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न गोली, न धमाका: 30 साल में पहली बार शांत रहा कश्मीर का मई महीना

कश्‍मीर पिछले 30 दिनों से शांत है. न कोई गोली चली, न बम का धमाका सुनाई दिया. कश्‍मीर के 30 साल के इतिहास में यह पहला मौका है, जब मई का महीना इतनी शांत गुजरा है.

न गोली, न धमाका: 30 साल में पहली बार शांत रहा कश्मीर का मई महीना
घाटी में बंदूकों की जगह लौट रही रौनक, 30 साल बाद आया ऐसा मई
  • मई 2026 में जम्मू-कश्मीर में पिछले तीस वर्षों में पहली बार कोई बड़ा आतंकी हमला या हत्या नहीं हुई है
  • सुरक्षा बलों के लगातार अभियान, कड़ी सीमा निगरानी और बेहतर खुफिया तंत्र की वजह से आतंकवाद में गिरावट आई है
  • राजौरी जिले में ऑपरेशन शेरूवाली चलाकर आतंकियों की तलाश की गई लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है
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कश्‍मीर:

न गोली, न धमाका... कश्‍मीर घाटी में बंदूकों की जगह लौट रही रौनक. जम्मू-कश्मीर में मई 2026 का महीना सुरक्षा के लिहाज से खास माना जा रहा है. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि पिछले करीब 30 सालों में यह पहला मौका हो सकता है, जब पूरा मई महीना किसी बड़े आतंकी हमले या आतंकी हत्या के बिना गुजरा. कुल मिला कर देखें तो पहलगाम के बाद ये अच्छा संकेत है. इसके साथ ही लोकल आतंकियों की भर्ती में भारी कमी आई है.  

एक भी आतंकी घटना नहीं हुई 

1990 के दशक में आतंकवाद शुरू होने के बाद घाटी में शायद ही कोई ऐसा महीना रहा हो, जब पूरी तरह शांति बनी रही हो. ऐसे में मई 2026 को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के पहले पांच महीनों में आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं और मौतों में साफ गिरावट दर्ज की गई है. सुरक्षा बलों का मानना है कि इसके पीछे कई वजहें हैं. इनमें लगातार चलाए जा रहे आतंकवाद विरोधी अभियान, सीमा पर कड़ी निगरानी और बेहतर खुफिया तंत्र प्रमुख हैं. सेना और प्रशासन न सिर्फ मानवीय रूप से, बल्कि टेक्निकल सर्विलांस के माध्यम से भी सुरक्षा तंत्र को लगातार बेहतर बनाने में लगे हैं. अधिकारियों के अनुसार इन कदमों से आतंकी संगठनों की गतिविधियां काफी हद तक सीमित हुई हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि खतरा पूरी तरह खत्म हो गया है.

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सुरक्षाबल लगातार चौकस 

मई के दौरान सुरक्षा बल लगातार सक्रिय रहे. पिछले 10 दिनों से राजौरी जिले के जंगलों में आतंकियों की तलाश के लिए कई दिनों तक बड़ा अभियान चलाया गया. इस अभियान को "ऑपरेशन शेरूवाली" नाम दिया गया था. सुरक्षाबलों को इलाके में आतंकियों की मौजूदगी के संकेत मिले थे. इसके बाद सेना और पुलिस ने संयुक्त रूप से तलाशी अभियान शुरू किया. पर अभी तक कोई सफलता हाथ नही लगी.

इसी दौरान नियंत्रण रेखा यानी एलओसी पर भी घुसपैठ की कोशिशें जारी रहीं. पुंछ सेक्टर में भारतीय सेना ने एक घुसपैठ प्रयास को नाकाम कर दिया. इस कार्रवाई में एक आतंकवादी मारा गया. इस घटना से यह साफ होता है कि सीमा पार मौजूद आतंकी नेटवर्क अब भी सक्रिय हैं और भारत में घुसपैठ की कोशिशें कर रहे हैं. हालांकि सुरक्षा बलों की सतर्कता के कारण उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है.

वैसे मई महीने में राष्ट्रीय जांच एजेंसी भी जम्मू कश्मीर में खासी सक्रिय रही. एनआईए ने आतंकवाद के लिए धन जुटाने से जुड़े मामलों में कश्मीर के कई इलाकों में छापेमारी की. जांच एजेंसियों का उद्देश्य आतंकियों के आर्थिक नेटवर्क को कमजोर करना और उनकी मदद करने वाले लोगों की पहचान करना था. सुरक्षा जानकारों का मानना है कि घाटी में आई इस शांति के पीछे कई कारण हैं.

  • पहला कारण सुरक्षा बलों का लगातार आतंकियों पर बढ़ता दबाव है.
  • दूसरा कारण स्थानीय स्तर पर आतंकी संगठनों को मिलने वाले समर्थन में कमी माना जा रहा है.

इसके अलावा आधुनिक तकनीक भी अहम भूमिका निभा रही है. बड्रोन निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और खुफिया सूचनाओं के बेहतर इस्तेमाल से सुरक्षा एजेंसियों की क्षमता बढ़ी है. इससे आतंकियों की गतिविधियों पर नजर रखना पहले की तुलना में आसान हुआ है.

शांति का सबसे बड़ा श्रेय 'कश्मीर' के लोगों को 

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस बदलाव में आम लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है. उनके मुताबिक, स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना स्थायी शांति हासिल करना संभव नहीं है. युवाओं को कट्टरपंथी विचारधाराओं से दूर रखने, रोजगार और विकास योजनाओं को बढ़ावा देने तथा पर्यटन को प्रोत्साहित करने की कोशिशों का भी असर दिख रहा है.

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पहलगाम के बाद टूरिज्म भी बढ़ा 

हाल के महीनों में घाटी में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है. बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर सामान्य गतिविधियां भी तेज हुई हैं. हालांकि, सुरक्षा एजेंसियां अभी भी सतर्क हैं. पहलगाम हमले के बाद टूरिस्ट्स की संख्या में कमी आई थी. लेकिन अब घाटी में वापस से चहल-पहल लौटने लगी है. बाजार पहले से गुलजार होने हैं सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि आतंकवाद का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. फिर भी मई 2026 का महीना जम्मू-कश्मीर के लिए एक सकारात्मक संकेत लेकर आया है. यह दिखाता है कि लगातार प्रयासों और स्थानीय सहयोग से घाटी में शांति की उम्मीद मजबूत हो रही है.

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