प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करते हुए 'सप्त सिंधु' का खास तौर से जिक्र किया. भारत की आजादी की 80वीं वर्षगांठ के इस अवसर पर उन्होंने देश के सामने 'सप्त शक्ति' का नया विचार रखा है. प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत प्राचीन सप्त सिंधु सभ्यता का देश है. जिस तरह प्राचीन काल में सात नदियों के प्रवाह ने भारत को समृद्ध, खाद्यान्न से परिपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाया, ठीक उसी तर्ज पर आज भारत को आधुनिक वैश्विक मंच पर शीर्ष तक पहुंचने के लिए सात नई 'शक्ति धाराओं' के एकीकृत प्रवाह की आवश्यकता है.
इसी विचार के आधार पर प्रधानमंत्री ने भविष्य के भारत के लिए 7 प्रमुख लक्ष्य तय किए हैं.
लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी का नया राष्ट्र-मंत्र, ‘शक्ति की सप्तधारा'!
— BJP (@BJP4India) August 15, 2026
2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की दिशा तय करने वाला यह विज़न, नए भारत की शक्ति, संकल्प और सामर्थ्य का रोडमैप है।#IndiaIndependenceDay pic.twitter.com/7Rr9AD0fzu
क्या है 'सप्त सिंधु' का मूल अर्थ और इतिहास?
'सप्त सिंधु' का सीधा और स्पष्ट अर्थ है. सात पवित्र नदियों की भूमि. प्राचीन काल में जिस भू-भाग पर ये सात नदियां बहती थीं, उसी क्षेत्र को सप्त सिंधु का इलाका कहा गया. यह केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि भारत की शुरुआती जीवन शैली, कृषि और सभ्यता का मुख्य केंद्र था.
प्राचीन काल में इन नदियों के पानी ने भारतीय उपमहाद्वीप पर खेती-बाड़ी को समृद्ध किया, इसके साथ ही व्यापार और विचारों के आदान-प्रदान के लिए भी रास्ते खोले. इसी ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने संदेश दिया कि जिस प्रकार इन नदियों के संगम ने भारत को प्राचीन काल में समृद्ध बनाया था, ठीक उसी तरह आज की सात नई शक्तियां भारत को एक नई पहचान और गति देंगी.
इसी सप्त सिंधु से अखंड भारत की प्रतिध्वनि आती है.
प्राचीन ग्रंथों और ऋग्वेद में सप्त सिंधु का है जिक्र
सप्त सिंधु का जिक्र भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है. ऋग्वेद के 'नदी-सूक्त' में इन सात नदियों और उनके आसपास के क्षेत्र का विस्तृत विवरण दिया गया है. प्राचीन इतिहासकार मानते हैं कि वैदिक संस्कृति और ऋग्वेद की रचना का एक बड़ा हिस्सा इसी सप्त सिंधु क्षेत्र में संपन्न हुआ था.
ऋग्वेद के अलावा कई अन्य संस्कृत साहित्य और ऐतिहासिक पुस्तकों में भी इस क्षेत्र को ज्ञान और कृषि का बड़ा केंद्र बताया गया है. इन नदियों के तटों पर प्राचीन ऋषियों के आश्रम हुआ करते थे, जहां वेद, गणित, आयुर्वेद और नागरिक व्यवस्था से जुड़े अध्ययन किए जाते थे. इसी कारण इस क्षेत्र को भारतीय सभ्यता के शुरुआती आधार स्तंभों में से एक माना जाता है.
जानिए प्राचीन भारत की उन 7 नदियों के नाम
प्राचीन काल की जिन सात नदियों से 'सप्त सिंधु' नाम बना, वे भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में प्रवाहित होती थीं. प्राचीन साहित्य के अनुसार इन सात नदियों के नाम और उनकी वर्तमान पहचान इस प्रकार है.
- सिंधु- इस पूरे क्षेत्र की सबसे मुख्य और विशाल नदी सिंधु है.
- वितस्ता- प्राचीन काल की वितस्ता नदी को आज हम झेलम नदी के नाम से जानते हैं.
- असिकनी- इस प्राचीन नदी की मौजूदा पहचान चिनाब नदी के तौर पर है.
- परुष्णी- वैदिक काल में परुष्णी कही जाने वाली नदी को आज रावी कहा जाता है.
- विपाशा- प्राचीन विपाशा नदी को वर्तमान में ब्यास नदी के नाम से जाना जाता है.
- शुतुद्री- इस नदी को आज सतलुज नदी के नाम से पहचाना जाता है.
- सरस्वती- यह प्राचीन काल की अत्यंत पवित्र नदी थी, जो कालंतर में भूमिगत हो गई.
कहा जाता है कि इन सात नदियों की वजह से ही सिंधु घाटी सभ्यता फली-फूली थी. इसकी वजह से ही भारतीय उपमहाद्वीप की जमीन बेहद उपजाऊ बनी रही. इस वजह से भोजन और संसाधनों की कभी कमी नहीं हुई.

प्राचीन नदियों के प्रवाह से आधुनिक 'सप्त शक्ति' की प्रेरणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राचीन नदियों के इस एकीकृत प्रवाह से प्रेरणा लेते हुए आधुनिक भारत के लिए 'सप्त शक्ति' का खाका तैयार किया है. जिस प्रकार प्राचीन काल में सात नदियों के जल ने देश को हर दृष्टि से संपन्न और मजबूत बनाया था, उसी प्रकार 21वीं सदी के भारत को आगे ले जाने के लिए सात नई शक्ति धाराओं की प्रधानमंत्री ने देश के विकास में जरूरी बताया है. इससे भारत आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और सामाजिक पंक्ति में दुनिया में सबसे आगे खड़ा हो सकेगा.
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