एनजीओ को मिलने वाले विदेशी चंदे से जुड़े फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) पर संसद की स्थायी समिति ने मंगलवार को कानूनी विशेषज्ञों और धार्मिक प्रतिनिधियों से मुलाकात की. बैठक में ISKCON, SGPC और रामकृष्ण मिशन जैसे संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए.
बैठक के बाद JPC के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने मीडिया से बात करते हुए बिल को लेकर उठ रहे सवालों पर सफाई दी. संजय जायसवाल ने कहा, 'इस्कॉन और दूसरे संगठनों के प्रतिनिधियों से हमने बात की है. कोई भी फैसला हम सब मिलकर लेंगे.'
संपत्ति जब्त करने के प्रावधान पर उन्होंने कहा कि यह नया नियम नहीं है. उन्होंने कहा, '2010 में भी यह नियम था कि गृह सचिव या प्रिंसिपल सेक्रेटरी राज्य में FCRA कानून के तहत गड़बड़ी पकड़े जाने पर सभी संपत्ति को रख सकते हैं. आज भी उनकी जगह 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' का प्रस्ताव है.'
'यूपीए सरकार में भी ऐसा ही कानून था'
संजय जायसवाल ने UPA सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, 'ये UPA सरकार का FCRA बिल है. UPA सरकार ने ये फैसला किया था कि अगर FCRA में कोई गड़बड़ी होगी तो हम उस राज्य के प्रिंसिपल सेक्रेटरी या होम सेक्रेटरी को सारी संपत्ति दे देंगे.'
उन्होंने कहा कि 'अगर UPA सरकार का ये फैसला था, और आज वही है कि होम सेक्रेटरी या प्रिंसिपल सेक्रेटरी की जगह एक डेजिग्नेटेड अथॉरिटी का प्रस्ताव है. यही प्रस्ताव NDA के समय भी है.'
जायसवाल ने साफ किया कि UPA के समय यह साफ नहीं था कि संपत्ति मिलने के बाद होम सेक्रेटरी या प्रिंसिपल सेक्रेटरी को क्या करना है. उन्होंने कहा, 'चर्चा चल रही है, हम निष्कर्ष पर जरूर पहुंचेंगे. इसमें कोई विरोधाभास नहीं है. कोई भी फैसला हम मिलकर लेंगे.'
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क्या है FCRA?
विदेशी चंदे से जुड़े नियमों को सख्त करने के मकसद से FCRA कानून में संशोधन किया जा रहा है. इस बिल को सरकार मॉनसून सत्र में लेकर आई थी.
FCRA वह कानून है जो यह नियंत्रित करता है कि कोई भारतीय, एनजीओ, ट्रस्ट और कंपनियां विदेश से आने वाले फंड, गिफ्ट या चीजों को किस तरह से ले सकते हैं और उनका उपयोग कर सकते हैं.
इस बिल में 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' बनाने का प्रस्ताव है, जो लाइसेंस रद्द होने पर एनजीओ की संपत्ति को अपने नियंत्रण में ले लेगा, उसका प्रबंधन करेगा या जरूरत पड़ने पर उसे बेच भी सकेगा.
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