- कर्नाटक हाई कोर्ट ने चुनावी हलफनामे की गड़बड़ी पर कांग्रेस विधायक सुब्बारेड्डी का चुनाव रद्द किया था
- सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए सुब्बारेड्डी को विधानसभा सदस्य मानने का निर्देश दिया है
- सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी उम्मीदवार मुनिराजू को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है
कर्नाटक की बागेपल्ली सीट से कांग्रेस विधायक एसएन सुब्बारेड्डी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. 2023 के विधानसभा चुनाव में हलफनामे में कथित गड़बड़ी पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने चुनाव को रद्द कर दिया था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुब्बारेड्डी की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया है.
सुब्बारेड्डी की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और देवदत्त कामथ ने पैरवी की थी. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपील लंबित रहने तक सुब्बारेड्डी को विधानसभा का सदस्य माना जाएगा. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी उम्मीदवार सी. मुनिराजू को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश देते हुए सुनवाई सितंबर 2026 तक टाल दी है.
क्या है पूरा मामला?
2023 के विधानसभा चुनाव में बागपेल्ली सीट से कांग्रेस के सुब्बारेड्डी की जीत हुई थी. उनके खिलाफ बीजेपी उम्मीदवार मुनिराजू ने याचिका दाखिल की थी और उन पर चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने का आरोप लगाया था. इस पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह कहते हुए सुब्बारेड्डी का चुनाव रद्द कर दिया था कि उन्होंने अपनी संपत्तियों का पूरा खुलासा नहीं किया था, जो जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123(1) के तहत 'भ्रष्ट आचरण' की श्रेणी में आता है. हालांकि, हाई कोर्ट ने बीजेपी उम्मीदवार को विजेता घोषित नहीं किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुब्बारेड्डी ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. बीजेपी उम्मीदवार मुनिराजू की ओर से दलील दी गई थी कि सुब्बारेड्डी ने अपने शराब कारोबार का खुलासा नहीं किया था. इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि जब चुनाव नहीं जीत पाते तो ऐसे आधार तलाशे जाते हैं.
इसके अलावा, मुनिराजू की ओर से यह भी कहा गया कि सुब्बारेड्डी ने हॉस्पिटैलिटी बिजनेस का जिक्र किया है लेकिन शराब कारोबार का नहीं. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि खुलासा आय का करना जरूरी है, कारोबार का नहीं. चीफ जस्टिस ने यह भी टिप्पणी की कि अदालतें चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका नहीं निभा सकतीं.
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