- राज और उद्धव ठाकरे 1960 के संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की याद दिलाकर शिवसेना के मूल विचारों की ओर लौट रहे हैं
- ठाकरे बंधु मुंबई को आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिश का आरोप लगाकर मराठी वोटर को एकजुट करना चाह रहे हैं.
- PM मोदी के नेतृत्व को 1960 के मोरारजी देसाई के दौर से जोड़कर राजनीतिक संयोग पर जोर दिया जा रहा है
महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा घट रहा है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को इतिहास की धूल फांकने पर मजबूर कर दिया है. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, जो लंबे समय तक अलग-अलग दिशाओं में चल रहे थे. आज एक ही मंच से 1960 के 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' की दुहाई दे रहे हैं. पहली नजर में यह केवल एक ऐतिहासिक जिक्र लग सकता है, लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह शिवसेना के उस 'मूल विचार' की ओर वापसी है, जिसने 66 साल पहले मुंबई की सड़कों पर संघर्ष की इबारत लिखी थी.
यह वापसी बेवजह नहीं है. दरअसल, ठाकरे बंधु आज की राजनीतिक परिस्थितियों और 1960 के उस दौर के बीच एक गहरी समानता देख रहे हैं. उस दौर में मोरारजी देसाई का दौर था, जब डर यह था कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर दिया जाएगा. आज, राज और उद्धव इसी डर को नए स्वरूप में पेश कर रहे हैं. उनका तर्क है कि भले ही आज मुंबई को भौगोलिक रूप से अलग न किया जा रहा हो, लेकिन आर्थिक रूप से इसकी 'आत्मा' को गुजरात की ओर मोड़ा जा रहा है. इसी नैरेटिव के साथ वे मराठी मानुष को यह संदेश दे रहे हैं कि 1960 की तरह ही आज भी 'अस्तित्व की लड़ाई' शुरू हो चुकी है.
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इतिहास और वर्तमान के इसी जुड़ाव से शिवसेना का पुनर्जन्म जुड़ा है. जिस तरह 1960 के आंदोलन के गर्भ से बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना का उदय हुआ था, ठीक वैसे ही 2026 में राज और उद्धव की 'एकजुटता' को एक नई शुरुआत के तौर पर पेश किया जा रहा है. वे जानते हैं कि जब-जब मुंबई पर 'बाहरी खतरे' का शोर बढ़ा है, तब-तब क्षेत्रीय भावनाओं ने राष्ट्रीय दलों के समीकरण बिगाड़े हैं. इसी 'थ्रेट परसेप्शन' यानी खतरे के अहसास को वे एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि छिटक चुका मराठी वोटर वापस अपने घर लौट आए.
ठाकरे बंधुओं का तर्क है कि आज फिर वैसी ही स्थिति पैदा हो गई है. उनके नैरेटिव के केंद्र में तीन मुख्य बिंदु हैं:
नेतृत्व का संयोग: 1960 के दौरान मोरारजी देसाई एक शक्तिशाली गुजराती चेहरा थे, जो मुंबई के भविष्य का फैसला कर रहे थे. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में फिर से एक शक्तिशाली गुजराती नेतृत्व केंद्र में है. राज और उद्धव इसी ऐतिहासिक संयोग को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.
उद्योगों का पलायन: राज और उद्धव दोनों ही लगातार आरोप लगा रहे हैं कि मुंबई से बड़े प्रोजेक्ट्स और बिजनेस हेडक्वार्टर (जैसे डायमंड बोर्स और अन्य वित्तीय संस्थान) धीरे-धीरे गुजरात की ओर शिफ्ट किए जा रहे हैं. उनका दावा है कि यह मुंबई को आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिश है, ठीक वैसे ही जैसे 1960 में राजनीतिक रूप से अलग करने की कोशिश हुई थी.शिवसेना का पुनर्जन्म: 1960 के आंदोलन ने शिवसेना के जन्म का आधार तैयार किया था. आज जब शिवसेना और मनसे (MNS) एक तरह से 'यूनाइटेड फ्रंट' के रूप में दिख रहे हैं, तो ठाकरे बंधु इसे शिवसेना के 'पुनर्जन्म' के रूप में पेश कर रहे हैं.
आंदोलनों का अर्क: पुराने मुद्दों की नई पैकेजिंग
राज ठाकरे ने पिछले कुछ महीनों में केवल 1960 की बात नहीं की है, बल्कि उन्होंने शिवसेना के पुराने सभी आंदोलनों का 'अर्क' निकाल लिया है:
- भाषा का मुद्दा: दुकानों पर मराठी बोर्ड को लेकर की गई तोड़फोड़ और हंगामा.
- उत्तर भारतीय बनाम मराठी: हाल के महीनों में उत्तर भारतीयों के खिलाफ उठने वाले सुर.
- बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी: दक्षिण भारतीयों के खिलाफ शिवसेना के शुरुआती नारे की याद दिलाना.
इस तीखे क्षेत्रीय नैरेटिव ने सत्ताधारी गठबंधन, खासकर बीजेपी की चिंताएं बढ़ा दी हैं. बीजेपी इसे सिरे से खारिज करते हुए 'विकास' का दांव खेल रही है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का तर्क है कि आज का मराठी मानुष 1960 के संघर्ष का सम्मान तो करता है, लेकिन वह भविष्य में 'ग्लोबल मुंबई' का हिस्सा बनना चाहता है, न कि आंदोलनों में उलझना.बीजेपी की रणनीति यहां 'काउंटर-पोलराइजेशन' की है—यानी अगर ठाकरे बंधु मराठी वोट एकजुट करते हैं, तो बीजेपी अन्य भाषाई समुदायों (गुजराती, उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय) को विकास के नाम पर एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश कर रही है.
सारा मुकाबला 'पुरानी विरासत बनाम नई उम्मीद' के बीच आकर टिक गया है. 1960 में प्राथमिकता 'राज्य की स्थापना' थी, जबकि 2026 में प्राथमिकता 'रोजगार और आर्थिक नेतृत्व' है. पीढ़ी बदल चुकी है, सोच बदल चुकी है और प्राथमिकताएं भी. क्या 1960 का वह क्रांतिकारी जोश आज के 'डिजिटल और ग्लोबल' मराठी युवाओं के दिलों में जगह बना पाएगा? क्या राज और उद्धव की यह जुगलबंदी शिवसेना को उसका पुराना गौरव लौटा पाएगी या फिर बीजेपी का विकास आधारित गणित इस क्षेत्रीय लहर को सोख लेगा? मुंबई के समंदर की लहरें इस बार बहुत कुछ नया कहने वाली हैं, और इसका जवाब जल्द ही ईवीएम की पेटियों से निकलने वाला है.
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