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लखनऊ अग्निकांड: अगर 10 साल पहले गिरा दी जाती इमारत, तो बच जाती 15 मासूम बच्‍चों की जान!

Lucknow Fire: लखनऊ में आग से खाक हुई इमारत में कोचिंग सेंटर होना ही नहीं चाहिए था, क्‍योंकि ये एक रिहायशी इमारत थी. यूपी सरकार ने बताया कि इस इमारत को गिराने के आदेश 10 साल पहले 2016 में दिये गए थे. अगर तब आदेश का पालन होता, तो 15 मासूम जिंदगियां बच सकती थीं.

लखनऊ अग्निकांड:  अगर 10 साल पहले गिरा दी जाती इमारत, तो बच जाती 15 मासूम बच्‍चों की जान!
लखनऊ में आग से खाक हुई इमारत को 2016 में गिराने का आदेश मिला था, जिसे 2 महीने के भीतर ही रद्द कर दिया गया था
लखनऊ:

लखनऊ विकास प्राधिकरण अगर 10 साल पहले अलीगंज इलाके की तीन मंजिला इमारत पर बुलडोजर चलाने का आदेश वापस नहीं लेता, तो शायद सोमवार को इस बिल्डिंग में बने कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग में 15 मासूम छात्रों की दर्दनाक मौत नहीं होती. आखिर, कैसे अधिकारियों ने एक ऐसी इमारत में कोचिंग सेंटर चलाने की इजाजत दे दी, जो एक रिहायशी बिल्डिंग थी? यूपी सरकार की ओर से सोमवार रात बताया गया कि हादसे की शिकार हुई तीन मंजिला इमारत को 2016 में ध्वस्त करने का आदेश दिया गया था, लेकिन दो महीने बाद उस आदेश को रद्द कर दिया गया था.   

नियमों का ताक पर रखकर चल रहा थाा कोचिंग सेंटर 

रिहायशी इमारत और कमर्शियल बिल्डिंग के नक्‍शे में अंतर होता है. इस नक्‍शे के आधार पर ही तय किया जाता है कि इमारत में कोई कमर्शियल काम किया जा सकता है या नहीं. सरकार ने बताया कि हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग का नक्‍शा एक रिहायशी इमारत के रूप में प्राधिकरण से पास कराया गया था. इसके बावजूद इस इमारत में कोचिंग सेंटर चलाया जा रहा था, जो सीधे-सीधे नियमों का उल्‍लंघन है. इन नियमों की अनदेखी कई सरकारी अधिकारियों के द्वारा की गई, जिसका परिणाम 15 मासूम छात्रों की दर्दनाक मौत के रूप में सामने आया है. 

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आखिर, क्‍यों रद्द हुआ इमारत को गिराने का आदेश? 

यूपी सरकार के मुताबिक, अलीगंज की जिस इमारत में आग लगी, उसके खिलाफ 2016 में अवैध निर्माण को लेकर गिराने का आदेश जारी किया गया था, लेकिन दो महीने से कम समय में ही उस आदेश को रद्द कर दिया गया था, जबकि इमारत के स्‍ट्रक्‍चर में कोई बदलाव नहीं किया गया था. फिर इमारत को गिराए जाने का आदेश वापस क्‍यों लिया गया? इसे लेकर अब प्राधिकरण पर कई सवाल उठ रहे हैं.  

बिल्डिंग के मालिक के खिलाफ 2016 में मुकदमा भी हुआ 

सरकार के बयान के मुताबिक, अलीगंज के सेक्टर-डी स्थित इस इमारत को 11 जुलाई 1980 को लॉटरी सिस्‍टम के तहत विजय कुमार को हायर-परचेज स्कीम पर दिया गया था. उसी साल चार नवंबर को इमारत का कब्जा भी सौंप दिया गया था. अधिकारियों के अनुसार, साल 2005 में यह इमारत सेल डीड के जरिए विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज की गई, जिसे 19 जनवरी 2013 को दम्पति ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दिया. उन्होंने बताया कि करीब 1992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का मैप 20 अगस्त 2014 को सेल्फ-सर्टिफिकेशन बिल्डिंग प्लान स्कीम के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था. हालांकि, बाद में इमारत में अनाधिकृत निर्माण की बात सामने आने पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज कराया.

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प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कई लोग बिल्डिंग से कूद गए, जो आग में पूरी तरह जलकर खाक हो गई थी. इस इमारत में एक पेट क्लिनिक भी था. दोपहर करीब 3 बजे लगी आग पर काबू पाने के लिए हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म गाड़ी समेत 14 दमकल गाड़ियां तैनात की गईं.

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एक्‍शन मोड में पुलिस, इमारत के मालिक समेत 4 गिरफ्तार

यूपी सरकार के बयान के अनुसार, जांच के बाद 10 मई 2016 को अनाधिकृत निर्माण के खिलाफ इमारत को गिराए जाने का आदेश पारित कर दिया, लेकिन दो महीने के अंदर पांच जुलाई 2016 को इस आदेश को रद्द भी कर दिया गया. इसी इमारत में सोमवार को लगी भीषण आग में झुलसकर कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई और नौ अन्य जख्मी हो गये. पुलिस ने इस मामले में इमारत के मालिकों समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार किए गए लोगों में राम कृष्ण उपाध्याय (43), वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला (62), तुषार कृष्ण जायसवाल (31) और सुरेश कुमार साहू शामिल हैं. उपाध्याय, शुक्ला और जायसवाल आग की जद में आई इमारत के संयुक्त रूप से मालिक हैं.

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