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नेपाल में तबाही के बाद अब भारत के पहाड़ी राज्यों में खतरे की घंटी! वैज्ञानिकों ने दी डराने वाली चेतावनी

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने न केवल वहां व्यापक तबाही मचाई, बल्कि भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी गंभीर चेतावनी का संकेत दिया है. वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न हिमालयी क्षेत्रों को पहले से अधिक संवेदनशील बना रहे हैं.

नेपाल में तबाही के बाद अब भारत के पहाड़ी राज्यों में खतरे की घंटी! वैज्ञानिकों ने दी डराने वाली चेतावनी
  • नेपाल में अगस्त दो हजार छब्बीस की भीषण जलप्रलय के बाद हिमालय और ग्लोबल वार्मिंग पर वैज्ञानिक चर्चा तेज हुई है.
  • हिमालयी राज्यों में हाल के वर्षों में भारी प्राकृतिक आपदाएं आई हैं जिनमें जनहानि और व्यापक नुकसान हुआ है.
  • उत्तराखंड में ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ी केदारनाथ, धराली आपदाओं ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को उजागर किया है.

26 अगस्त 2026 को नेपाल में आए भीषण जलप्रलय के बाद दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान हिमालय की ओर केंद्रित हो गया है. साथ ही, ग्लोबल वार्मिंग का असर ग्लेशियरों की सेहत को किस तरह प्रभावित कर रहा है, इस पर चर्चा तेज हो गई है. वैज्ञानिक हिमालय में भविष्य में आने वाले संभावित खतरों और उनसे होने वाले नुकसान को लेकर गहन शोध की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं. भले ही यह जलप्रलय नेपाल में आया हो, लेकिन यह भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी एक बड़ी चेतावनी है. भारत के हिमालयी क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा राज्य बचा हो, जहां हाल के वर्षों में कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा न आई हो. जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्यों में पिछले पांच वर्षों के दौरान कई बड़ी आपदाएं आई हैं, जिनमें भारी नुकसान हुआ है और लोगों की जानें भी गई हैं.

उत्तराखंड में पहले भी कई बड़ी आपदाएं आ चुकी हैं. इनमें केदारनाथ त्रासदी, रैणी आपदा, धराली आपदा के अलावा कई अन्य बड़ी घटनाएं शामिल हैं. उत्तराखंड में हर साल मानसून के दौरान बड़े पैमाने पर भूस्खलन होते रहे हैं. इसके अलावा एवलांच की घटनाएं भी सामने आती रही हैं. उत्तराखंड में पूर्व में आई अधिकांश आपदाओं का बारिश से गहरा संबंध रहा है. हालांकि, बारिश के अलावा ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहा जलवायु परिवर्तन भी एक महत्वपूर्ण कारण है, जिसकी वजह से ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से बदल रहा है.

हिमालयी क्षेत्रों को लेकर चर्चा शुरू

हाल ही में नेपाल में आई भीषण त्रासदी के बाद देश-दुनिया में हिमालयी क्षेत्रों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. इसमें हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र, वहां मौजूद ग्लेशियरों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है. इसका कारण यह है कि हिमालय में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर मानव जीवन को प्रभावित करता है. हिमालय को दुनिया का 'थर्ड पोल' भी कहा जाता है. यहां मौजूद हजारों ग्लेशियर न केवल पीने के पानी का स्रोत हैं, बल्कि सिंचाई और अन्य आवश्यक जरूरतों के लिए भी पानी उपलब्ध कराते हैं.

हिमालयी राज्यों के लिए एक बड़ा अलर्ट

हिमालय पर पड़ रहे प्रभावों को लेकर वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की यह त्रासदी उत्तराखंड समेत सभी हिमालयी राज्यों के लिए एक बड़ा अलर्ट है. उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की रैणी आपदा और 2025 की धराली आपदा में बारिश तथा ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े जलवायु परिवर्तन का सीधा संबंध देखा गया था. चार हजार मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश की घटनाएं बढ़ना, तापमान में लगातार वृद्धि, मौसम के चक्र में बदलाव, गर्मियों का लंबा होना और सर्दियों की अवधि में कमी जैसे कई कारण हिमालय को अधिक संवेदनशील बना रहे हैं. बर्फबारी तो हो रही है, लेकिन बढ़ते तापमान के कारण बर्फ को लंबे समय तक टिके रहने का अवसर नहीं मिल रहा. इसके अलावा अचानक और अत्यधिक बारिश की घटनाएं भी बढ़ रही हैं, जो भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं को जन्म दे रही हैं.

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बारिश अब निचली घाटियों के लिए विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन का कारण बन रही है. दरअसल, ग्लेशियरों के पिघलने या पीछे हटने से पहाड़ों पर बड़ी मात्रा में मोरेन (हिमानी मलबा) जमा हो जाता है. जब इन क्षेत्रों में भारी बारिश होती है, तो यह ढीला मलबा पानी सोखकर भारी हो जाता है और अचानक भूस्खलन का रूप ले लेता है. इसके अलावा कई बार अत्यधिक वर्षा के कारण होने वाले भूस्खलन नदियों का रास्ता रोक देते हैं, जिससे कृत्रिम झीलें बन जाती हैं. जब इन झीलों पर पानी का दबाव बढ़ता है, तो अस्थायी बांध टूट जाते हैं और निचले इलाकों में भारी तबाही मच जाती है.

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलोत ने कहा कि लैंडस्लाइड, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड और मोरेन ब्रेकऑफ जैसी अधिकांश आपदाएं मानसून के दौरान ही होती हैं. भूस्खलन की घटनाओं का सीधा संबंध मानसून से है और यदि सालाना आंकड़ों को देखें तो मानसून के दौरान इनकी संख्या सबसे अधिक होती है. जैसे ही बारिश शुरू होती है, प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं भी बढ़ने लगती हैं. उन्होंने कहा कि पहले उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती थी. लेकिन अब वहां भी बारिश हो रही है. चूंकि अधिकांश आपदाएं इन्हीं क्षेत्रों से शुरू होती हैं, इसलिए वहां बढ़ती वर्षा भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को और बढ़ा सकती है.

वहीं, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता ने कहा कि चार हजार मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौजूद अधिकांश सामग्री ग्लेशियरों द्वारा लाई और जमा की गई होती है. यह मटेरियल काफी ढीला और अस्थिर होता है. ऐसे में जब इन क्षेत्रों में भारी बारिश होती है, तो यह ढीला मलबा पानी के साथ तेजी से नीचे की ओर बहने लगता है. उन्होंने बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों की अधिकांश घाटियां काफी संकरी होती हैं. ऐसे में बारिश के साथ नीचे आने वाला यह मलबा इन संकरी घाटियों में जमा हो जाता है, जिससे भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है.

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