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20 से ज्यादा लोगों की मौत! जम्मू-कश्मीर में बारिश क्यों इतनी जानलेवा?

जम्मू-कश्मीर में हुई भारी तबाही को देखकर सभी के मन में सवाल है कि आखिर इतनी ज्यादा बारिश जम्मू-कश्मीर में क्यों हो रही है.

20 से ज्यादा लोगों की मौत! जम्मू-कश्मीर में बारिश क्यों इतनी जानलेवा?
जम्मू-कश्मीर में बारिश से तबाही
PTI

जम्मू-कश्मीर में पिछले कई दिनों से भारी बारिश का दौर जारी है. कई जगहों पर बादल भी फटे हैं. कई क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं. इस समय 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. मौसम विभाग के मुताबिक, आने वाले दिनों में भी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है.

क्यों बदल रहा जम्मू-कश्मीर का मौसम?

जम्मू-कश्मीर में हुई भारी तबाही को देखकर सभी के मन में सवाल है कि आखिर इतनी ज्यादा बारिश जम्मू-कश्मीर में क्यों हो रही है. एनडीटीवी ने आईआईटी रुड़की के हाइड्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अंकित अग्रवाल से बात की. उन्होंने काफी विस्तार से यह पैटर्न समझाया है. उनके मुताबिक, इस बारिश को सिर्फ इस तरह नहीं देखना चाहिए कि तीन दिन से लगातार बरसात हो रही है. वह कहते हैं कि बदलते मौसम को हमें कंपाउंड हाइड्रो-मौसमीय घटना' के रूप में देखना चाहिए. वर्तमान में सक्रिय मानसून और जम्मू के ऊपर मौजूद वेस्टर्न डिस्टर्बेंस एक साथ बने हुए हैं. जब इन दोनों सिस्टम का मिलन होता है, तो मानसून की नमी पश्चिमी हिमालय तक पहुंचती है और फिर पहाड़ों से टकराने के बाद तेज बारिश शुरू हो जाती है.

ग्लोबल वार्मिंग ने बिगाड़ दिया मौसम का मिजाज

जम्मू यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग की प्रोफेसर अनुराधा शर्मा भी इसी बात को आगे बढ़ाती हैं. उनके मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग ने स्थिति को और खराब किया है. वह कहती हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हवा अब पहले की तुलना में ज्यादा नमी वाली हो चुकी है. उसी वजह से भी ज्यादा बारिश देखने को मिल रही है. उनके अनुसार, पहले मानसून की नमी हिमालय की बाहरी पहाड़ियों में बारिश बनकर गिर जाती थी, लेकिन अब लद्दाख और अंदरूनी घाटियों तक पहुंच रही है. इसी वजह से गर्मियों में भी ज्यादा बारिश का दौर देखने को मिलता है और बादल फटने की घटनाएं भी होती हैं. वह कहती हैं कि हाल के दिनों में 12 के करीब क्लाउडबर्स्ट की घटनाएं हो चुकी हैं. 

तेज और ज्यादा बारिश का अंतर

वैसे ऐसा नहीं है कि जम्मू-कश्मीर में सिर्फ तेज बारिश की वजह से ही तबाही का दौर देखने को मिल रहा हो. असल में, लगातार हो रही बारिश का भी बड़ा नुकसान हो रहा है. इस बारे में प्रोफेसर अंकित अग्रवाल कहते हैं कि जब लगातार बारिश होती है, तो मिट्टी, पहाड़ों की ढलान और छोटे जलग्रहण क्षेत्र पानी सोखने की क्षमता खोना शुरू कर देते हैं. इसी वजह से अगर दोबारा सामान्य से तेज बारिश हो जाए तो पानी और तेजी से बहता है और इसी वजह से लैंडस्लाइड की घटनाएं बढ़ जाती हैं.

कश्मीर के पहाड़ कमजोर हैं!

वहीं, विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पश्चिमी हिमालय के पहाड़ अभी भी कमजोर हैं और जगह-जगह से टूट रहे हैं. भारी बारिश की वजह से चट्टानों में दरारें और ज्यादा बढ़ जाती हैं. इससे पहाड़ों पर दबाव पड़ता है और पहाड़ियां खिसककर लैंडस्लाइड का रूप ले लेती हैं. इसके अलावा, समय-समय पर आने वाले छोटे-छोटे भूकंप भी इन पहाड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं.

बर्फ पिघल रही, बांध टूट रहे

ऊंचाई वाले इलाकों में बढ़ता तापमान भी काफी नुकसान पहुंचा रहा है. विशेषज्ञ बताते हैं कि जब ग्लेशियर पिघलते और पीछे हटते हैं, तो उनके पीछे छोटी-छोटी झीलें बन जाती हैं जिन्हें सिर्फ ढीले पत्थर और मिट्टी रोककर रखते हैं. लेकिन जैसे ही क्लाउडबर्स्ट होता है या बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरता है, तो तेज बहाव के साथ भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे आता है. इससे बांध भी टूट सकते हैं.

इंसानों ने बर्बादी को दिया न्योता

प्राकृतिक कारण तो जम्मू-कश्मीर में हुई इस तबाही के लिए जिम्मेदार हैं ही, लेकिन इंसानी गतिविधियों ने भी कम नुकसान नहीं पहुंचाया है. सड़क, हाईवे और रेलवे बनाने के लिए पहाड़ों को काटा जाता है. इसी में सबसे बड़ी दिक्कत है. इन निमार्ण कार्य की वजह से बारिश का सारा पानी सीधे नदियों में पहुंच जाता है और नदियां जल्दी उफान पर आ जाती हैं.

प्रोफेसर अनुराधा शर्मा कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर में कई गांव इस समय नदियों और नालों के किनारे बसे हुए हैं. सरकार ने 654 ऐसे गांव चिन्हित किए हैं, जहां करीब 7.22 लाख लोग खतरे में हैं. इसके अलावा राजौरी, पुंछ, रियासी, जम्मू, बारामूला, बडगाम और डोडा जैसे क्षेत्र सबसे ज्यादा जोखिम वाले इलाकों में शामिल हैं.

समाधान क्या है?

भविष्य में इस संकट से कैसे निपटा जाए, इसको लेकर प्रोफेसर अंकित अग्रवाल ने अपनी राय दी है. वह कहते हैं कि सिर्फ बारिश का अनुमान लगाने से कुछ नहीं होने वाला. अब ऐसी चेतावनी प्रणाली बनाने की जरूरत है जो सिर्फ यह न बताए कि कितनी बारिश होगी बल्कि यह भी बताए कि किस इलाके में कितना खतरा रहने वाला है.

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