- कभी माओवादियों का गढ़ मानी जाती थी कुल्हाड़ीघाट स्थित मटाल की पहाड़ी.
- आज सीआरपीएफ के जवानों ने गांव वालों के साथ फहराया तिरंगा.
- 2025 में मुठभेड़ में मारे गए थे कई नक्सली, अब गोलियों की जगह गूंजेगा राष्ट्रगान.
छत्तीसगढ़ का गरियाबंद कभी माओवादियों के खौफ के लिए पहचाने जाने वाले गरियाबंद जिले के कुल्हाड़ीघाट में इस स्वतंत्रता दिवस पर इतिहास रचा गया. कुल्हाड़ीघाट स्थित मटाल की पहाड़ी पर आजादी के बाद पहली बार तिरंगा फहराया गया. जिस पहाड़ी पर करीब 11 महीने पहले सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ हुई थी, उसी स्थान पर शनिवार को सीआरपीएफ (CRPF) और ई-30 के जवानों ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर देशभक्ति का संदेश दिया.
मटाल की पहाड़ी सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि गरियाबंद में माओवादी विरोधी अभियान की सफलता की गवाह भी रही है. सितंबर 2025 में इसी क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में 10 माओवादी मारे गए थे, जिनमें एक करोड़ रुपये का इनामी नक्सली बालकृष्ण भी शामिल था.

जनवरी 2026 में भी मारे गए थे नक्सली
इससे पहले जनवरी 2025 में कुल्हाड़ीघाट के भालूडिग्गी की पहाड़ियों में चले लंबे अभियान में बड़ी संख्या में माओवादी मारे गए थे. बाद की रिपोर्टों में इस अभियान में 27 नक्सलियों के मारे जाने की पुष्टि का उल्लेख है. गोलियों की गूंज वाली पहाड़ी पर तिरंगे का मान माटल की पहाड़ी तक पहुंचे और वहां तिरंगा फहराया. ध्वजारोहण के बाद जवानों ने ग्रामीणों को राष्ट्रीय ध्वज वितरित किए. बच्चों को मिठाइयां बांटी गईं और पूरा इलाका देशभक्ति के रंग में रंग गया.
भावुक हो उठे ग्रामीण
इस मौके पर ग्रामीणों की भावनाएं भी सामने आईं. ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने अपने गांव में पहली बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराते हुए देखा है. गांव के एक बुजुर्ग ने भावुक होकर कहा कि वे कई वर्षों से यहां रह रहे हैं, लेकिन अपनी आंखों के सामने पहली बार इस धरती पर भारत का तिरंगा लहराते हुए देख रहे हैं.
कभी होती थी गोलियों की तड़तड़ाहट, आज गूंज रहा भारत माता की जय
डर के साए से लोकतंत्र के उत्सव तक कुल्हाड़ीघाट कभी माओवादियों के प्रभाव वाला इलाका माना जाता था. सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के बाद अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है. जनवरी 2025 में कुल्हाड़ीघाट क्षेत्र में चलाए गए बड़े अभियान में शीर्ष माओवादी नेताओं समेत बड़ी संख्या में कैडर मारे गए थे. ऐसे में मटाल की पहाड़ी पर तिरंगा फहराना महज स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस बदलाव का प्रतीक बन गया है जिसमें कभी गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां अब राष्ट्रगान, भारत माता की जय और तिरंगे की शान दिखाई दे रही है.
कुल्हाड़ीघाट के ग्रामीणों के लिए यह दिन इसलिए भी खास रहा, क्योंकि जिस इलाके में लंबे समय तक भय और बंदूक का साया रहा, उसी पहाड़ी पर पहली बार तिरंगा शान से लहराया. यह दृश्य सुरक्षा बलों के अभियान के साथ-साथ ग्रामीणों के भीतर लौटते भरोसे और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ाव की नई तस्वीर पेश करता है.
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