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900 बच्चों को मौत के मुंह से निकालने वाला टीचर, चाहकर भी नहीं रो पाया, नेपाल बाढ़ की ये हकीकत झकझोर देगी

Real story of Nepal Flood: महज 10 मिनट में जमींदोज हुआ स्कूल, लेकिन 900 मासूमों और मौत के बीच ढाल बनकर खड़ा हो गया उनका प्रिंसिपल. पढ़िए नेपाल के उस जांबाज शिक्षक की रोंगटे खड़े कर देने वाली अनकही दास्तान.

Nepal Flood Teacher save 900 Student:सोचिए, क्लासरूम में ब्लैकबोर्ड पर चॉक चल रही है, बच्चे किताबों में मग्न हैं और ठीक 10 मिनट बाद... वो पूरी इमारत, वो खेल का मैदान और जिंदगी भर की यादें पानी के खौफनाक सैलाब में तिनके की तरह बह जाती हैं. यह किसी थ्रिलर फिल्म का सीन नहीं, बल्कि नेपाल की त्रिशूली घाटी में घटी वो खौफनाक हकीकत है जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप जाए. लेकिन मौत के उस तांडव और 900 मासूम जिंदगियों के बीच एक इंसान चट्टान बनकर खड़ा हो गया स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी. जब एक-एक सेकंड जिंदगी और मौत का फैसला कर रहा था, तब इस शिक्षक ने अपनी 23 साल की कमाई, अपनी डिग्रियां और गाड़ी सब कुछ दांव पर लगा दिया, लेकिन 900 घरों के चिरागों को बुझने नहीं दिया. आज पढ़िए उस रियल लाइफ हीरो की आंखों देखी दास्तान, जिसने साबित कर दिया कि एक सच्चा शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नहीं, वक्त आने पर जान की बाजी भी लगा देता है.


उस 10 मिनट में लेना था जिंदगी और मौत का फैसला

सुबह के करीब 9 बज रहे थे. हमेशा की तरह सुबह 6:30 बजे से 8वीं से 12वीं तक की कक्षाएं चल रही थीं. करीब 900 बच्चे स्कूल के कमरों में मौजूद थे. तभी अचानक एक चीख गूंजती है "सर! बाढ़ आ रही है, सब कुछ तबाह हो रहा है!"

पहले-पहल तो किसी को कानों-कान यकीन नहीं हुआ. लगा शायद कोई अफवाह हो.  लेकिन तभी दूसरा साथी हांफता हुआ पहुंचा, "सर, ऊपर का पूरा गांव सैलाब में समा गया है, पानी पल-पल आगे बढ़ रहा है."

उसी वक्त एक अभिभावक बदहवास दौड़ते हुए आए और बोले कि मुझे अपने बच्चे को बचाना है. प्रिंसिपल के सामने उस वक्त दो ही रास्ते थे. उन्होंने सोचा, अगर यह खबर झूठी निकली, तो बच्चों का सिर्फ एक दिन का नुकसान होगा, पढ़ाई का हर्जाना होगा. लेकिन अगर यह बात सच निकली, तो 900 घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ जाएंगे.    

उन्होंने एक सेकंड भी नहीं गंवाया. तुरंत सीटी बजाने के आदेश दिए गए. स्टाफ अलर्ट पर आया और बच्चों को बिना वक्त गंवाए ऊंचे पहाड़ी रास्तों और सुरक्षित छतों की तरफ भागने को कहा गया. प्रिंसिपल खुद सबसे पीछे रहे, ताकि यह पक्का कर सकें कि आखिरी कमरे से भी हर बच्चा सुरक्षित बाहर निकल चुका है.  

बच्चे रो रहे थे, बदहवास होकर अपने मां-बाप को पुकार रहे थे. किसी तरह सबको ऊपर पहाड़ी पर पहुंचाया गया. और जब पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर प्रिंसिपल ने पीछे मुड़कर देखा,  तो वहां सिर्फ पानी का भयानक मंजर था. स्कूल की इमारत का नामो-निशान मिट चुका था. महज 10 मिनट के भीतर सब कुछ जलमग्न हो गया.  

"स्कूल के साथ मेरा सब कुछ चला गया"

प्रिंसिपल के लिए यह सिर्फ एक ईंट-पत्थर की इमारत नहीं थी. उन्होंने अपने बचपन में इसी स्कूल में पढ़ाई की थी. अपनी जिंदगी का 70 फीसदी हिस्सा उन्होंने यहीं बिताया था और पिछले 23 सालों से वहीं बतौर शिक्षक पढ़ा रहे थे. उनकी डिग्रियां, मेडल, गाड़ी, लैपटॉप और 23 साल की तपस्या सब कुछ एक झटके में सैलाब निगल चुका था. 


"अगर मैं रो पड़ता, तो इन बच्चों को कौन संभालता?"

जब बच्चों ने अपने प्रिंसिपल को देखा, तो वे उनसे लिपटकर रोने लगे. किसी अपने को खो देने का डर, आंखों के सामने स्कूल का बह जाना मंजर बेहद खौफनाक था. प्रिंसिपल बताते हैं, "आंखों में आंसू समंदर की तरह उमड़ रहे थे, लेकिन मैंने अपने आंसुओं को थामे रखा. अगर स्कूल का मुखिया ही टूट जाता, तो उन 900 डरे-सहमे बच्चों का हौसला कौन बांधता? उस वक्त रोना नहीं, उनका सहारा बनना जरूरी था."

लेकिन इस बचाव अभियान का सबसे भारी दर्द अभी बाकी था. सुरक्षित ऊंचाई पर पहुंचने के बाद जब गिनती हुई, तो पता चला कि उनके कुछ साथी शिक्षक अब भी लापता हैं, जिनका घर और वजूद सब कुछ उस बाढ़ में समा गया. 

"मैं हीरो नहीं, बस परिवार के मुखिया का फर्ज निभाया"

जब दुनिया उन्हें 'नेपाल का हीरो' कहकर सलाम कर रही है, तो वे बेहद सादगी से कहते हैं, "मैं कोई हीरो नहीं हूं. मैं स्कूल में सिर्फ एक प्रिंसिपल नहीं, उन बच्चों का पिता था. मुसीबत के वक्त परिवार का मुखिया जो करता है, मैंने बस वही फर्ज निभाया है."

आज स्कूल का वजूद मिट चुका है, लेकिन उम्मीदें नहीं टूटी हैं. प्रिंसिपल अब दोबारा स्कूल को किसी सुरक्षित जगह पर खड़ा करने के मिशन में जुट गए हैं. उन्होंने भारत सरकार और दुनिया भर से अपील की है कि वे इस मुश्किल घड़ी में आगे आएं और इन बच्चों के भविष्य को दोबारा संवारने में हाथ बंटाएं. 
 

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