- 15 अगस्त 1942 को उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के मधुबन थाने पर तिरंगा फहराने के लिए विशाल आंदोलन हुआ था
- ब्रिटिश कलेक्टर कठघरा शंकर के आदेश पर पुलिस ने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर गोलियां चला दीं थीं
- इस गोलीकांड में 13 युवा शहीद हुए और कई घायल हुए, फिर भी क्रांतिकारियों ने थाने पर तिरंगा फहराया था
भारत की आजादी का इतिहास बलिदान की कहानी कहता नजर आता है. जहां अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजादी दिलाई थी. 15 अगस्त 1942 का दिन भी देश की आजादी के लिहाज से अहम माना जाता है. क्योंकि उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में आने वाले मधुबन में एक ऐसी क्रांति हुई थी, जिसने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था. साल 1942 में आज ही के दिन 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन के आह्वान पर मधुबन थाने में हुई इस ऐतिहासिक घटना को 'मधुबन कांड' के नाम से भी जाना जाता है. जिसकी गूंज लंदन की संसद तक सुनाई दी थी. इस दिन हजारों की भीड़ ने मधुबन थाने पर तिरंगा फहराने के लिए धावा बोला था. इस दौरान ब्रिटिश पुलिस ने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर गोलियां चला दी थी, जिसमें 13 युवा शहीद हुए थे. इसके बाद भी युवाओं ने थाने पर तिरंगा फहराकर ही दम लिया था.
कैसे हुई थी मधुबन में क्रांति
दरअसल, 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने बंबई के गवालिया टैंक मैदान से 'करो या मरो' का नारा दिया, तो इसकी गूंज उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों तक भी पहुंच गई. हर युवा अब अंग्रेजों से अपने देश को आजाद कराना चाहता था. देखते ही देखते उत्तर प्रदेश के मऊ, आजमगढ़ और बलिया जिलों में स्वतंत्रता सेनानी एकजुट होने लगे, सबकी केवल एक ही सोच थी देश को आजादी दिलाना. 15 अगस्त 1942 को युवाओं ने मधुबन थाने पर तिरंगा फहराने की तैयारी कर ली थी. सुबह होते ही मधुबन की धरती 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'वंदे मातरम' के नारों से गूंज उठी. तिरंगा थामे क्रांतिकारियों का एक विशाल समूह मधुबन थाने की तरफ बढ़ा और देखते ही देखते आंदोलनकारियों ने पूरा थाना घेर लिया.
ब्रिटिश कलेक्टर के इशारे पर चली गोलियां
इस भीड़ का नेतृत्व वीर सेनानी राम नक्षत्र तिवारी उत्तर-पूर्व दिशा से कर रहे थे. भीड़ जैसे-जैसे थाने के नजदीक पहुंच रही थी, नारों की गूंज और तेज होती जा रही थी. ऐसे में तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर कठघरा शंकर के इशारे पर पुलिस ने सीधे आंदोलनकारियों पर फायरिंग कर दी. इस दौरान गोली लगने से राम नक्षत्र तिवारी भी लहूलुहान हो गए. लेकिन उन्होंने युवाओं से आगे बढ़ने के लिए जोर लगाया. थाने के सामने का मैदान चंद मिनटों में कुरुक्षेत्र बन गया, ब्रिटिश पुलिस ने निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियों की बौछार कर दी.
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थाने पर फहराया तिरंगा
ब्रिटिश पुलिस की गोलियों ने देश प्रेम जज्बे को और बढ़ा दिया. क्रांतिकारियों ने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर थाने की प्राचीर पर यूनियन जैक को उतार फेंका और शान से भारत का तिरंगा फहरा दिया. इस घटना में 13 जवान शहीद हो गए थे, जबकि कई जवान घायल हो गए थे. इस घटना के बाद क्रांतिकारियों ने मधुबन से आजमगढ़ जाने वाली मुख्य सड़क और संचार माध्यमों को काट दिया था. देशभर में गुस्सा देखा गया और इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग से हुई. वहीं बीबीसी लंदन ने भी इस घटना को प्रमुखता से छापा था. जबकि आजादी की क्रांति और तेज होती गई थी.
मधुबन में बना है भव्य शहीद स्मारक
आजादी के बाद मधुबन की मिट्टी में उस बलिदान की खुशबू महसूस की जा सकती है. शहर में शहीदों की याद में कटघरा शंकर तिराहे के पास भव्य शहीद स्मारक और शहीद पार्क बनाया गया है. हर साल 15 अगस्त को पूरा जिला इन शहीदों को नमन करने उमड़ता है. मधुबन कांड सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और कभी न झुकने वाले संकल्प का अमर प्रतीक है. जिसे आज भी पूरा देश याद करता है.
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