एक मां अपनी बच्ची को महफूज रखने के लिए किस हद तक जा सकती है? तमिलनाडु के तूतुकुड़ी जिले के कट्टुनायक्कनपट्टी गांव में रहने वाले 'मुथु मास्टर' की यह दास्तान आपके रोंगटे खड़े कर देगी. करीब चालीस साल तक लोगों ने मुथु मास्टर को एक सीधे-साधे, मेहनती किसान के रूप में देखा. सफेद शर्ट-धोती, हाथ में कुदाल और होंठों पर सुलगती बीड़ी.
लेकिन इस धोती-कुर्ते के पीछे छिपा था एक ऐसा सच, जिसे सुनकर हर कोई रो देगा. मुथु मास्टर असल में कोई मर्द नहीं, बल्कि 'पेचियम्माल' नाम की एक महिला थीं. जिन्होंने अपनी कोख से जन्मी मासूम बेटी की हिफाजत के लिए खुद की पहचान को ही हमेशा के लिए दफन कर दिया.
सिर्फ 15 दिनों में उजड़ गई दुनिया
कहानी शुरू होती है आज से करीब चार दशक पहले. पेचियम्माल की शादी शिव नाम के शख्स से हुई थी. अभी हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि शादी के महज 15 दिन बाद पति की हार्ट अटैक से मौत हो गई.
दुनिया उजड़ चुकी थी, लेकिन तभी पता चला कि पेचियम्माल मां बनने वाली हैं. एक बेसहारा विधवा ने बेटी को जन्म दिया और पेट पालने के लिए कोयला फैक्ट्री में काम शुरू कर दिया.

वो एक शाम, जिसने पेचियम्माल को 'मुथु' बना दिया
एक शाम पेचियम्माल काम पर जा रही थीं, तभी रास्ते में एक ट्रक ड्राइवर ने उनके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. वो किसी तरह बच तो गईं, लेकिन इस खौफनाक हादसे ने उनके भीतर के डर को गुस्से में बदल दिया. उन्होंने समझ लिया कि इस समाज में एक अकेली औरत और उसकी बेटी कभी सुरक्षित नहीं रह सकतीं.
अगली ही सुबह वो तिरुचेंदूर मंदिर गईं. अपना सिर मुंडवाया, आखिरी बार साड़ी में भगवान के दर्शन किए और वहां से मर्द के कपड़ों में बाहर निकलीं. पेचियम्माल का अंत हो चुका था और जन्म हुआ था 'मुथु' का. बाद में होटल में काम करने के दौरान उन्हें नाम मिला 'मुथु मास्टर'.

बीड़ी का कश और पहचान का ढोंग
एक औरत के लिए मर्द बनकर जीना अंगारों पर चलने जैसा था. हर महीने आने वाले मासिक धर्म (पीरियड्स) के दर्द और उस दौरान खुद को छुपाना सबसे बड़ी चुनौती थी. दर्द की दवाइयां खाकर वो दिन-रात खेतों में पसीना बहाती थीं ताकि किसी को शक न हो. चालीस की उम्र में ही उन्हें मेनोपॉज हो गया.
भीड़भाड़ वाले मर्दाने शौचालय इस्तेमाल करना हो या मर्दों के बीच उठना-बैठना, उन्होंने हर मुश्किल झेली. उन्होंने बीड़ी पीना भी सीख लिया, जो उनकी ढाल बना. मुथु बताती हैं कि एक रात जब एक शराबी उनके करीब आया, तो उन्होंने तुरंत बीड़ी सुलगा ली. शराबी ने उन्हें 'भाई' कहकर माचिस मांगी और आगे बढ़ गया.

बेटी भी सालों तक रही अनजान
हैरत की बात यह है कि उनकी अपनी बेटी शनमुगसुंदरी भी सात साल की उम्र तक इस सच से अनजान थी. वो अपनी मौसी को मां समझती थी. दस साल की उम्र से वो अपनी मां के साथ रहने लगी और दुनिया के सामने हमेशा उन्हें 'मुथु मास्टर' ही पुकारा. आज बेटी खुशहाल है और राशन की दुकान चलाती है. वो कहती है, "मेरी मां बहुत फौलादी हैं. उन्होंने हमेशा स्वाभिमान से जीना सिखाया."
आज मुथु बूढ़ी हो चुकी हैं. लोग उनसे पूछते हैं कि क्या उन्हें औरत होने की कमी नहीं खलती? इस पर वो बेहद संजीदगी से कहती हैं, "अगर कोई मेरे साथ गलत करता, तो क्या यह समाज मुझे ही कसूरवार ठहराए बिना इंसाफ देता? जब रास्ता खुद चुना है, तो उसकी हर कीमत चुकानी ही होगी."
सुरक्षा के लिए जो चोला ओढ़ा था, अब वही मुथु मास्टर का घर बन चुका है. वो कहती हैं कि अब वो आखिरी सांस तक मुथु बनकर ही जीना चाहती हैं, क्योंकि इसी रूप ने उन्हें सम्मान और सुरक्षा दी. सलाम है इस मां के जज्बे को.
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