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पंजाब में अब बसपा ने छोड़ा अकाली दल का साथ, गठबंधन टूटने का चुनाव पर क्या होगा असर

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सपा से हुआ गठबंधन तोड़ते हुए अकेले ही विधानसभा चुनाव मे उतरने की घोणणा की है.

चंडीगढ़:

मुश्किल दौर से गुजर रहे शिरोमणि अकाली दल (शिअद) को एक और बड़ा झटका लगा है. पहले बीजेपी ने उससे चुनावी गठबंधन करने से इनकार किया, अब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने उससे अलग होकर पंजाब विधानसभा चुनाव अकेले ही लड़ने का फैसला किया है.

बसपा प्रमुख मायावती ने पिछले हफ्ते लखनऊ में पंजाब के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की. इस बैठक में पंजाब में पार्टी का जनाधार बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा हुई. मायावती ने साफ कर दिया कि जिस तरह बसपा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अपने दम पर चुनाव लड़ती है, उसी तरह पंजाब में भी पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ेगी. उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में दूसरे दलों के साथ गठबंधन करने से बसपा को सीटों और वोट फीसद, दोनों में नुकसान हुआ. इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटता है.

शिअद और बसपा ने मिलकर लड़ा था पिछला चुनाव 

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में शिअद और बसपा के बीच गठबंधन था. कुल 117 विधानसभा सीटों में से बसपा ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था. बसपा ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें आठ दोआबा की. सात मालवा की और माझा की पांच सीटें शामिल थीं. लेकिन बसपा 20 में से केवल नवांशहर सीट ही जीत पाई थी.

मायावती का इस बार अकेले चुनाव लड़ने का फैसला अकाली दल के लिए एक संदेश भी हो सकता है. अकाली दल लगातार बीजेपी के साथ अपना पुराना गठबंधन दोबारा बनाने की कोशिश कर रहा है. दोनों दलों का गठबंधन सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूट गया था. दूसरी संभावना यह है कि बसपा अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके समान विचारधारा वाले दूसरे दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हो.

क्या अकाली दल के लिए झटका है बसपा का जाना

बसपा का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला अकाली दल के लिए भले ही बहुत बड़ा चुनावी नुकसान न हो, लेकिन राजनीतिक रूप से यह महत्वपूर्ण झटका जरूर है. खासकर इसलिए क्योंकि इससे पहले बीजेपी ने भी अकाली दल के साथ अपना पुराना गठबंधन फिर बहाल करने से इनकार कर दिया था.

राजनीति के जानकारों का कहना है कि बसपा के अलग होने से अकाली दल के पास पंजाब के बड़े दलित वोट बैंक के एक हिस्से तक पहुंच बनाने का एक महत्वपूर्ण रास्ता खत्म हो गया है. चंडीगढ़ में रहने वाले चुनाव विश्लेषक प्रोफेसर गुरमीत सिंह के मुताबिक, पंजाब की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी करीब 32 फीसद है, जो देश में सबसे ज्यादा है. इसलिए बसपा का गठबंधन से अलग होना उसके मौजूदा वोट फीसद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है. उनके अनुसार, पंजाब में बसपा का कुल वोट शेयर करीब 6.1 फीसद तक रहा है. हालांकि, पंजाब में अपनी मजबूत जड़ों के बावजूद पार्टी वह प्रभाव नहीं बना पाई जो 1992 में उसके पास था.

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पंजाब में बसपा ने कब किया था शानदार प्रदर्शन

बसपा ने पंजाब में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन 1992 के विधानसभा चुनाव में किया था. उस समय पार्टी ने नौ सीटें जीती थीं. उसे 16.32 फीसद वोट मिले थे. इसके बाद पंजाब में बसपा का जनाधार लगातार कमजोर होता गया. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर घटकर केवल 1.52 फीसद रह गया. वहीं 2022 के चुनाव में यह बहुत मामूली बढ़कर करीब 1.77 फीसद हो गया. उस चुनाव में पार्टी केवल एक सीट जीत सकी थी. इसलिए सवाल यह है कि अगर बसपा 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ती है, तो क्या अकाली दल को दलित वोटों का बड़ा नुकसान होगा?

चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि बहुत ज्यादा नुकसान होने की संभावना नहीं है. इसकी वजह यह है कि बसपा का मौजूदा वोट शेयर केवल करीब 1.77 फीसद है. हालांकि, दोआबा क्षेत्र में बसपा अकाली दल के दलित वोटों को कुछ हद तक प्रभावित कर सकती है.

प्रोफेसर गुरमीत सिंह के मुताबिक, बसपा का मौजूदा वोट शेयर दिखाता है कि वह अब पंजाब में बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं रह गई है. उनके मुताबिक अकाली दल के लिए बीजेपी के साथ गठबंधन ज्यादा फायदेमंद होता, क्योंकि बीजेपी का वोट शेयर करीब 19 फीसद है. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने फिलहाल गठबंधन से दूरी बनाई है, लेकिन दोनों दलों के बीच बातचीत चल रही है. अंतिम फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व करेगा.

किसके साथ हैं पंजाब के दलित

पंजाब की राजनीति में दलित वोट काफी बंटा हुआ है. इसलिए किसी एक पार्टी के लिए पूरे दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करना आसान नहीं है. दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से कांग्रेस के साथ रहा है. कुछ वर्गों ने अकाली दल का समर्थन किया है, जबकि हाल के सालों में कुछ दलित वोट आम आदमी पार्टी की ओर भी गया है. बसपा की पंजाब में मौजूदगी लगातार बनी रही है, लेकिन उसका प्रभाव सीमित रहा है.

अकाली दल ने लंबे समय से बसपा को दलित वोटों तक पहुंच बनाने के एक विकल्प के रूप में देखा है. साल 1997 में अकाली दल ने बसपा से नाता तोड़कर बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था. इसके बाद 2020 में तीन कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था. इसके बाद जून 2021 में अकाली दल और बसपा ने दोबारा हाथ मिलाया. करीब 25 साल बाद दोनों दल फिर साथ आए थे. हालांकि यह गठबंधन दो साल भी नहीं चल सका.

अकाली-बसपा का पहला गठबंधन कब हुआ था 

शिअद और बसपा के बीच पहला बड़ा चुनावी गठबंधन 1996 में हुआ था. दिवंगत प्रकाश सिंह बादल और बसपा संस्थापक कांशीराम ने 1996 के लोकसभा चुनाव के लिए यह गठबंधन किया था. उस चुनाव में गठबंधन ने पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से 11 सीटें जीती थीं. इनमें से तीन सीटें बसपा को मिली थीं. इन तीन सीटों में बसपा संस्थापक कांशीराम को होशियारपुर में मिली जीत भी शामिल थी. लेकिन 1997 में बसपा का प्रदर्शन तेजी से गिरा. पार्टी सिर्फ एक सीट ही जीत सकी  और उसका वोट शेयर घटकर 7.5 फीसद ही रह गया. इस दौरान अकाली दल ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था.

पंजाब में दलित समाज एकजुट होकर किसी एक पार्टी को वोट नहीं देता. यहां दलित समुदाय अलग-अलग जातियों, धर्मों और क्षेत्रों में बंटा हुआ है. दोआब क्षेत्र में दलित समुदाय का राजनीतिक प्रभाव मालवा की तुलना में ज्यादा माना जाता है. मालवा में बड़ी संख्या में दलित कृषि मजदूर के रूप में काम करते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार राजिंदर जादौन के मुताबिक 2011 की जनगणना में पंजाब की आबादी में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 31.94 फीसद थी. लेकिन इतनी बड़ी आबादी कभी भी बसपा के लिए स्थायी वोट बैंक नहीं बन पाई. दलित समुदाय के अंदर भी अलग-अलग समूह हैं. इनमें एक बड़ा हिस्सा मजहबी सिख और वाल्मीकि का है, जबकि रविदासिया, रामदासिया और आदि-धर्मी दूसरे समूह में आते हैं. बसपा को खासतौर पर दोआबा में रविदासिया और आदि-धर्मी समुदाय के बीच समर्थन मिला था. लेकिन पार्टी पूरे दलित समाज को अपने साथ नहीं जोड़ सकी.

पंजाब में बसपा के कमजोर होने की तीन बड़ी वजह क्या है

विशेषज्ञों के मुताबिक पंजाब में बसपा के कमजोर होने की तीन बड़ी वजहें रही हैं. 

पहली वजह: पंजाब के दलित मतदाता एकजुट नहीं हैं. अलग-अलग दलित जातियां अलग-अलग पार्टियों को समर्थन देती हैं.कांग्रेस, अकाली दल और दूसरी पार्टियों ने इस वोट बैंक को बांट रखा है.

दूसरी वजह: कांशीराम के बाद बसपा पंजाब में मजबूत स्थानीय नेतृत्व तैयार नहीं कर सकी. पार्टी का नियंत्रण मुख्य रूप से लखनऊ से चलता रहा. कई प्रभावशाली स्थानीय नेता कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी में चले गए.

तीसरी वजह: बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने कल्याणकारी योजनाओं, दलित उम्मीदवारों और डेरों के जरिए दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर ली.

इन्हीं कारणों से बसपा का वोट शेयर लगातार गिरता गया. 2017 में यह 1.52 फीसद और 2022 में 1.77 फीसद रह गया. 2022 में अकाली दल के साथ गठबंधन के बावजूद बसपा केवल एक सीट जीत पाई.

पंजाब में कहां बचा है बसपा का जनाधार

राजिंदर जादौन के मुताबिक, अकाली दल के साथ 20 सीटों पर चुनाव लड़ने के समझौते ने बसपा को राजनीतिक रूप से दिखाई तो दिया, लेकिन संगठन को मजबूत नहीं कर पाया. मायावती का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला इस बात का संकेत है कि गठबंधन से पार्टी को अपेक्षित फायदा नहीं मिला.

हालांकि, अकेले चुनाव लड़ने के लिए बसपा के पास न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही पंजाब में कोई मजबूत स्थानीय चेहरा. इसलिए उसका वोट शेयर और कम होने का खतरा भी है.

बसपा का बचा हुआ मजबूत आधार मुख्य रूप से दोआबा क्षेत्र में है. इस इलाके में रविदासिया और आदि-धर्मी समुदाय की अच्छी-खासी आबादी है. इतिहास बताता है कि बसपा ने अकेले चुनाव लड़ने की तुलना में गठबंधन के दौरान बेहतर प्रदर्शन किया है. अकेले चुनाव लड़ने पर उसका वोट अलग-अलग जगहों पर बंटता रहा है. 2022 में शिअद-बसपा गठबंधन की वजह से बसपा को अपनी एकमात्र विधानसभा सीट जीतने में सफलता मिली थी. इस गठबंधन ने अकाली दल को भी दलित वोटों के एक हिस्से तक पहुंच दी थी.

अब मायावती ने यह रास्ता बंद कर दिया है. उनका कहना है कि पुराने गठबंधनों से बसपा को सीटों और वोट फीसद दोनों में नुकसान हुआ. बहुकोणीय मुकाबले में दोआबा की कुछ सीटों पर बसपा का छोटा-सा वोट फीसद भी अकाली दल के लिए नुकसानदेह हो सकता है. बसपा ऐसे वोट काट सकती है, जिन्हें अकाली दल अपने पक्ष में जोड़ना चाहता है.

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शिअद और बसपा में पहला गठबंधन 1996 के लोकसभा चुनाव में हुआ था. उस चुनाव में इन दोनों दलों ने 13 में से 11 सीटें जीत ली थीं.

बसपा का साथ न मिलने से अकाली दल को होगा कितना नुकसान

मायावती का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला अकाली दल के लिए सीटों से ज्यादा राजनीतिक और प्रतीकात्मक झटका है.बीजेपी के अलग होने के बाद बसपा का साथ छोड़ना अकाली दल के लिए दोहरा नुकसान है. इससे दोआबा के रविदासिया और आदि-धर्मी मतदाताओं तक पहुंच का एक रास्ता भी कमजोर हो गया है.

लेकिन बसपा का पूरे पंजाब में केवल 1.77 फीसद वोट शेयर होने का मतलब यह है कि अकाली दल का कोई बहुत बड़ा दलित वोट बैंक उससे अलग नहीं हो रहा है. नुकसान मुख्य रूप से कुछ खास विधानसभा सीटों तक सीमित रह सकता है.दरअसल, पंजाब में दलित वोट किसी एक पार्टी के पास नहीं है. यह अलग-अलग जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के आधार पर बंटा हुआ है और लंबे समय से कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बीच जाता रहा है.

इसलिए अकाली दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती अभी भी बीजेपी के साथ गठबंधन का टूटना है. वहीं बसपा के लिए अकेले चुनाव लड़ने की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि पंजाब में उसके पास पहले से ही सीमित जनाधार है. उसके पास कोई मजबूत स्थानीय चेहरा भी नहीं है.

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