दिल्ली में धरना प्रदर्शन का लंबा इतिहास रहा है. आजादी से पहले अंग्रेजों के जमाने में धरना प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं होती थी, मगर उसके बाद भी प्रदर्शन तो होते थे मगर उस वक्त इन प्रदर्शनों का केंद्र पुरानी दिल्ली होता था. तब ये प्रदर्शन कंपनी बाग में होता था. इसे क्वीन गार्डन भी कहा जाता था. यह वही जगह है जहां 1930 में महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के समय भी प्रदर्शन किया गया था.
अब चांदनी चौक में इस गार्डन का नामोनिशान नहीं मिलता मगर इलेक्ट्रॉनिक मार्केट के पीछे अभी भी आपको एक हिस्सा मिल जाएगा जिसे आजाद पार्क कहा जाता है. चांदनी चौक का टाउन हॉल राजनीतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केन्द्र था. आजादी से पहले और बाद में भी यहां कई सभाएं होती रहीं. यहां तक कि आजादी के बाद भी जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी ने चांदनी चौक के टाउन हॉल में सभाएं की थीं. इसके अलावा लाल किला भी एक वक्त में धरना प्रर्दशन के लिए इस्तेमाल किया जाता था.
मगर जैसे-जैसे सत्ता का केंद्र सेंट्रल दिल्ली बनता गया तो धीरे-धीरे प्रर्दशन की जगह दिल्ली के शाहजहांनाबाद यानी चांदनी चौक से निकल कर सेंट्रल दिल्ली पहंचने लगा.
वजह ये थी कि संसद भवन ,राष्ट्रपति भवन और नार्थ ब्लॉक,साउथ ब्लॉक सभी वहीं थे. और ये नए भारत के सत्ता के केंद्र थे इसलिए अपनी आवाज सुनाने लिए नेताओं ने इन्हीं इलाके को चुना.
रामलीला मैदान
रामलीला मैदान भी धरना प्रदर्शन करने की महत्वपूर्ण जगह बना. 70 के दशक मे रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने एक बहुत बड़ी रैली की थी जिसे भारतीय राजनीति के इतिहास में टर्निंग प्वाइंट माना जाता है,जबकि राजनारायण ने वोट क्लब को चुना था जब वो अनशन पर बैठ गए थे.
तब चरण सिंह रैली को संबोधित करने आए थे. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप केवल रामलीला मैदान या वोट क्लब में ही प्रदर्शन कर सकते थे. दिल्ली पुलिस कुछ पुराने अफसर,पीआरवो जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं. उनका कहना है कि 80 के दशक में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सफदरजंग रोड पर रहतीं थीं. उसके बगल के गोलंबर जिसे गोलमेथी चौक भी कहते थे. जो दरअसल सफदरजंग रोड,तुगलक रोड और औरंगज़ेब रोड (अब्दुल कलाम रोड) का जो जंक्शन है. वहां तक प्रर्दशनकारियों को जाने दिया जाता था.
यानी प्रधानमंत्री निवास के एकदम कोने तक. यही नहीं अप्रैल 1967 में जब केंद्रीय गृहमंत्री यशवंत राव चव्हाण थे तब दिल्ली पुलिस के जवानों ने धरना प्रदर्शन किया था. वो भी गृह मंत्री के घर के सामने, बाद में पंजाब पुलिस और बीएसएफ की मदद से इस आंदोलन को खत्म किया गया था.
जेपी की रामलीला मैदान के बाद जब वोट क्लब धरना प्रदर्शन की जगह बनी. तब वहां बड़ी-बड़ी रैलियां की गई. जिसमें 1987 की बाबरी मस्जिद मार्च भी था जो जामा मस्जिद से वोट क्लब तक हुआ था. यह मुस्लिम समुदाय की सबसे बड़ी रैली के रूप में देखा जाता है.
मगर वोट क्लब पर सबसे चर्चित रैली 1988 में भारतीय किसान यूनियन के तहत किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने की थी जिसमें 5 लाख किसान शामिल हुए थे. ये इतनी बड़ी रैली थी कि राजपथ उस वक्त एक हफ्ते तक बंद रहा था.
फिर 1990 में सीपीआई एमएल यानी माले की रैली हुई थी. तब बिहार से बड़ी संख्या में लोग आए थे,उसके बाद 1991 में विश्व हिंदू परिषद ने वोट क्लब पर ऐतिहासिक रैली की थी जिसमें वीएचपी के तमाम संतों के अलावा बीजेपी के सभी नेताओं ने हिस्सा लिया था जिसमें मौजूदा प्रधानमंत्री भी थे.
क्यों बंद गया वोट क्लब?
1993 के बाद वोट क्लब रैलियों के लिए बंद कर दिया गया और जंतर मंतर नया धरना प्रदर्शन का ठिकाना बना.यह जगह छोटी थी इसलिए कम भीड़ से भी काम चल जाता था मगर यह वोट क्लब की तरह नहीं था कि जिसके सामने राष्ट्रपति भवन हो,बगल में संसद और आजू बाजू में नार्थ और साउथ ब्लॉक.मगर जंतर मंतर रामलीला मैदान की तरह दूर भी नहीं था,वैसे बड़ी रैलियों के लिए रामलीला मैदान का भी इस्तेमाल होता रहा.
कैसे निर्माण हुआ था जंतर-मंतर?
जंतर मंतर का निर्माण जयपुर के राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था. पांच जंतर मंतर बनाए गए थे. दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा. मगर अब मथुरा का जंतर मंतर मौजूद नहीं है. यह दरअसल ग्रहों और समय की सटीक जानकारी के लिए बनाया गया था जिसे वेधशाला और सूर्य घड़ी भी कहा गया.
सच ही है जंतर मंतर के प्रदर्शन ने कई नेताओं का समय बदल दिया. कुछ के लिए अच्छा तो कुछ के लिए बुरा. पिछले 33 सालों से जंतर मंतर ही प्रदर्शन का केंद्र रहा है. यहां सबसे प्रसिद्ध प्रदर्शन अन्ना आंदोलन रहा जिसने देश में एक ऐसा माहौल बनाया. इसकी वजह से बाद में मनमोहन सिंह की सरकार चली गई.
वैसे निर्भया वाला प्रदर्शन राजपथ पर हुआ था. जंतर मंतर पर पहलवानों का भी प्रदर्शन हुआ और हाल में कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन. वैसे जंतर मंतर पर हमेशा रोजाना दो तीन प्रदर्शन होते ही रहते थे. मगर जेनजी के प्रदर्शनों के बाद सरकार ने प्रदर्शन की जगह ही बदल दी और अब रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली का बुराडी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान में ही प्रदर्शन या रैलियां हो सकती है.
इस तरह से 33 सालों से प्रदर्शन का प्रतीक रहा जंतर मंतर अब इतिहास बन जाएगा. नए रैली स्थल के बारे में लोग यही कह रहे हैं कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा.
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