बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हमले की साजिश में शामिल बिश्नोई गैंग के शूटरों पर महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट यानी MCOCA लगाया गया है. इसी के साथ एक बार फिर चर्चा में आया है महाराष्ट्र का वह कानून, जिसने 1990 के दशक में मुंबई अंडरवर्ल्ड के खिलाफ पुलिस को सबसे बड़ी ताकत दी थी. 1999 में लागू हुए इस कानून ने दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील जैसे अपराध सिंडिकेट्स के नेटवर्क पर चोट की, लेकिन इसकी कहानी सिर्फ गैंगस्टरों तक सीमित नहीं रही. इस कानून के तहत फिल्म फाइनेंसर, फिल्म निर्माता, पत्रकार, जज और यहां तक कि पुलिस कमिश्नर स्तर तक के अधिकारी भी गिरफ्तार हुए. कभी अपराधियों के खिलाफ इस्तेमाल हुआ यही कानून बाद में पुलिस अधिकारियों पर भी लागू हुआ और आज संगठित अपराध के नए मामलों में फिर पुलिस का अहम हथियार बना हुआ है. दूसरे शब्दों में कहें तो करीब डेढ़ दशक की शांति के बाद जब मुंबई में एक बार फिर से संगठित अपराध ने सिर उठाया है, तो पुलिस एक बार फिर उसी मकोका कानून का सहारा ले रही है जिसने पहले अंडरवर्ल्ड के सफाए में उसकी सबसे बड़ी मदद की थी.
टाडा के खत्म होने के बाद आया मकोका
साल 1995 में जब आतंकवादी और विध्वंसक गतिविधि निरोधक कानून यानी टाडा (TADA) की मियाद खत्म हो गई, तब कानूनी एजेंसियों के पास संगठित अपराध सिंडिकेट से जुड़े अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए कोई वैसा सख्त कानून नहीं बचा था. टाडा एक बेहद कड़ा कानून था जिसका इस्तेमाल मुंबई पुलिस केवल आतंकवादियों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड से जुड़े मामलों में भी करती थी.
हालांकि कई मानवाधिकार संगठनों ने टाडा को एक क्रूर कानून बताया था और इसी विवाद के चलते इसे आगे नहीं बढ़ाया गया.
जिसके बाद कड़े कानून के अभाव का सीधा असर मुंबई के क्राइम ग्राफ पर पड़ा क्योंकि अपराधी सामान्य कानूनों से आसानी से बच निकलते थे. ऐसे में पुलिस ने एनकाउंटर की एक अलिखित और विवादास्पद नीति अपनाई, जिसमें कथित गैंगस्टरों को गोली मार दी जाती थी. हालांकि इस नीति पर न्यायपालिका और मानवाधिकार समूहों की कड़ी नजर पड़ी और इसके अपने अलग दुष्प्रभाव भी सामने आए. इसलिए तत्कालीन उपमुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे के नेतृत्व वाले राजनीतिक नेतृत्व ने पुलिस को टाडा जैसे प्रावधानों वाले एक नए कानून से लैस करने का फैसला किया.
मकोका ने अपराधियों की नींद उड़ा दी
साल 1999 में मकोका (MCOCA) लागू हुआ और इसने पुलिस को व्यापक अधिकार दिए. इस कानून के तहत पुलिस अधीक्षक (SP) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के सामने आरोपी द्वारा दिया गया इकबालिया बयान अदालत में उसके खिलाफ सबूत के तौर पर मान्य होता है. अगर किसी मामले में मकोका लगा दिया गया है, तो आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती और गिरफ्तारी के बाद सामान्य जमानत पाना भी बेहद मुश्किल हो जाता है. सामान्य कानूनों के तहत पुलिस किसी आरोपी की अधिकतम 15 दिनों की हिरासत ले सकती है, लेकिन मकोका पुलिस को आरोपी से 30 दिनों तक पूछताछ करने की इजाजत देता है.
इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि इसमें खुद को बेगुनाह साबित करने का भार अभियोजन एजेंसी पर नहीं बल्कि खुद आरोपी पर होता है. कुछ मामलों में इसका सीधा मतलब यह होता है कि जब तक आरोपी खुद को निर्दोष साबित न कर दे, तक तक उसे दोषी ही माना जाता है.
दाऊद के शूटर्स को मिली फांसी
इस नए कानून ने लागू होने के पहले ही साल के भीतर नतीजे देने शुरू कर दिए थे. मुंबई के पूर्व मेयर मिलिंद वैद्य पर गोलीबारी करने के मामले में मकोका के तहत बुक किए गए दाऊद इब्राहिम गैंग के तीन शूटरों को मौत की सजा सुनाई गई. इस हमले में मिलिंद वैद्य तो बच गए थे, लेकिन उनके कुछ कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी. यह इस कानून के तहत पहली सजा थी और इस जांच की निगरानी करने वाले डीसीपी प्रदीप सावंत को पुलिस कमिश्नर द्वारा बेस्ट डिटेक्शन ऑफिसर के पुरस्कार से नवाजा गया था. हालांकि दो साल बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के इस फैसले को पलट दिया था.
जज और पत्रकार तक पहुंचे सलाखों के पीछे
मकोका भारत के सबसे चर्चित आपराधिक कानूनों में से एक तब बन गया जब बॉलीवुड के सबसे बड़े फाइनेंसर भरत शाह को इसके तहत गिरफ्तार किया गया. उन पर दाऊद के गुर्गे छोटा शकील के कहने पर फिल्म 'चोरी चोरी चुपके चुपके' में पैसा लगाने का आरोप था. इस मामले में फिल्म के निर्देशक नाजिम रिजवी और कुछ अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया था. इस केस में गवाह के तौर पर बयान देने के लिए कई बड़ी फिल्मी हस्तियों को समन भेजा गया था, लेकिन प्रीति जिंटा को छोड़कर बाकी सभी अपने बयान से मुकर गए थे.
इतना ही नहीं, सेशंस कोर्ट के एक जज, जिनकी छोटा शकील के साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत को पुलिस ने इंटरसेप्ट किया था, उन पर भी मकोका के तहत मुकदमा चलाया गया था.
ये भी पढ़ें: जेल से जमानत पर बाहर आए इंजीनियर ने टाइगर श्रॉफ पर हुए हमले को अंजाम दिलवाया....अब गिरफ्तार
जब पुलिस कमिश्नर खुद ही मकोका में हो गए गिरफ्तार
मकोका की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ साल 2003 में आया, जब गैंगस्टरों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल करने वाले पुलिसवाले खुद मकोका के तहत गिरफ्तार कर लिए गए. करोड़ों रुपये के फर्जी स्टांप पेपर मामले, जिसे तेलगी घोटाले के नाम से भी जाना जाता है, उसमें यह कानून लगाया गया था. इस मामले की जांच या निगरानी करने वाले सब-इनस्पेक्टर से लेकर पुलिस कमिश्नर रैंक तक के कई पुलिसकर्मियों को मकोका के तहत गिरफ्तार किया गया और उन्हें करीब एक साल तक पुणे की यरवदा जेल में बंद रखा गया था. इसके बाद मुंबई के अंडरवर्ल्ड में करीब डेढ़ दशक तक सन्नाटा पसरा रहा, लेकिन अब जब एक बार फिर से संगठित अपराध ने सिर उठाया है, तो पुलिस फिर से उसी मकोका पर भरोसा कर रही है जिसने पहले अंडरवर्ल्ड से लड़ने में उसकी सबसे बड़ी मदद की थी.
ये भी पढ़ें: टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस : 11 में से 8 आरोपी सीधे अनिल पंडित के संपर्क में थे, राधा-बबीता के मददगार कौन हैं ?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं