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भाजपा को झटका, तेजस्वी को टेंशन; बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत ने बदली बिहार की राजनीति

भाजपा के लिए यह हार कई सवाल खड़े करती है. पार्टी अपने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरी क्षेत्र को नहीं बचा सकी.

भाजपा को झटका, तेजस्वी को टेंशन; बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत ने बदली बिहार की राजनीति
  • बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट पर जीत हासिल की है
  • युवा और छात्र आंदोलन की नाराजगी ने भाजपा के खिलाफ मतदाताओं के रुख को प्रभावित किया है
  • स्थानीय समस्याओं और विकास के मुद्दों पर भाजपा के खिलाफ मतदाताओं में असंतोष बढ़ा है
बांकीपुर:

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं है. यह बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत भी माना जा सकता है. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में हराकर यह साबित कर दिया कि अब उन्हें सिर्फ चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि जनाधार वाले नेता के रूप में भी देखा जाएगा. यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट थी और यह चुनाव मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भाजपा की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा भी था. ऐसे में इस हार के राजनीतिक मायने काफी बड़े हैं. 

प्रशांत किशोर की जीत किसी एक वजह से नहीं हुई. इसके पीछे कई ऐसे कारण रहे, जिन्होंने मिलकर चुनाव की दिशा बदल दी. सबसे बड़ा कारण रहा युवाओं और छात्रों का गुस्सा. हाल के महीनों में जिस तरह छात्र आंदोलनों और GENZ आंदोलन ने बिहार में माहौल बनाया, उसका असर बांकीपुर जैसे शहरी क्षेत्र में साफ दिखाई दिया. बड़ी संख्या में युवा मतदाता भाजपा से नाराज थे. रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और सरकारी व्यवस्था को लेकर युवाओं की नाराजगी मतदान में भी दिखाई दी. उपचुनाव को देशभर में छात्र आंदोलनों के बाद पहली बड़ी चुनावी परीक्षा माना जा रहा था और नतीजे ने इस नाराजगी की झलक भी दिखाई.

दूसरा बड़ा कारण भाजपा के खिलाफ स्थानीय स्तर पर पैदा हुई नाराजगी रही. बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है. लेकिन लगातार एक ही दल के प्रतिनिधित्व के कारण स्थानीय समस्याओं, विकास और जनसंपर्क को लेकर मतदाताओं में असंतोष भी जमा हो रहा था. उपचुनाव में मतदाताओं ने बदलाव का मौका देखा और उसका फायदा प्रशांत किशोर को मिला. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण स्वयं प्रशांत किशोर की छवि रही. पिछले कई वर्षों से उन्होंने पूरे बिहार में पदयात्रा की, हजारों गांवों का दौरा किया और लोगों से सीधे संवाद बनाया. 

चुनाव लड़ाना अलग बात है और खुद जीतना अलग, पीके ने दिया इसका जवाब

उन्होंने खुद को पारंपरिक नेता की बजाय व्यवस्था बदलने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया. चुनाव के दौरान भी उनका पूरा अभियान इसी भरोसे पर आधारित रहा कि बिहार को नई राजनीति की जरूरत है. उनकी यह छवि मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल रही. इस चुनाव में एक और दिलचस्प बात यह रही कि लोगों ने प्रशांत किशोर को सिर्फ विरोधी उम्मीदवार नहीं, बल्कि एक मजबूत विकल्प के रूप में स्वीकार किया. पहले यह सवाल उठता था कि जो व्यक्ति दूसरों को चुनाव जिताता रहा, क्या वह खुद चुनाव जीत पाएगा? बांकीपुर के नतीजे ने इस सवाल का जवाब दे दिया. अब उनके पास विधानसभा का मंच होगा और इससे उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ जाएगी.

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भाजपा के लिए उठे कई सवाल, सबसे सुरक्षित सीट पर कैसे हुई हार

भाजपा के लिए यह हार कई सवाल खड़े करती है. सबसे पहले, पार्टी अपने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरी क्षेत्र को नहीं बचा सकी. दूसरा, यह सम्राट चौधरी के नेतृत्व में पहला बड़ा चुनाव था, इसलिए इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी से बचना आसान नहीं होगा. तीसरा, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की छोड़ी हुई सीट पर हार का असर सिर्फ पटना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली तक इसकी चर्चा होगी. पार्टी को यह समझना होगा कि केवल संगठन की मजबूती काफी नहीं है, जनता के बीच लगातार संवाद और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता भी उतनी ही जरूरी है.

तेजस्वी के लिए भी चैलेंज, विपक्ष में बन गया एक और ध्रुव

यह जीत तेजस्वी यादव के लिए भी कम चुनौती नहीं है. अब तक बिहार में भाजपा के खिलाफ मुख्य विपक्षी चेहरा तेजस्वी यादव माने जाते थे. लेकिन प्रशांत किशोर के विधानसभा पहुंचने के बाद विपक्ष की राजनीति में एक नया केंद्र बन सकता है. विधानसभा के भीतर सरकार को घेरने में अब तेजस्वी अकेले नहीं होंगे. प्रशांत किशोर अपनी तैयारी, आंकड़ों और प्रशासनिक समझ के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में वे कई मुद्दों पर सरकार को प्रभावी तरीके से चुनौती दे सकते हैं. इसका एक दूसरा असर विपक्षी राजनीति पर भी पड़ेगा. अब भाजपा विरोधी वोटों के सामने दो बड़े चेहरे होंगे—तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर. यदि जन सुराज लगातार अपना जनाधार बढ़ाती है तो आने वाले विधानसभा चुनावों में विपक्षी राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है. तेजस्वी यादव को अब सिर्फ भाजपा से नहीं, बल्कि प्रशांत किशोर की बढ़ती स्वीकार्यता से भी मुकाबला करना पड़ेगा.

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पीके की चुनौतियां भी कम नहीं, विधायक बनकर खुद को साबित भी करना होगा

हालांकि प्रशांत किशोर के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं. एक सीट जीतना और पूरे बिहार में सत्ता तक पहुंचना दो अलग बातें हैं. अब लोगों की उम्मीदें उनसे और बढ़ेंगी. विधानसभा के भीतर उनका प्रदर्शन, जन सुराज संगठन का विस्तार और आने वाले महीनों में जनता के बीच उनकी सक्रियता तय करेगी कि यह जीत केवल एक राजनीतिक सनसनी थी या बिहार की राजनीति में स्थायी बदलाव की शुरुआत. बांकीपुर का संदेश साफ है. बिहार का मतदाता अब परंपरागत राजनीतिक ध्रुवीकरण से आगे बढ़कर नए विकल्पों को भी मौका देने के लिए तैयार है. प्रशांत किशोर की जीत ने यह साबित कर दिया कि अगर कोई नेता लगातार जनता के बीच रहे, भरोसा पैदा करे और बदलाव का स्पष्ट संदेश दे, तो सबसे मजबूत राजनीतिक किले भी ढह सकते हैं. यही कारण है कि बांकीपुर का यह उपचुनाव आने वाले विधानसभा चुनावों की राजनीति पर दूरगामी असर डाल सकता है.

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