भीतर एक नई समस्या पैदा कर दी है. मौजूदा विधायकों और इन नए हलका प्रभारियों के बीच अधिकार और टिकट को लेकर टकराव बढ़ रहा है.

चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजिंदर जादौन के मुताबिक, अगर मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाते हैं और समानांतर हलका प्रभारियों के बीच टिकट के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तो इससे पार्टी में बगावत बढ़ सकती है. नाराज नेता दूसरी पार्टियों का रुख भी कर सकते हैं.

संदीप पाठक बढ़ा सकते हैं आप की मुश्किलें 

'आप' के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव संदीप पाठक के बीजेपी में जाने चले गए हैं. माना जाता है कि पाठक ने पंजाब में 'आप' के संगठन को मजबूत करने और उसकी चुनावी मशीनरी तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

राजिंदर जादौन का कहना है कि पाठक के जरिए बीजेपी को 'आप' की सीधी और अंदरूनी जानकारी मिल सकती है. 'आप' को डर है कि पाठक पार्टी के नाराज नेताओं को बीजेपी में लाने में मदद कर सकते हैं. इसके अलावा उन्हें 'आप' के बूथ मैनेजमेंट, जमीनी स्तर की रणनीति और चुनावी अभियान चलाने के तरीके की भी अंदरूनी जानकारी है. ऐसे में पठाक का बीजेपी में जाना 'आप' के लिए एक बड़ी संगठनात्मक चुनौती बन सकता है.

क्या कलह से बीजेपी भी परेशान है

संदीप पठाक के 'आप' के राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर काम करने का अनुभव बीजेपी को बूथ स्तर की रणनीति समझने में मदद कर सकता है. लेकिन पंजाब में बीजेपी का विस्तार अभियान अपने साथ एक बड़ा विरोधाभास भी लेकर आया है. एक तरफ शहरी इलाकों में बीजेपी का वोट बैंक बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी का आंतरिक संगठन गंभीर गुटबाजी से जूझ रहा है.

पार्टी के भीतर अलग-अलग गुटों के बीच बढ़ते टकराव से उसका संगठन कमजोर हो रहा है. ऐसे में बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ 'आप' और कांग्रेस से चुनावी मुकाबला करने की नहीं है, बल्कि अपने ही संगठन को एकजुट रखने की भी है. पंजाब में बीजेपी के संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश ने पार्टी की प्रदेश इकाई में ही बगावत पैदा कर दी है. संगठन में किए गए बदलावों के बाद कई नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है. इनमें सुखमिंदरपाल सिंह ग्रेवाल, चेतन मोहन जोशी, डॉ. जगमोहन सिंह राजू और मनिंदर कप्याल जैसे नेता शामिल हैं. कप्याल ने संगरूर जिले में नए जिला अध्यक्ष की नियुक्ति के विरोध में इस्तीफा दिया. वहीं फरीदकोट, होशियारपुर, खन्ना, श्री मुक्तसर साहिब और संगरूर-1 में पांच अन्य जिलों के अध्यक्षों को अचानक हटाए जाने से भी पार्टी के भीतर नाराजगी खुलकर सामने आ गई है.

बीजेपी भी कांग्रेस की तरह अंदरूनी लड़ाई से परेशान है. बीजेपी में नए और पुराने नेताओं के बीच मनमुटाव है.

बीजेपी भी कांग्रेस की तरह अंदरूनी लड़ाई से परेशान है. बीजेपी में नए और पुराने नेताओं के बीच मनमुटाव है.

संगठन में किए जा रहे बदलावों से बीजेपी के भीतर एक और बड़ा सत्ता संघर्ष सामने आया है. यह संघर्ष पार्टी के पारंपरिक 'पुराने नेताओं' और दूसरी पार्टियों से बीजेपी में आए नेताओं के बीच है. एक तरफ पार्टी के पुराने नेता और वैचारिक रूप से लंबे समय से बीजेपी से जुड़े कार्यकर्ता हैं. दूसरी तरफ कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़, परनीत कौर, मनप्रीत बादल जैसे कांग्रेस से बीजेपी में आए नेता हैं. दोनों खेमों के बीच संगठन में प्रभाव और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को लेकर खींचतान बढ़ रही है.

क्या अकाली दल के लिए जरूरी है बीजेपी का साथ 

चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में बीजेपी को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए शिरोमणि अकाली दल के साथ दोबारा रिश्ते सुधारने पर विचार करना चाहिए. हाल में हुए नगर निकाय चुनावों में अकाली दल को करीब 8.98 फीसद शहरी वोट मिले. अगर यह वोट बीजेपी के अपने शहरी वोट बैंक के साथ जुड़ता है, तो दोनों का संयुक्त वोट शेयर 26.5 फीसद से अधिक हो सकता है. इस स्थिति में बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन सीधे कांग्रेस को चुनौती देने की स्थिति में आ सकता है.

कभी ग्रामीण पंजाब में बेहद मजबूत मानी जाने वाली शिरोमणि अकाली दल अब पिछले करीब एक दशक से लगातार राजनीतिक गिरावट का सामना कर रही है. 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे 34.73 फीसद वोट मिले थे. 2017 में यह घटकर 25.24 फीसद रह गया और 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 18.38 फीसद रह गया. यह उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था.
हाल में हुए नगर निकाय चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि शहरों में अकाली दल की स्थिति और कमजोर हुई है. शहरी इलाकों में उसका वोट शेयर करीब नौ फीसद, जबकि अर्ध-शहरी कस्बों में करीब 11 फीसद रहा.

अकाली दल नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि उसका पारंपरिक पंथक वोट बैंक भी पार्टी से दूर होता दिखाई दे रहा है. इस वोट बैंक को अब अकाली दल 'वारिस पंजाब दे' जैसे नए राजनीतिक समूह चुनौती दे रहे हैं. इससे उसका पारंपरिक आधार कमजोर हुआ है.

ऐसी अटकलें हैं कि अकाली अपने टूटे हुए गुटों और 'वारिस पंजाब दे' समेत अन्य अकाली समूहों से संपर्क कर सकता है. इसका उद्देश्य सभी पंथक वोटों को एकजुट करना और अगले विधानसभा चुनाव से पहले अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को मजबूत करना है.

क्या एकजुटता से ही मिलेगी 2027 में जीत 

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, पार्टी के भीतर की बगावत खत्म करना, अलग-अलग गुटों को एकजुट करना और चुनावी अभियान में एकता बनाए रखना. 'आप' की मुफ्त और कल्याणकारी योजनाओं के कारण अब भी लोगों के बीच पकड़ बनी हुई है. लेकिन पार्टी को बढ़ते सत्ता विरोधी माहौल का सामना करना पड़ रहा है. अकाल तख्त की ओर से सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ जारी आदेश के बाद 'आप' को अपने पारंपरिक पंथक वोटों के नुकसान की भी आशंका है.

कांग्रेस के पास अब भी अपना मजबूत और पारंपरिक वोट बैंक है. लेकिन पार्टी के भीतर लगातार बढ़ रही गुटबाजी और एक-दूसरे को कमजोर करने की कोशिशें उसकी चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा रही है. दूसरी ओर, बीजेपी पंजाब के शहरी इलाकों में तेजी से अपना संगठन और जनाधार बढ़ा रही है. लेकिन ग्रामीण पंजाब से दूरी और पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी उसके लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.वहीं शिरोमणि अकाली दल (SAD) गंभीर संगठनात्मक टूट और बिखराव के दौर से गुजर रहा है. पार्टी के सामने अपने पारंपरिक पंथक और ग्रामीण आधार को दोबारा मजबूत करने की बड़ी चुनौती है.

ऐसे में 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में जीत उसी पार्टी की होगी, जो अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने, गुटबाजी पर काबू पाने और एक मजबूत टीम की तरह चुनाव लड़ने में सफल होगी.

ये भी पढ़ें: मोदी से मिल रहे बादल, राहुल अमरिंदर के कायल, पंजाब की सियासत में गजब हलचल

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Punjab Assembly Election 2027, Aam Aadmi Party, Congress, BJP
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com