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हार्वर्ड प्रोफेसर का घमंड हुआ चूर-चूर, नीम करोली बाबा के पैरों में गिरकर रो पड़ा, कैंची धाम की सच्ची घटना

Neem Karoli Baba Baba Ram Dass story: 'कल रात तारों को देखकर मां को याद कर रहे थे ना?' नीम करोली बाबा के सिर्फ एक सवाल ने हार्वर्ड के नास्तिक प्रोफेसर का पूरा घमंड तोड़ दिया. जानिए कैसे एक अमेरिकी वैज्ञानिक कैंची धाम आकर बन गया 'बाबा रामदास'.

हार्वर्ड प्रोफेसर का घमंड हुआ चूर-चूर, नीम करोली बाबा के पैरों में गिरकर रो पड़ा, कैंची धाम की सच्ची घटना
Neem Karoli Baba Harvard Professor Richard Alpert story

Neem Karoli Baba Real story: जिंदगी में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं, जब इंसान का सालों पुराना यकीन, उसका पूरा ज्ञान और उसका अहंकार ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है. आज हम आपको सुना रहे हैं एक ऐसी ही सच्ची दास्तान, जो सिर्फ एक मुलाकात की नहीं, बल्कि एक इंसान के पुनर्जन्म की कहानी है. यह कहानी है हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक जाने-माने प्रोफेसर और अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट रिचर्ड अल्पर्ट की, जो भारत सिर्फ इसलिए आए थे क्योंकि वो इंसानी दिमाग की गहराइयों को नापना चाहते थे. लेकिन यहां उत्तराखंड की वादियों में कैंची धाम के नीम करौली बाबा से एक मुलाकात ने उनका पूरा जीवन ही बदलकर रख दिया. बता दें कि हाल ही में 'हनुमान अंश' नाम की हिंदी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा रही है. यह नीम करौली बाबा के जीवन और उनके साथ घटी घटनाओं पर आधारित है. आइए अब चलते हैं उस अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट रिचर्ड अल्पर्ट पर.

दिमाग का घमंड और कैंची धाम की पहली मुलाकात

साल 1967 की बात है. रिचर्ड अल्पर्ट कोई आम इंसान नहीं थे. वो हार्वर्ड में प्रोफेसर थे, दिमाग और चेतना पर बड़ी-बड़ी रिसर्च कर रहे थे. तर्क, विज्ञान और किताबों की दुनिया में जीने वाले अल्पर्ट को भारतीय साधु-संतों पर बिल्कुल भरोसा नहीं था. वो इसे महज ढोंग और अंधविश्वास मानते थे. जब वो पहली बार नैनीताल के पास कैंची धाम पहुंचे, तो उनका मन वहां बिल्कुल नहीं लगा. उन्हें लगा कि यह सब किसी धार्मिक कैलेंडर की तस्वीर जैसा बनावटी है. उनके मन में सिर्फ एक ही ख्याल चल रहा था, 'मैं यहां कहां फंस गया, मुझे फौरन वापस अमेरिका लौट जाना चाहिए.'  

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Photo Credit: ramdass.org

वो एक शब्द, जिसने हिला दी हार्वर्ड प्रोफेसर की दुनिया

तभी नीम करौली बाबा (जिन्हें भक्त प्यार से महाराज जी कहते हैं) ने अल्पर्ट को अपने पास बुलाया. बाबा ने उनसे कोई धार्मिक उपदेश नहीं दिया, बल्कि सीधे पिछली रात का जिक्र छेड़ दिया. बाबा ने बड़े सहज भाव से कहा, "कल रात तुम खुले आसमान के नीचे तारों को देखते हुए अपनी मां को याद कर रहे थे ना?" 
अल्पर्ट सन्न रह गए. उनकी मां का निधन पिछले ही साल हुआ था और यह बात उन्होंने वहां किसी को नहीं बताई थी. अभी वो संभल भी नहीं पाए थे कि बाबा ने अगला शब्द बोला- "स्प्लीन (तिल्ली)." 

यह सुनते ही अल्पर्ट के पैरों तले से जमीन खिसक गई. दरअसल, उनकी मां की मौत स्प्लीन की गंभीर बीमारी से हुई थी. एक विदेशी प्रोफेसर, जिसने पूरी जिंदगी विज्ञान और तर्क के सहारे काटी, वो यह समझ ही नहीं पाया कि हजारों मील दूर पहाड़ों में बैठा यह फकीर उसके दिल का सबसे गहरा और दर्दनाक राज कैसे जानता है.  

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आंसुओं में बहा अहंकार, शुरू हुआ 'रामदास' का सफर

उस एक पल ने अल्पर्ट के बौद्धिक घमंड को चकनाचूर कर दिया. वो वहीं बाबा के चरणों में फूट-फूटकर रोने लगे. बाद में अल्पर्ट ने खुद बताया कि वो कई दिनों तक रोते रहे, लेकिन वो आंसू दुख के नहीं थे. वो आंसू उस सुकून के थे, जब इंसान को महसूस होता है कि कोई उसे बिना कुछ कहे अंदर तक पूरी तरह समझ गया है. यहीं से प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट का सफर खत्म हुआ और जन्म हुआ 'बाबा रामदास' का. नीम करौली बाबा ने उन्हें नाम दिया रामदास, यानी 'ईश्वर का सेवक'. 


'बी हियर नाउ': पश्चिम को दिया जीने का नया मंत्र

भारत से लौटने के बाद रामदास ने अपना पूरा जीवन योग, ध्यान और सेवा भाव को समर्पित कर दिया. साल 1971 में उन्होंने एक ऐतिहासिक किताब लिखी 'बी हियर नाउ' (Be Here Now).  इस किताब ने पश्चिमी दुनिया में तहलका मचा दिया. इसने लाखों-करोड़ों लोगों को भारतीय अध्यात्म, योग और ध्यान से जोड़ा. इस किताब का सबसे बड़ा संदेश बहुत सीधा था, न अतीत की यादों में उलझो, न भविष्य की चिंताओं में घुटो. बस आज में, इस पल में पूरी तरह जियो. 

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'हनुमान फाउंडेशन' की शुरुआत

नीम करौली बाबा से मिले सेवा के भाव को आगे बढ़ाने के लिए रामदास ने साल 1974 में 'हनुमान फाउंडेशन' की नींव रखी. उनका मानना था कि भगवान की सच्ची भक्ति वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के की जाए. उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे बंद कैदियों के बीच जाकर ध्यान और आत्म-सुधार के कार्यक्रम चलाए, ताकि भटके हुए लोग भी एक नई जिंदगी शुरू कर सकें. जो लोग जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर थे, उन्हें मौत के डर से उबारकर शांति और गरिमा के साथ विदा करने के लिए भी उन्होंने अनूठे अभियान चलाए.  

शरीर ने साथ छोड़ा, लेकिन तब भी नहीं रुके

साल 1997 में रामदास की जिंदगी में एक बेहद कठिन मोड़ आया. उन्हें एक जानलेवा पैरालिटिक स्ट्रोक (लकवा) पड़ा. इस आघात ने उनके शरीर का दायां हिस्सा पूरी तरह बेजान कर दिया और उनकी जुबान भी लड़खड़ाने लगी. कोई आम इंसान होता तो शायद जिंदगी से हार मान लेता, लेकिन रामदास तो अहंकार और शरीर के भाव से बहुत ऊपर उठ चुके थे. व्हीलचेयर पर बैठकर और टूटी-फूटी आवाज में भी उन्होंने बोलना और लिखना जारी रखा. उन्होंने साबित कर दिया कि शरीर लाचार हो सकता है, लेकिन अगर संकल्प मजबूत हो तो संदेश कभी नहीं रुकता.

माउई के शांत किनारे पर त्यागे प्राण

साल 2004 में वो अमेरिका के माउई (हवाई द्वीप) में बस गए. वहां से उन्होंने दुनिया भर के साधकों को अपने साथ जोड़े रखा. चाहे वो ऑनलाइन सेशन्स हों, पॉडकास्ट हों, किताबें हों या स्पिरिचुअल रिट्रीट्स. रामदास हर उस इंसान के लिए उपलब्ध रहे जो जीवन की उलझनों से निकलकर शांति की तलाश में था. 22 दिसंबर 2019 को माउई स्थित अपने घर पर बाबा रामदास ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया. शरीर भले ही चला गया, लेकिन उनकी आवाज और सोच आज भी दुनिया को राह दिखा रही है.

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