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Amalaki Ekadashi Vrat Katha: आमलकी एकादशी पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, इसके बिना अधूरी मानी जाती है पूजा

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: कहा जाता है कि आमलकी एकादशी की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक इसकी व्रत कथा न सुनी या पढ़ी जाए. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ कथा श्रवण करने से ही व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है. ऐसे में पूजा के बाद आप यहां से आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ सकते हैं.

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: आमलकी एकादशी पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, इसके बिना अधूरी मानी जाती है पूजा
आमलकी एकादशी व्रत की कथा | Amalaki Ekadashi Vrat Katha

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: साल में 24 एकादशी आती हैं और हर एक का अपना अलग महत्व है. आज यानी 27 फरवरी को आमलकी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. इसे अमला एकादशी और रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है. मान्यता है कि आंवले के पेड़ में विष्णु जी का वास होता है, इसलिए इस दिन आंवला पूजन और सेवन दोनों शुभ माने जाते हैं. 

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है. श्रद्धालु इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं. श्री हरि की पूजा करते हैं और भक्ति भाव से पूरा दिन बिताते हैं. हालांकि, कहा जाता है कि आमलकी एकादशी की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक इसकी व्रत कथा न सुनी या पढ़ी जाए. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ कथा श्रवण करने से ही व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है. ऐसे में पूजा के बाद आप यहां से आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ सकते हैं. 

आमलकी एकादशी व्रत की कथा | Amalaki Ekadashi Vrat Katha

मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में वैदिक नाम का एक नगर था. वहां राजा चैत्ररथ राज करते थे. वे धर्मप्रिय और प्रजा का हित चाहने वाले शासक थे. उनके राज्य के लोग भी विष्णु भक्त थे और हर एकादशी का व्रत रखते थे. जब आमलकी एकादशी आई तो राजा ने पूरे नगर में पूजा, भजन और रात्रि जागरण का आयोजन करवाया.

उसी समय एक बहेलिया, जो जीव हिंसा करके अपना जीवन चलाता था, भोजन की तलाश में भटकते हुए मंदिर पहुंच गया. उस दिन उसे कुछ भी खाने को नहीं मिला था. थका-हारा वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया. वहां चल रही भजन-कीर्तन और आमलकी एकादशी की कथा को वह चुपचाप सुनता रहा. अनजाने में उसने पूरी रात जागकर बिताई और बिना भोजन के रह गया. इस तरह उससे एकादशी का व्रत हो गया.

अगले दिन जब लोगों ने व्रत खोला, तब उसने भी भोजन किया. लेकिन कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई. उसके पाप कर्मों के कारण उसे कष्ट मिलना चाहिए था, परंतु आमलकी एकादशी के प्रभाव से उसे अगला जन्म राजा विदुरथ के घर मिला. इस जन्म में उसका नाम वसुरथ रखा गया.

वसुरथ बड़ा होकर वीर, धर्मनिष्ठ और विष्णु भक्त बना. एक दिन वह जंगल में रास्ता भटक गया और एक पेड़ के नीचे सो गया. तभी कुछ डाकुओं ने उस पर हमला किया. लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि उनके हथियार वसुरथ पर असर करने की बजाय उन्हीं पर पलट गए और वे मारे गए. तभी आकाशवाणी हुई कि यह सब पिछले जन्म में किए गए आमलकी एकादशी व्रत का फल है और उसकी रक्षा स्वयं भगवान विष्णु ने की है.

इस तरह श्रद्धा से किया गया व्रत कभी व्यर्थ नहीं जाता. माना जाता है कि जो लोग सच्चे मन और भक्ति भाव से आमलकी एकादशी का व्रत रखते हैं, उनके पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है. यह व्रत मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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