- बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज ने जोरदार प्रदर्शन किया
- इस चुनाव में सबसे तगड़ा झटका आरजेडी को लगा है, तीसरे नंबर पर कैंडिडेट
- इस सीट पर बीजेपी ने तो एक बार अपना कैंडिडेट भी बदल दिया था
बिहार की राजनीति में सोमवार का दिन एक बड़ी राजनीतिक उठापटक के लिए जाना जाएगा. लालू यादव के जमाने से बीजेपी का गढ़ रहे बांकीपुर (पहले पटना पश्चिम) सीट पर ऐसे चौंकाने वाले नतीजे आए हैं, जिसकी कल्पना खुद बीजेपी नहीं कर पा रही है. अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर बीजेपी की जीत आसान मानी जा रही थी. लेकिन तभी इस सीट पर एंट्री होती है जनसुराज के चीफ प्रशांत किशोर की. अभी तक बेहद आसान माने जा रही इस सीट पर अचानक से राजनीतिक तापमान बढ़ता है. तापमान इतना बढ़ता है कि बीजेपी को अपने एक कैंडिडेट तक को बदल देना पड़ा. बीजेपी ने पहले अभिषेक बंटी को यहां से कैंडिडेट बनाया था. बंटी ने चुनाव से ठीक पहले अचानक से अपना नाम वापस ले लिया. इसके बीजेपी ने यहां से एक अनजान चेहरे नीरज कुमार सिन्हा को अपना कैंडिडेट बनाया था. पर तीन अगस्त 2026 को बांकीपुर की जनता ने ऐसा फैसला सुनाया जिससे बीजेपी के दिग्गज नेता भी चौंक गए होंगे. प्रशांत किशोर ने बीजेपी के तमाम दिग्गज नेताओं के प्रचार के बाद भी बड़ी जीत दर्ज हासिल की है. प्रशांत किशोर की जीत में वैसे तो कई कारण हैं लेकिन 5 ऐसी वजहें हैं जिसने प्रशांत की जीत का मार्ग प्रशस्त किया.
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नामांकन के बाद प्रत्याशी बदलना बीजेपी को पड़ा भारी
बीजेपी ने इस चुनाव में सबसे पहले अभिषेक बंटी को कैंडिडेट बनाया था. बंटी ने अपना नामांकन तक कर लिया था. बंटी के नामांकन में सीएम सम्राट चौधरी से लेकर बीजेपी के स्टेट चीफ संजय सारावगी तक शामिल हुए थे. लेकिन नामांकन के एक दिन बाद ही बंटी ने उस सीट से अपना नाम वापस ले लिया. बंटी ने व्यक्तिगत कारण बताते हुए नाम वापस लेने की बात कही. लेकिन अंदरखाने ये चर्चा ये थी कि बंटी के परिवार का चारा घोटाला कनेक्शन था. ऐसे में बीजेपी को आशंका थी कि विपक्ष इस मुद्दे को चुनाव में उछाल सकता है. इसके बाद पार्टी ने रणनीतिक बदलाव करते हुए नया उम्मीदवार मैदान में उतारा. पार्टी के इस फैसले के बाद ये संदेश गया कि पार्टी कैंडिडेट के चयन तक में ही जब सतर्क नहीं होती है. इसका चुनाव पर उल्टा असर पड़ा.

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प्रशांत के उतरने से चुनावी नैरेटिव ही बदल गया
बांकीपुर सीट पर प्रशांत के उतरने के बाद ही यहां का चुनावी नैरेटिव ही बदल गया. बांकीपुर की सीट अचानक से हाईप्रोफाइल सीट हो गई. प्रशांत की एंट्री के बाद बीजेपी पूरी तरह से सतर्क हो गई. खुद बीजेपी चीफ नितिन नवीन ने प्रचार को अपने आसपास केंद्रित किया. चुनाव प्रचार में वो ये कहते रहे कि वो यहीं रहेंगे. लेकिन प्रशांत ने पॉजिटिव प्रचार और सरकार पर वार के जरिए पूरा नैरेटिव ही बदल दिया. प्रशांत पूरे प्रचार के दौरान लोगों से घर-घर जाकर मिले. बीजेपी से नाराज तबके को साधने की रणनीति बनाई. उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव में हार से सबक लेते हुए स्थानीय मुद्दों पर ही अपना प्रचार रखा. इसका उन्हें फायदा भी मिला.
बीजेपी के कार्यकर्ता ही नहीं निकले!
बांकीपुर चूंकि बीजेपी का बेहद मजबूत गढ़ माना जाता है. इस सीट पर लालू यादव भी जीत दर्ज नहीं कर पाए थे. बीजेपी के लिए ये सीट काफी आसान मानी जा रही थी. यानी कार्यकर्ताओं को भी पार्टी के नेता इस चुनाव के लिए उत्साहित नहीं कर पाए. पार्टी कार्यकर्ता ये मानकर चल रहे थे पार्टी यहां आसानी से जीत जाएगी. कम वोटिंग भी उसी का नतीजा था. क्योंकि बीजेपी के कार्यकर्ता घर-घर जाकर वोटर्स को बूथ तक ले जाने में असफल रहे. उधर, प्रशांत किशोर ने माइक्रो मैनेजमेंट अपनाते हुए न केवल अपने वोटर्स को बूथ तक ले गए बल्कि सत्ता विरोधी लहर का भी जमकर फायदा उठाया.
Gen Z आंदोलन का असर
चुनाव प्रचार के दौरान कई जगह ऐसे वीडियो देखने को मिले जहां पिता तो बीजेपी का साथ जाता दिख रहा था लेकिन बेटा सत्तारूढ़ दल के खिलाफ. जंतर-मंतर पर हुए Gen Z आंदोलन का असर इस सीट पर भी साफ देखने को मिला. पहली बार वोट डालने वाले वोटर्स इस बार बीजेपी के दूर जाता दिखा. नतीजे भी इस बात की तस्दीक कर रहे हैं. सम्राट चौधरी सरकार को इस आंदोलन का खामियाजा निश्चित तौर पर बांकीपुर सीट पर भुगतने को मिला है.
आरजेडी का वोट बैंक छिटका
2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी बांकपुर सीट पर दूसरे नंबर पर रही थी. उसकी कैंडिडेट रेखा कुमारी को 46 हजार 363 वोट मिले थे. उस चुनाव में नितिन नवीन को 98 हजार 299 वोट मिले थे और वो 51,936 वोटों के बड़े अतंर से जीते थे. लेकिन इस बार के चुनाव में आरजेडी दूसरे से तीसरे नंबर पर खिसक गई है. उसका आधार वोट मुस्लिम और यादव भी इस चुनाव में उससे दूर चला गया. पिछली बार की कैंडिडेट रेखा कुमारी इस बार के चुनाव में दूसरे से तीसरे नंबर पर पहुंच गई. इस बार आरजेडी अपने पिछले प्रदर्शन के आसपास भी नहीं दिख रही है. तेजस्वी यादव का प्रचार में देरी से उतरना. आरजेडी के बड़े नेताओं का प्रचार से दूरी. इसके अलावा आधार वोट बैंक में सेंधमारी ने आरजेडी की हालत खराब कर दी. इस चुनाव में प्रशांत किशोर ने आरजेडी के वोट बैंक में सेंधमारी कर दी है.
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