- कश्मीर में युवा बड़ी संख्या में नेशनल कैडेट कोर हो रहे शामिल
- हिंसा के बजाय अनुशासन, सेवा और सेना की वर्दी को चुन रहे हैं
- 2025 से अब तक घाटी का एक भी युवा आतंकी गुटों में शामिल नहीं हुआ है.
कश्मीर बदल रहा है. यहां की फिजा भी बदल रही है. जो जगहें कभी पत्थरबाजी और आतंकियों की भर्ती के लिए जानी जाती थीं, वहां के युवा लड़के-लड़कियां बड़ी संख्या में नेशनल कैडेट कोर (NCC) से जुड़ रहे हैं और हिंसा के बजाय अनुशासन, सेवा और सेना की वर्दी को चुन रहे हैं. ये हम नहीं बल्कि आंकड़े बता रहे हैं. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि आतंकवादी संगठनों में स्थानीय लोगों की भर्ती में भारी गिरावट आई है. सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, 2025 से अब तक घाटी का एक भी युवा आतंकी गुटों में शामिल नहीं हुआ है.
कुपवाड़ा, श्रीनगर का डाउनटाउन इलाका और बांदीपोरा कभी पत्थरबाजी और आतंकियों की भर्ती के लिए जानी जाती थीं. कुपवाड़ा ज़िला लंबे समय से घुसपैठ के रास्ते के तौर पर जाना जाता रहा है. लेकिन अब पूरी कश्मीर घाटी में एक शांत क्रांति चल रही है. कुपवाड़ा के रहने वाले बिंतुल हुदा कहते हैं, "बचपन से ही मैं कश्मीर के लोगों और भारत माता, दोनों की सेवा करने के लिए सेना में शामिल होना चाहता था." जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें घर पर विरोध का सामना करना पड़ता है, तो उन्होंने कहा, "हम नई पीढ़ी हैं. हम बदलाव लाना चाहते हैं."
'माता-पिता को मुझे देखकर गर्व महसूस होता है'
श्रीनगर के नवाकदल की एक और युवा NCC कैडेट खुशबू जान भी यही बात कहती हैं. उन्होंने एक ही मकसद से NCC जॉइन किया था- आर्म्ड फोर्सेज में शामिल होना. खुशबू गर्व से कहती हैं, "जब मेरे माता-पिता मुझे NCC यूनिफ़ॉर्म में मार्च पास्ट करते हुए देखते हैं, तो उन्हें बहुत गर्व महसूस होता है." NCC ने कश्मीर के कई युवाओं को घाटी से बाहर निकलने और भारत को जानने-समझने का मौका दिया है. बारामूला के NCC कैडेट नुमान नबी कहते हैं, "मुझे आज भी याद है जब मैंने पहली बार बनिहाल टनल पार की थी. अपने नेशनल कैंप के दौरान मैंने देश की विविधता और अनेकता में एकता वाली खासियत को देखा. इसने मेरी सोच बदल दी."
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?
साल - NCC में शामिल हुए स्थानीय युवाओं की संख्या
- 2020 - 181
- 2021 - 142
- 2022 - 130
- 2023 - 23
- 2024 - 20, ज्यादातर दक्षिण कश्मीर में
कश्मीर की कहानी हमारी आंखों के सामने बदल रही है. वह दौर जब युवा लड़के बंदूकें लेकर जंगलों में गायब हो जाते थे, अब एक नई कहानी की जगह ले रहा है- गर्व, देशभक्ति और मकसद की कहानी. बांदीपोरा की सीरत जान कहती हैं, "हमारे लिए सपना अब सीमा पार जाने का नहीं है. हमारा सपना है सेना की वर्दी (ऑलिव ग्रीन) पहनना और देश की सेवा करना. हमने आतंकवाद की तबाही देखी है. अब हम पूरी ऊर्जा के साथ इसका मुकाबला करने के लिए तैयार हैं."
इन संवेदनशील जिलों की लड़कियों का NCC फ़ॉर्मेशन में मार्च करना कभी सोचा भी नहीं जा सकता था. आज यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कश्मीर हिंसा के बजाय शांति और आतंक के बजाय तिरंगे को चुन रहा है.
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