उत्तराखंड के चमोली में समुद्र तल से करीब 10,500 फीट की ऊंचाई पर बसा है माणा गांव. बद्रीनाथ धाम से महज तीन किलोमीटर आगे. कभी इसे देश का आखिरी गांव कहा जाता था, लेकिन आज 'भारत का पहला गांव' कहलाता है. सामने तिब्बत और चीन की सरहद है और यहां बहती है अलकनंदा और रहस्यमयी सरस्वती की पावन धारा. बर्फीली चोटियों से घिरा यह छोटा सा गांव दरअसल हमारी सदियों पुरानी संस्कृति और इतिहास का अनमोल खजाना है. लेकिन ये गांव साल में छह महीने वीरान और भूतिया हो जाता है. वहीं, गांव में कदम रखते ही भारत के प्राचीन इतिहास से रूबरू होते हैं.
जहां लिखा गया दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य
गांव के चौराहे से पहला रास्ता मुड़ता है गणेश गुफा और व्यास गुफा की ओर. मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने इसी गुफा में बैठकर चारों वेदों का वर्गीकरण किया, अठारह पुराण रचे और महाभारत का गान किया. लेकिन शर्त यह थी कि लिखने वाला कोई ऐसा हो जो बिना रुके लिख सके. तब भगवान गणेश ने व्यास की वाणी को लिपिबद्ध किया. आज भी व्यास गुफा की बनावट को जब आप गौर से देखेंगे, तो उसकी शिलाएं बिल्कुल ऐसी लगती हैं जैसे एक के ऊपर एक सहेज कर रखे गए ग्रंथ के पन्ने हों. कहते हैं, महाभारत का एक रहस्यमयी हिस्सा ऐसा भी था जिसे सिर्फ व्यास और गणेश जानते थे, और व्यास ने उसे पत्थर की शिला में तब्दील कर दिया.
ये भी पढ़ें: अमेरिका में इस गुजराती ने लाखों भारतीयों को बनाया करोड़पति, लेकिन खुद गरीबी में तोड़ा दम
जब सरस्वती के शोर पर नाराज हुए थे गणपति
माणा गांव में सरस्वती नदी का वेग देखते ही बनता है. यहां एक बेहद दिलचस्प और अनोखी कथा सुनने को मिलती है. जब भगवान गणेश महाभारत लिख रहे थे, तो सरस्वती नदी अपने पूरे उफान पर थीं और उनका शोर इतना तेज था कि लेखन में बाधा आ रही थी. श्रीगणेश ने नदी से शांत होने का आग्रह किया, लेकिन सरस्वती का वेग कम नहीं हुआ. क्रोधित होकर गणपति बप्पा ने उन्हें श्राप दे दिया कि 'इस स्थान के आगे तुम किसी को दिखाई नहीं दोगी.' यही वजह है कि माणा में अलकनंदा और सरस्वती के संगम 'केशव प्रयाग' के बाद सरस्वती नदी पूरी तरह लुप्त हो जाती है. पूरे भारत में सरस्वती के साक्षात दर्शन केवल इसी एक गांव में होते हैं.
पांडवों के स्वर्ग जाने का रास्ता
महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव द्रोपदी समेत स्वर्ग की यात्रा पर निकले, तो उनका रास्ता इसी माणा गांव से होकर गुजरा था. रास्ते में जब उफनती सरस्वती नदी को पार करना नामुमकिन लगा, तो महाबली भीम ने एक विशालकाय चट्टान उठाकर नदी के दोनों किनारों पर रख दी. वही शिला आज 'भीम पुल' के नाम से जानी जाती है. इस पुल के पास ही सरस्वती माता का मंदिर है. इसी रास्ते पर आगे बढ़ें तो स्वर्गारोहण का पथ शुरू होता है. पांचों पांडवों में से केवल धर्मराज युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग पहुंच सके थे, बाकी सभी ने रास्ते में ही अपने प्राण त्याग दिए थे.
जहां पापियों पर नहीं गिरती पानी की एक भी बूंद
भीम पुल से करीब 5 किलोमीटर का खूबसूरत लेकिन संकरा ट्रैक आपको ले जाता है वसुधारा झरने तक. करीब 400 फीट की ऊंचाई से गिरती पानी की यह दूधिया धार किसी चमत्कार से कम नहीं लगती. स्थानीय मान्यता है कि वसुधारा का जल केवल उन्हीं लोगों पर गिरता है जिनका मन पवित्र और निष्पाप होता है. अगर किसी के मन में कपट या पाप है, तो झरने का पानी उस पर एक बूंद भी नहीं गिरता.
भारत की पहली चाय की दुकान
माणा का प्राचीन नाम 'मणिभद्रपुर' था, जो इसके रक्षक यक्ष मणिभद्र के नाम पर पड़ा था. आज इस गांव में लगभग 60 परिवार और करीब 400 लोग रहते हैं. जब सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है, तो यहां के लोग छह महीने के लिए नीचे चमोली चले आते हैं और मौसम खुलते ही वापस लौटते हैं. यहां आने वाला हर मुसाफिर 'भारत की प्रथम दुकान' पर चाय की चुस्की जरूर लेता है. गांव के पारंपरिक घरों की दीवारों पर ऋषि-मुनियों और देवी-देवताओं की सुंदर पेंटिंग्स आपका मन मोह लेंगी.
ये भी पढ़ें: कुमाऊं में 436 इंसानों को खाने वाली बाघिन 'चंपावत', नेपाली सेना ने भी मानी हार, फिर जिम कॉर्बेट ने ऐसे मार गिराया
जब बर्फ से ढक जाता है माणा
माणा गांव में नवंबर आते-आते मिजाज पूरी तरह बदल जाता है. नवंबर से अप्रैल के महीनों में यहां इतनी भारी बर्फबारी होती है कि रास्ते, पगडंडियां और सड़कें सब कुछ बर्फ के नीचे दफन हो जाते हैं. तापमान माइनस में चले जाने की वजह से पानी से लेकर रोजमर्रा की बुनियादी सुविधाएं तक जम जाती हैं. ऐसे हालात में यहां रुकना जिंदगी को सीधे दांव पर लगाने जैसा होता है. यही वजह है कि पूरे छह महीने के लिए यह पूरा इलाका दुनिया से कट जाता है. तब अपने ही आशियाने पर ताला लगाकर ग्रामीण नीचे के इलाकों जैसे गोपेश्वर, जोशीमठ और चमोली में चले जाते हैं. माणा गांव की धड़कनें सीधे तौर पर भगवान बद्री विशाल के मंदिर से जुड़ी हुई हैं. जैसे ही सर्दियों में श्री बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होते हैं, माणा गांव भी खामोशी की आगोश में चला जाता है. और फिर अगली गर्मियों में जैसे ही धाम के कपाट खुलते हैं, ठीक उसी के साथ माणा गांव में भी दोबारा जिंदगी की चहल-पहल लौट आती है.
कैसे पहुंचें माणा गांव?
देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है. वहीं, नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, जहां से सड़क मार्ग से राष्ट्रीय राजमार्ग-58 होते हुए 295 किमी का सफर तय करके बद्रीनाथ पहुंचा जा सकता है. बद्रीनाथ पहुंचकर आप शेयरिंग टैक्सी ले सकते हैं या फिर अलकनंदा के किनारे-किनारे 3 किलोमीटर का खूबसूरत पैदल सफर तय करके माणा गांव पहुंच सकते हैं.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं