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आजादी के बाद भी इन 5 रियासतों ने भारत में विलय से कर दिया था इनकार, जानिए फिर कैसे बना वर्तमान भारत ?

15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद भी जूनागढ़, हैदराबाद, त्रावणकोर, भोपाल और जम्मू-कश्मीर जैसी 5 रियासतों ने भारत में विलय से इनकार कर दिया था. जानिए कैसे सरदार पटेल और वी.पी. मेनन की कूटनीति व सैन्य कार्रवाई से इन रियासतों का भारत में विलय हुआ और वर्तमान भारत का नक्शा तैयार हुआ.

आजादी के बाद भी इन 5 रियासतों ने भारत में विलय से कर दिया था इनकार, जानिए फिर कैसे बना वर्तमान भारत ?

बात 15 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक सुबह की है. देश आजादी के जश्न में डूबा हुआ था, संसद भवन से गूंजा पंडित नेहरू का 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' वाला भाषण हवा में तैर रहा था और हर तरफ एक नए भारत का स्वागत हो रहा था. लेकिन अगर उस सुबह आप भारत का आधिकारिक नक्शा उठाकर देखते, तो उसमें आपको 5 जगह बड़े-बड़े खाली छेद दिखाई देते! दरअसल अंग्रेजों ने जाते-जाते जो चाल चली थी, उसके मुताबिक भारत की 500 से अधिक रियासतों को यह छूट मिली थी कि वे चाहें तो भारत में मिलें, पाकिस्तान में जाएं या फिर स्वतंत्र रहें. हालांकि सरदार पटेल और वी.पी. मेनन ने अपनी सूझबूझ और साम-दाम-दंड-भेद की नीति से अधिकांश राजाओं को तो मना लिया, लेकिन 5 रियासतों के राजा-नवाब अपनी अलग ही अड़ंगेबाजी पर उतर आए. उनका मन था कि आजादी के बाद भी उनकी बादशाहत यूं ही चलती रहे... ये रियासतें थीं—त्रावणकोर, जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल और कश्मीर.आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं कि 15 अगस्त 1947 के बाद कैसे एक-एक करके इन पांचों राज्यों का भारत में विलय कराया गया और कैसे जाकर तैयार हुआ मौजूदा भारत का नक्शा.

आजादी के बाद रियासतों के विलय को लेकर चैंबर ऑफ प्रिंसेस की नई दिल्ली में हुई बैठक की तस्वीर

आजादी के बाद रियासतों के विलय को लेकर चैंबर ऑफ प्रिंसेस की नई दिल्ली में हुई बैठक की तस्वीर

1. जूनागढ़: नवाब का पाकिस्तान में विलय और कुत्तों के साथ कराची फरार होना

सौराष्ट्र की जूनागढ़ रियासत चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरी हुई थी और उसकी बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी. इसके बावजूद नवाब महाबत खान रसूल खान ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में शामिल होने के विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. 13 सितंबर 1947 को पाकिस्तान ने जूनागढ़ के विलय को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया, जिससे भारत सरकार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया.नवाब के इस फैसले के खिलाफ पूरी रियासत में 'आरजी हुकूमत' यानि अस्थायी सरकार के तहत जनविद्रोह शुरू हो गया. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि नवाब अपनी तिजोरी और प्रिय पालतू कुत्तों को लेकर विमान से कराची भाग गया. इसके बाद 9 नवंबर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ का प्रशासन संभाला. अंततः 20 फरवरी 1948 को वहां जनमत संग्रह (Plebiscite) कराया गया, जिसमें 1,90,870 मतदाताओं में से केवल 91 लोगों ने पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया और जूनागढ़ पूर्ण रूप से भारत का हिस्सा बन गया.

हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान और सरदार पटेल की मुलाकात

हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान और सरदार पटेल की मुलाकात

2. हैदराबाद: 15 करोड़ का गुप्त कर्ज और 'ऑपरेशन पोलो'

आजादी के समय हैदराबाद सबसे बड़ी और अमीर रियासतों में से एक थी. निजाम मीर उस्मान अली खान ने 15 अगस्त 1947 के बाद भी भारत में शामिल होने से साफ मना कर दिया. निजाम ने 29 नवंबर 1947 को भारत सरकार के साथ एक साल का 'यथास्थिति समझौता' यानि Standstill Agreement किया. लेकिन इस समझौते की आड़ में वे स्वतंत्र देश की तैयारियां करते रहे. पर्दे के पीछे से वे पाकिस्तान को 15 करोड़ रुपये का गुप्त कर्ज दे चुके थे और यूरोप व पाकिस्तान के जरिए अवैध रूप से हथियारों की तस्करी करवा रहे थे.
निजाम की मंशा भारत के सीने में एक 'स्वतंत्र इस्लामिक राज्य' बनाने की थी, जिसे शह देने के लिए कासिम रिजवी के नेतृत्व वाली निजी उग्रवादी सेना 'रजाकारों' को खुली छूट दे दी गई. रजाकारों ने बहुसंख्यक आबादी पर भयावह अत्याचार, लूटपाट और हिंसा शुरू कर दी, जिससे सीमावर्ती इलाकों में भारी अस्थिरता फैल गई.जब सभी कूटनीतिक रास्ते और बातचीत की कोशिशें नाकाम हो गईं, तो सरदार पटेल ने सख्त फैसला लिया. 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने मेजर जनरल जे.एन. चौधरी की अगुवाई में हैदराबाद के खिलाफ 'ऑपरेशन पोलो' (पुलिस कार्रवाई) शुरू किया. महज 100 घंटे के भीतर निजाम की सेना और रजाकारों ने घुटने टेक दिए और 17 सितंबर 1948 को निजाम ने रेडियो पर आत्मसमर्पण का ऐलान कर हैदराबाद का भारत संघ में विलय स्वीकार कर लिया. 

अपने ही राजा के खिलाफ त्रावणकोर रियासत के लोग सड़कों पर उतर आए थे

अपने ही राजा के खिलाफ त्रावणकोर रियासत के लोग सड़कों पर उतर आए थे

3. त्रावणकोर: आजादी के बाद भी बगावत  

दक्षिण भारत की समृद्ध रियासत त्रावणकोर के दीवान सर सीपी रामास्वामी अय्यर ने आजादी से पहले ही स्वतंत्र रहने का ऐलान कर दिया था. इसी वजह से 15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने के बाद भी यह रियासत भारत संघ से बाहर ही रही. दीवान का मानना था कि यूरेनियम और समृद्ध समुद्री तटों के साथ त्रावणकोर एक स्वतंत्र देश के रूप में आसानी से सर्वाइव कर सकता है. वे मोहम्मद अली जिन्ना के साथ गोपनीय बातचीत कर रहे थे और ब्रिटेन के साथ स्वतंत्र व्यापारिक समझौते की योजना बना रहे थे. इस अड़ियल रवैये को बल तब मिला जब जिन्ना ने त्रावणकोर को पाकिस्तान में एक हाई कमिश्नर नियुक्त करने तक का न्योता तक दे दिया. हालांकि, इस बगावत का अंत तब हुआ जब 25 जुलाई 1947 की शाम एक संगीत कार्यक्रम से लौटते वक्त केरल सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता ने दीवान पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया. इस हमले में गंभीर रूप से घायल होने और स्थानीय जनता के आक्रोश को देखकर महाराजा बेहद डर गए. आखिरकार 30 जुलाई 1947 को महाराजा श्रीचितिरा थिरुनल बलराम वर्मा ने वी.पी. मेनन को तार भेजकर भारत में विलय (Instrument of Accession) की अपनी सहमति दे दी.लेकिन उसके बाद भी इसका पूर्ण प्रशासनिक एकीकरण अटका रहा.बाद में 1 जुलाई 1949 को जाकर त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर 'तिरु-कोच्चि' (Thiru-Kochi) राज्य बनाया गया, तब जाकर इसका प्रशासनिक एकीकरण पूरा हुआ.

भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय साल 1949 में हुआ था

भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय साल 1949 में हुआ था
Photo Credit: राजभवन, मध्य प्रदेश

4. भोपाल: नवाब के खिलाफ सड़कों पर उतरी जनता

भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान मोहम्मद अली जिन्ना के बेहद करीबी मित्र थे और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के कट्टर समर्थक माने जाते थे. चेंबर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर रहे नवाब की महत्वाकांक्षा भोपाल को भारत के बीचों-बीच एक 'तीसरा डोमिनियन' बनाने की थी. उन्होंने मध्य भारत के अन्य राजाओं को भी भारत संघ के खिलाफ भड़काने की कोशिश की.नवाब के इस अड़ियल रवैये के खिलाफ जनवरी 1949 में भोपाल की सड़कों पर जनता उमड़ पड़ी और ऐतिहासिक 'भोपाल विलीनीकरण आंदोलन' की शुरुआत हुई.

भाई रतन कुमार, ठाकु़र लाल सिंह और मास्टर लाल सिंह जैसे स्थानीय नेताओं की अगुवाई में जनता ने 'नया भोपाल या नया नवाब' के नारों के साथ सत्याग्रह और कर-रोको (No-Tax) अभियान चला दिया. इसी दौरान नर्मदा किनारे बोरास में तिरंगा फहराने पर नवाब की पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई युवा शहीद हो गए

. इस शहादत ने आंदोलन की आग को और भड़का दिया. जनता के इस आक्रोश, भोपाल में बिगड़ती व्यवस्था और सरदार पटेल की अंतिम चेतावनी के आगे नवाब को आखिरकार घुटने टेकने पड़े. उन्होंने 30 अप्रैल 1949 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और 1 जून 1949 को भोपाल का आधिकारिक रूप से भारत में विलय हो गया.

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5. जम्मू-कश्मीर: महाराजा का स्वतंत्र रहने का सपना और आधी रात का दस्तखत

अंत में बात सबसे विवादित रियासत के विलय की. 15 अगस्त 1947 के दिन जम्मू-कश्मीर न तो भारत में शामिल हुआ और न ही पाकिस्तान में. महाराजा हरि सिंह कश्मीर को 'पूर्व का स्विट्जरलैंड' बनाना चाहते थे और उन्होंने दोनों देशों के सामने यथास्थिति समझौते का प्रस्ताव रखा. पाकिस्तान ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया, लेकिन उसकी नीयत में खोट था.22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन गुलमर्ग' के तहत कबाइलियों और अपनी सेना की भेष बदलकर घुसपैठ कराई और कश्मीर पर आक्रमण कर दिया.
जब हमलावर मुजफ्फराबाद, उड़ी और बारामूला में कत्लेआम मचाते हुए श्रीनगर के बेहद करीब (मुहाने तक) पहुंच गए, तब असहाय महाराजा ने जम्मू भागकर भारत से तुरंत सैन्य सहायता मांगी. भारत के तत्कालीन गृह सचिव वी.पी. मेनन 25 अक्टूबर को श्रीनगर और फिर जम्मू पहुंचे. भारत ने साफ कर दिया कि बिना विलय पत्र के अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत भारतीय सेना वहां नहीं जा सकती. 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने 'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसिन' (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए, जिसे गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को मंजूरी दे दी. इसके ठीक बाद, 27 अक्टूबर 1947 की तड़के सिख रेजिमेंट के जांबाज सैनिकों को डगलस सी-47 विमानों से श्रीनगर एयरबेस उतारा गया और भारतीय सेना ने पाकिस्तानी हमलावरों को खदेड़ना शुरू किया. जिसके बाद ही कश्मीर का भारत में विलय संभव हो सका. 
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