जब हम 1947 के बंटवारे को याद करते हैं, तो हमारे जेहन में क्या आता है? सरहद की वो खूनी लकीर, उजड़ते हुए घर, और मजहब के नाम पर इंसान का इंसान से बंट जाना. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस वक्त सिर्फ जमीन और आसमान नहीं बंटे थे? उस वक्त दफ्तर का झाड़ू, मेज, कुर्सी, टाइपराइटर, बल्ब और यहां तक कि एक मामूली सा पिन कुशन भी बंटा था.
घर के बंटवारे सा दर्द
जब एक छोटे से घर का बंटवारा होता है, तो आंगन में दीवार उठाना कितना रुला देता है. मां की उदास आंखें और पुरखों की निशानियों को बांटना कलेजा चीर देता है.
तो फिर सोचिए, इतने बड़े मुल्क का जर्रा-जर्रा बांटना कैसा रहा होगा? डोमिनिक लेपियर और लेरी कॉलिन्स की किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में बंटवारे की वो हैरान करने वाली कहानियां हैं, जिन्हें सुनकर यकीन नहीं होता. इसमें एक अफसर एक टॉयलेट पॉट के लिए खोमचे वालों की तरह लड़ रहे थे.

तारीख थी 3 जून 1947. ऐलान हो चुका था कि 14 और 15 अगस्त को हिंदुस्तान दो टुकड़ों में बंट जाएगा. बचे थे सिर्फ 73 दिन, और काम था पहाड़ जैसा. मुल्क की फौज, बैंकों का पैसा, सोने की ईंटें, रेल के इंजन और दफ्तर की छतरियां तक बांटनी थीं. 15 अगस्त का दिन करीब आ रहा था और लॉर्ड माउंटबेटन के पसीने छूट रहे थे.
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जब हाथापाई पर उतर आए बंटवारे के पंच
आखिर ये सब बांटेगा कौन? ये जिम्मेदारी दी गई दो बड़े दिग्गजों को. हिंदुस्तान की तरफ से थे एच एम पटेल, और पाकिस्तान के नुमाइंदे थे चौधरी मोहम्मद अली. 100 कर्मचारियों की फौज दिन-रात फाइलों में सामानों की लिस्ट बनाती और इन वकीलों के पास भेजती.
लेकिन असली ड्रामा तो तब शुरू हुआ जब इन दोनों के बीच ठन गई. सामान बांटते-बांटते नौबत हाथापाई और एक-दूसरे का कॉलर पकड़ने तक आ गई. जरा उस खौफनाक मंजर की कल्पना कीजिए. बाहर सड़कों पर दंगे भड़के हुए थे, इंसान खून का प्यासा था, और बंद कमरों में ये पढ़े-लिखे लोग कांटे, चम्मच और टॉयलेट पॉट के बदले 25 पिन कुशन का मोलभाव कर रहे थे.
इनके झगड़ों से माउंटबेटन इतना तंग आ गए कि उन्होंने दोनों को सरदार पटेल के घर के एक कमरे में बंद कर दिया. फरमान सुना दिया गया कि जब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते, दोनों बाहर नहीं आएंगे. आखिरकार थक-हारकर तय हुआ कि पूरे देश की चल संपत्ति का 80 फीसदी हिस्सा हिंदुस्तान का होगा और 20 फीसदी पाकिस्तान का.

फटी हुई डिक्शनरी और शाही बग्घी का टॉस
लेकिन कुछ किस्से तो आपको हैरान कर देंगे. डिक्शनरी यानी शब्दकोश की सिर्फ एक ही किताब थी और दोनों मुल्क उस पर अड़ गए. नतीजा क्या हुआ? उस किताब को बीच से फाड़कर दोनों मुल्कों में बांट दिया गया.
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अब आते हैं उस दौर की सबसे दिलचस्प कहानी पर. वायसराय के अस्तबल में 12 बेहद शानदार और कीमती बग्घियां खड़ी थीं. 6 पर सोने की नक्काशी थी और 6 पर चांदी की. अब जाहिर सी बात है, सोने की बग्घी किसे नहीं चाहिए? दोनों ही देश सुनहरी बग्घियों पर अड़ गए.मामला उलझता देख वायसराय के एडीसी पीटर होज ने एक नायाब तरकीब निकाली. उन्होंने कहा- चलिए, टॉस कर लेते हैं. एक तरफ थे भारत के मेजर गोविंद सिंह और दूसरी तरफ पाकिस्तान के मेजर याकूब खान. हवा में सिक्का उछाला गया और किस्मत मेहरबान हुई भारत पर. मेजर गोविंद सिंह ने टॉस जीत लिया और वो 6 सुनहरी बग्घियां भारत के हिस्से में आ गईं. आज भी आप गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति भवन की शान देख सकते हैं.

नोट छापने की मशीन देने से भारत ने साफ मना कर दिया, तो पाकिस्तान को हमारे नोटों पर अपनी मोहर लगाकर काम चलाना पड़ा. बस एक चीज ऐसी थी जिस पर कोई विवाद नहीं हुआ, और वो थी शराब. पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक मुल्क चुना था, इसलिए शराब की पूरी खेप भारत में रह गई और बदले में हमने उन्हें पैसे दे दिए.
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सरकारी दफ्तरों का हाल तो और भी अजीब था. पुलिस और सेना के बैंड में बजने वाली बांसुरी, ढोल, बैगपाइप, यहां तक कि टाइपराइटर, स्टेशनरी, मोहरें और कागज-पेंसिल तक बांटे गए. हर एक चीज का पाई-पाई का बही-खाता बना. हालांकि, उस बंटवारे के लेन-देन का हिसाब आज तक नहीं सुलझा है, और पाकिस्तान आज भी अपने तथाकथित बकाये का रोना रोता रहता है.
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