80 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोहन भागवत ने कहा कि जो लोग कहते थे कि भारत आजाद नहीं रह सकता और खुद से शासन नहीं कर सकता, उन लोगों की बात गलत साबित हुई. अब भारत 80 वें साल में प्रवेश कर रहा है. मोहन भागवत ने कहा कि जिन लोगों ने भारत को आजादी दिलाई. ऐसे सभी महापुरुषों के त्याग, परिश्रम का, बलिदान का गौरव हमारे मन में है. यह अहसास भी हमारे मन में है.
मोहन भागवत ने कहा कि मुझे युवा पीढ़ी से संबोधन करने कहा गया है. युवा पीढ़ी के लिये भारत में मानते हैं कि वह हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड हैं. उसका ठीक से देश को लाभ हुआ तो हम विश्वगुरु बन जाएंगे. नहीं हुआ तो आगे बहुत बोझ आएगा. क्योंकि, यही युवा पीढ़ी तीस सालों बाद पुरानी पीढ़ी बन जाएगी. आगे चलकर जैसे इस युवा पीढ़ी के लिये आज के लोग विचार कर रहे हैं, वैसे ही उन्हें आगे की पीढ़ी का विचार करना होगा. इसलिये इस संवाद का एक महत्त्व मैं मानता हूं.
“स्वतंत्रता दिवस हम सबके लिए गौरव का और उत्सव का विषय़ है। 1857 से गिनेंगे तो लगातार 90 वर्ष अनेक प्रकार का त्याग बलिदान देकर हमारे पूर्वजों ने स्वातंत्र्य की प्राप्ति की। उस त्याग और बलिदान का गौरव हमारे मन में है। लेकिन इसके साथ एक भान मन में चाहिए, कि इतना त्याग-परिश्रम करके… pic.twitter.com/1s5t2Jrz3C
— RSS (@RSSorg) August 15, 2026
तिरंगे के उदाहरण से बताया भारत कैसे आगे जाए
मोहन भागवत ने कहा, "और एक विशेष प्रसंग है. इतना बडा ध्वज, बीस या चालीस फिट चौडा और सत्तर पंचाहत्तर फिट लंबा ऐसा ध्वज यहां नागपुर में ध्वजोत्तोलित हुआ है. हम देखते है. छोटा ध्वज होता तो हाथ में ले सकते थे. इतना बडा ध्वज है तो उसके लिये कितना उंचा स्तंभ और उसकी कितनी मजबूत बेस चाहिए. उसे ऊपर चढाने में मशीन को भी कितना परिश्रम पडा. यह सब आपने देखा है. विचार कीजिये, यह ध्वज जिसका प्रतीक है, वह अपना भारत तथा भारत की रीती नीती उसाको ऊपर चढा ने कितना परिश्रम करना होगा और कितने ऊपर जाने पर वह अच्छा लगेगा. यह हमारा दायित्व है."
हम अमेरिका या चीन नहीं, हम 'भारत' हैं
मोहन भागवत ने युवाओं को अपनी तुलना दूसरे देशों से न करने की सलाह दी. उन्होंने स्पष्ट कहा कि हम अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड नहीं हैं, हम 'भारत' हैं. हमारी पहचान और हमारे विकास का पैमाना हमारी अपनी संस्कृति और गरिमा पर आधारित होना चाहिए.
उन्होंने आगे कहा कि बाकी दुनिया केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और पैसे के पीछे भागती है, लेकिन भारत में हम केवल भौतिक उन्नति की बात नहीं करते. दुनिया आज अपनी अधूरी दृष्टि के कारण लड़खड़ा रही है. इस लड़खड़ाती दुनिया को सही संतुलन देना और आगे का रास्ता दिखाना भारत का नैतिक दायित्व है.
स्वरोजगार और उद्यमिता पर जोर
युवाओं के भविष्य और रोजगार पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि रोजगार का मतलब सिर्फ नौकरी पाना नहीं होता. हमें हाथों से काम करने और उद्यमिता की संस्कृति को सम्मान देना होगा. बिजनेस या नए काम में जोखिम होते हैं, लेकिन उन खतरों को उठाकर सफल होने की हिम्मत युवाओं में ही होती है.
उन्होंने कहा कि कम आबादी और ज्यादा संसाधन वाले देश केवल नौकरी के बल पर चल सकते हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल जनसंख्या और सीमित भू-भाग वाले देश को एक अलग दृष्टिकोण अपनाना होगा.
पुरानी पीढ़ियों का त्याग
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि आज हम अपने भविष्य, आर्थिक स्तर और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की बात इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि हमारी पिछली दो-तीन पीढ़ियों ने अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग किया और देश के लिए प्राणों की आहुति दी. उन्होंने यह नहीं सोचा कि उन्हें क्या मिलेगा, बल्कि यह सोचा कि देश के लिए सही क्या है.
युवाओं की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि एक रिटायर्ड व्यक्ति कोई भी जोखिम लेने से डरता है क्योंकि उसने दुनिया के थपेड़े खाए होते हैं. इसके विपरीत, युवाओं में अनुभव की कमी भले हो, लेकिन इसी कमी के कारण उनमें खुद को किसी मकसद में झोंक देने का अद्भुत साहस होता है. वे अंधेरे में भी छलांग लगा सकते हैं और उनकी उम्मीदें आसमान से भी बड़ी होती हैं. युवाओं को इस साहस को अपने और अपने परिवार के साथ-साथ देश के निर्माण में लगाना चाहिए.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का ऐतिहासिक प्रसंग
राष्ट्रीय सम्मान का महत्व समझाते हुए उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ा एक किस्सा सुनाया. जब गुरुदेव जापान की एक यूनिवर्सिटी में भाषण देने गए, तो वहां हॉल में शिक्षक तो मौजूद थे, लेकिन छात्र गायब थे. पूछने पर प्रिंसिपल ने बताया कि छात्र गुरुदेव का बहुत सम्मान करते हैं, लेकिन वे उनका भाषण इसलिए नहीं सुनना चाहते क्योंकि इतने महान व्यक्तित्व के होते हुए भी उनका देश (भारत) अंग्रेजों का गुलाम क्यों है?
भागवत ने इस प्रसंग से यह समझाया कि किसी भी व्यक्ति के चरित्र और प्रतिभा की प्रतिष्ठा तभी पूरी होती है, जब उसका देश स्वतंत्र और समृद्ध हो. हम तभी वैभवशाली हैं, जब हमारा भारत वैभवशाली है.
तिरंगे का संदेश क्या है?
राष्ट्रध्वज के रंगों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि केसरिया रंग कर्मशीलता, त्याग और शौर्य का प्रतीक है; सफेद रंग शांति, अहिंसा और निर्मलता दर्शाता है और हरा रंग समृद्धि और पर्यावरण के संतुलन का संदेश देता है.
ध्वज के बीच में स्थित चक्र पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि चक्र की तीलियां भले ही अलग-अलग दिशाओं में जाती हों, लेकिन वे सब एक ही केंद्र से जुड़ी होती हैं. इसी तरह, भारत में भाषा, प्रांत और विचारों की विविधता हो सकती है, लेकिन हमारी जड़ें एक हैं. धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि समाज को धारण करने वाले नियम हैं.
उन्होंने संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर के भाषणों और ऋग्वेद पर विनोबा भावे के भाष्य का जिक्र करते हुए 'सहचित्त' का संदेश दिया.
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद, विरोध, आंदोलन और बहस होना स्वाभाविक है, लेकिन यह सब देश के कानून, संविधान और सांस्कृतिक मूल्यों की मर्यादा के भीतर होना चाहिए. विविधता के बावजूद हमें हमेशा एकजुट रहकर आगे बढ़ना है.
अंत में उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक हितों से ऊपर उठकर देश की गरिमा और विकास के लिए कोई न कोई संकल्प जरूर लें.
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