अगर आप कभी अमेरिका के लंबे-चौड़े हाईवे पर सफर कर रहे हों और रात बिताने के लिए किसी भी छोटे शहर के मोटेल पर रुकें, तो रिसेप्शन काउंटर के पीछे किसी परिचित भारतीय, खासकर गुजराती चेहरे का मुस्कुराते हुए मिलना लगभग तय है. आज हकीकत यह है कि अमेरिका के करीब 60 फीसदी मोटल कारोबार पर गुजराती परिवारों, खासकर ‘पटेलों' का कब्जा है. लोग कभी हल्के-फुल्के अंदाज में 'पटेल मोटेल कार्टेल' कह दिया करते थे. 'फ्रॉम सूरत टू सैन फ्रांसिस्को' के लेखक महेंद्र के. दोषी बताते हैं कि आज अमेरिका में 36 हजार से ज्यादा गुजराती होटल मालिक हैं, जिनके पास 22 हजार से अधिक संपत्तियां हैं. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में इनका योगदान करीब 371 अरब डॉलर का है और ये 41 लाख से ज्यादा अमेरिकियों को रोजगार दे रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पूरे साम्राज्य की पहली ईंट किसने रखी थी? उस शख्स का नाम था कानजी मनछू देसाई. अफसोस की बात यह है कि जिस शख्स ने इस विशालकाय इंडस्ट्री की नींव रखी, वो न तो अरबपति बनकर मरा, न किसी आलीशान बंगले में रहा. 1965 में लंदन की एक गुमनाम गली में उसने अंतिम सांस ली, जब उसे अमेरिका से डिपोर्ट कर दिया गया था. आइए जानते हैं अमेरिका के पहले 'मोटल किंग' की वो अनसुनी दास्तान, जिसे इतिहास के पन्नों ने लगभग भुला ही दिया था.
सिर पर कर्ज और अमेरिका का ख्वाब
बात 1930 के दौर की है. गुजरात के सूरत जिले का डिगास गांव. किसान परिवार में जन्मे कानजी मनछू देसाई के पास कोई जमीन-जायदाद नहीं थी, था तो सिर्फ पीढ़ियों से चला आ रहा कर्ज. उस वक्त गुजरात के गांवों में खेती से कर्ज चुकाना नामुमकिन था. कानजी ने तय किया कि गांव छोड़ना ही होगा. वे अपने साथी भीखू भक्ता के साथ त्रिनिदाद के लिए निकल पड़े. जेब खाली थी और कोई तय रास्ता नहीं. लेकिन त्रिनिदाद में भी सिर्फ मजदूरी और मुफलिसी मिली. वहीं किसी ने कान के पास फुसफुसाया "अमेरिका जाओ, वहां घी और शहद की नदियां बहती हैं."
उस जमाने में गैर-कानूनी तरीके से अमेरिका जाने का एक ही जरिया था किसी जहाज की रसोई में हेल्पर बनकर घुस जाओ. कानजी और उनके साथी न्यूयॉर्क के किनारे उतरे और फिर छुपते-छुपाते कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो पहुंचे. वहां 1904 से पंजाबी सिख किसान बसे हुए थे, जो बिना कागजात वाले मजदूरों को अपने खेतों में पनाह और काम दे देते थे.

43 डिग्री की धूप और 10 सेंट प्रति घंटा
अगले दस साल यानी 1930 से 1942 तक, कानजी ने सैक्रामेंटो के तपते खेतों में 43 सेल्सियस डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी में काम किया. मजदूरी मिलती थी महज 10 सेंट प्रति घंटा. हर वक्त इमिग्रेशन के छापों का डर और नस्लीय नफरत की तलवार लटकती रहती थी. जो बचता, वो गांव में मां और बच्चों को भेज देते. न लौटने का किराया था, न टिके रहने की तसल्ली. लेकिन तभी, दूसरे विश्व युद्ध के काले दौर ने कानजी की किस्मत का दरवाजा खोल दिया.
350 डॉलर का दांव और 32 कमरों की चाबी
साल 1942. अमेरिका जब जापान के खिलाफ जंग में उतरा, तो राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट के एक आदेश से पूरे कैलिफोर्निया में रहने वाले जापानी-अमेरिकी परिवारों को जबरन डिटेंशन कैंपों में भेजा जाने लगा. सैक्रामेंटो के डाउनटाउन में एक जापानी महिला का 32 कमरों वाला छोटा सा होटल था 'फोर्ड होटल'. कैंप जाने से ठीक पहले, बेबस मालकिन ने अपने यहां काम करने वाले भरोसेमंद मजदूर कानजी देसाई से पूछा "क्या तुम मेरी गैर-मौजूदगी में यह होटल संभाल सकते हो?"
शर्तें उस दौर के हिसाब से बहुत आसान थीं 350 डॉलर डाउन पेमेंट, 75 डॉलर महीना किराया और 5 साल का लीज. 15 अक्टूबर 1942 को कानजी ने फोर्ड होटल की चाबियां संभाल लीं. कमरे का किराया रखा गया 50 सेंट प्रति रात या 3.5 डॉलर प्रति हफ्ता. पहले महीने कानजी की जेब में शुद्ध 100 डॉलर की कमाई आई. खेतों में दिनभर पसीना बहाकर 10 सेंट कमाने वाले एक मजदूर के लिए 100 डॉलर किसी लॉटरी से कम नहीं थे. यह कोई लग्जरी होटल नहीं था, रहने वाले भी शहर के सबसे गरीब लोग थे जो अक्सर किराया भी नहीं देते थे. लेकिन पहली बार कानजी के सिर पर अपनी छत थी, अपनी रसोई थी और अपने वक्त पर अपना हक था.
खिचड़ी, कढ़ी और भरोसे का 'हैंडशेक लोन'
यहीं से शुरू होता है असली करिश्मा. कानजी ने सिर्फ अपनी जेब नहीं भरी, बल्कि अपने समाज के लिए होटल के दरवाजे खोल दिए. भारत से भागकर आने वाले नए गुजराती युवकों को वे अपने होटल में पनाह देते. हफ्ते में दो-तीन शाम चूल्हे पर गुजराती खिचड़ी और कढ़ी की हांडी चढ़ती. बीस-पच्चीस लड़के फर्श पर बैठकर खाते, होटल का काम सीखते और सिर छुपाते.
कानजी का एक ही फलसफा था "अमेरिका में पटेल के लिए होटल से बेहतर कोई धंधा नहीं." वे हर नौजवान को सिखाते पहले खेतों में पसीना बहाओ, इतनी अंग्रेजी सीख लो कि काउंटर पर बात कर सको, 1500-1800 डॉलर बचाओ. और अगर रकम कम पड़े, तो कानजी अपनी जेब से 'हैंडशेक लोन' यानी बिना किसी लिखा-पढ़ी के सिर्फ जुबान के भरोसे कर्ज दे देते थे.
सैन फ्रांसिस्को से पूरे अमेरिका में फैला नेटवर्क
1947 में कानजी सैन फ्रांसिस्को पहुंचे और 157 फोर्थ स्ट्रीट पर 'गोल्डफील्ड होटल' लीज पर लिया. यह एक तरह की चॉल जैसी बिल्डिंग थी, जहां साझा बाथरूम और छोटे कमरे थे. अमेरिका के हॉस्पिटैलिटी बिजनेस में घुसने का यह सबसे सस्ता रास्ता था.
1946 में आए 'लूस-सेलर एक्ट' और फिर 1965 के 'इमिग्रेशन एक्ट' ने रास्ते खोले. इसके बाद जो हुआ, वो एक चेन रिएक्शन था. एक पटेल अमेरिका आता, जमने के बाद अपने भाई को बुलाता, भाई अपने साले को और साला अपनी बहन के परिवार को. नया आने वाला पहले पुराने रिश्तेदार के होटल में झाड़ू-पोछा और रिसेप्शन का काम सीखता, पाई-पाई जोड़ता और फिर किसी नए हाईवे पर खस्ताहाल मोटल लीज पर ले लेता. 1955 तक कानजी देसाई अकेले 30 से ज्यादा पटेलों को होटल मालिक बना चुके थे. इसके बाद की पीढ़ी में कल्याणजी पटेल, भानु वनमाली और दया रतनजी जैसे नाम उभरे, जिन्होंने हजारों नए पटेलों को इस धंधे की बारीकियां सिखाईं.
जब बोर्ड लगे "अमेरिकन द्वारा संचालित"
यह सफर आसान नहीं था. 1970 और 80 के दशक में भारतीय होटल मालिकों को जबरदस्त नस्लभेद का सामना करना पड़ा. अमेरिकी बैंक इन्हें लोन देने से मना कर देते थे. इंश्योरेंस कंपनियां यह झूठा आरोप लगाकर पॉलिसी नहीं देती थीं कि पटेल अपने होटलों में खुद आग लगाकर क्लेम लेते हैं. हद तो तब हो गई जब हाईवे किनारे गोरे मालिकों ने अपने मोटलों के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड टांग दिए- "American Owned and Operated" (अमेरिकियों द्वारा संचालित).
इशारा साफ था कि पड़ोस का भारतीय मोटल 'विदेशी' है. लेकिन पटेल टूटे नहीं. जब बैंकों ने दरवाजे बंद किए, तो समाज ने एक-दूसरे को बिना ब्याज के पैसा दिया. जब लेबर नहीं मिली, तो पूरा परिवार काम पर लगा. पति काउंटर संभालता, पत्नी चादरें धोती और बच्चे स्कूल से लौटकर कमरों की सफाई करते. उन्होंने घाटे में चल रहे मोटलों को मुनाफे में बदला. आगे चलकर 1989 में माइकल लेवेन के सहयोग से 'एशियन अमेरिकन होटल ओनर्स एसोसिएशन' (AAHOA) बना, जिसने वॉशिंगटन तक अपनी ताकत का अहसास कराया.

एक अकेले संस्थापक का दर्दनाक अंत
सोचिए, जिसने लाखों लोगों की तकदीर बदल दी, उसकी अपनी जिंदगी कैसी रही? कानजी मनछू देसाई का अंत बेहद दर्दनाक और तन्हाई भरा रहा. 1937 में, जब वे कैलिफोर्निया के खेतों में बिना कागजात के छुपकर मजदूरी कर रहे थे, भारत में उनकी पत्नी की मौत हो गई. गैर-कानूनी होने की वजह से वे न तो पत्नी के अंतिम संस्कार में जा सके और न ही अपने तीन मासूम बच्चों को अमेरिका बुला सके. उन्होंने कभी दूसरी शादी नहीं की. बस दूर से बच्चों की परवरिश के लिए पैसे भेजते रहे.
जिंदगी के आखिरी सालों में तन्हाई और शराब की लत ने उनके लीवर और किडनी को छलनी कर दिया. 1955 के आसपास अमेरिकी प्रशासन ने उन्हें देश से निकाल (डिपोर्ट) दिया. वे लंदन चले गए, जहां उनका एक बेटा रहता था. और वहीं 1965 में इस गुमनाम महानायक ने दम तोड़ दिया.
लेकिन आज पटेल समाज के पास सिर्फ हाईवे के छोटे मोटल नहीं हैं. वे हॉलिडे इन, हिल्टन और मैरियट जैसे फाइव-स्टार ब्रांड्स और लक्जरी रिजॉर्ट्स के मालिक हैं. प्रसिद्ध होटल इतिहासकार स्टेनली टर्केल ने कानजी मनछू देसाई का नाम कॉनराड हिल्टन और जे. विलार्ड मैरियट जैसे दिग्गजों की कतार में रखा है. कानजी देसाई भले ही तंगहाली में दुनिया छोड़ गए, लेकिन उन्होंने मेहनत, साझेदारी और हौसले का जो मॉडल खड़ा किया, उसने हमेशा के लिए अमेरिकी कारोबार के इतिहास में एक हिंदुस्तानी किसान की अमिट छाप छोड़ दी.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं