- ईरान, इजरायल और अमेरिका युद्ध ने पूरी दुनिया को तेल की किल्लत की तरफ ढकेला है
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर रोक ने दुनिया को हिलाकर रख दिया है
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कुछ दिन पहले कहा था कि वो तेल की उपलब्धता को लगातार चाहते हैं
ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया को तेल की कीमत बता दी. होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की घेरेबंदी ने पूरी दुनिया को तेल की किल्लत की तरफ ढकेल दिया है. दुनिया के कई देशों में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. खाड़ी देशों में ईरान के पलटवार ने तेल से लेकर गैस उत्पादों के निर्यात पर काफी असर डाला है. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सामने आकर कहना पड़ा था वो चाहते हैं कि तेल की आपूर्ति निर्बाध रूप से होती रहे. उन्होंने कहा कि हमें ये नहीं पता कि ईरान को उस तेल का पैसा मिलेगा या नहीं. लेकिन अगर उसे कुछ पैसा मिलता भी है तो वो रकम इस युद्ध में कोई खास फर्क नहीं डालने वाला है. दरअसल, अमेरिका किसी भी पेट्रोलियम उत्पादक देश की चीन के साथ बढ़ती नजदीकी को स्वीकार नहीं कर पाता है. क्योंकि तेल के खेल का उत्पादन भले ही मिडिल-ईस्ट के देशों में सबसे ज्यादा होता हो लेकिन तेल के खेल का असली खिलाड़ी अमेरिका ही है. वो अपने इस साम्राज्य में किसी भी देश का दखल बर्दाश्त नहीं कर पाता है. ईरान से चीन की दोस्ती तो किसी से छिपी नहीं थी. तो जाहिर है चीन का अमेरिका के निशाने पर होने के कई कारण हैं.
उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक, हर जगह अमेरिका नंबर-1
खास बात ये है कि अमेरिका दुनिया में पेट्रोलियम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. 2026 में आई रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका प्रतिदिन 20.1 मिलियन बैरल पेट्रोलियम का उत्पादन करता है. फिर भी अमेरिका ने 2024 में प्रतिदिन 8 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए. अमेरिका के कुल ऊर्जा आयात का 67% क्रूड ऑयल है. यानी प्रतिदिन 5.3 मिलियन बैरल, जबकि रिफाइंड ऑयल प्रोडक्ट 16% हैं. अमेरिका ही दुनिया में पेट्रोलियम का सबसे बड़ा कंज्यूमर भी है. जबकि दुनिया में सबसे ज्यादा तेल भंडार वेनेजुएला के पास हैं. पर वह उत्पादन में 21वें नंबर पर है. वेनेजुएला 65 फीसदी तेल निर्यात कर देता है. वेनेजुएला रिफाइंड पेट्रोलियम में लैटिन अमेरिका में पाचवें नंबर पर है.
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चीन भी जमकर करता है आयात
पर वेनेजुएला का निर्यात में हालात बहुत ही खराब है. दुनिया में सबसे बड़ा पेट्रोलियम निर्यातक सऊदी अरब है. अमेरिका पेट्रोलियम निर्यात की लिस्ट में तीसरी पायदान पर है. लेकिन रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट के निर्यात में अमेरिका नंबर-1 है. चीन पेट्रोलियम उपभोग में दुनिया में नंबर-2 है. लेकिन उत्पादन में दुनिया में नंबर 5 है. दूसरी तरफ क्रूड ऑयल आयात में दुनिया में नंबर-1 है. चीन अपनी ऊर्जा जरूरत का 68 से 69 प्रतिशत आयात करता है, जबकि चीन अपने उत्पादन का 1% ही निर्यात करता है.
मिडिल-ईस्ट में अमेरिका से 20 गुना ज्यादा तेल भंडार
मिडिल ईस्ट के सभी तेल उत्पादक प्रमुख देशों के पास दुनिया के कुल स्थापित तेल भंडार का 55-58% हिस्सा है. जो कि अमेरिका से 18 से 20 गुना ज्यादा हैं. मिडिल ईस्ट के सभी प्रमुख तेल उत्पादक देश मिलकर अमेरिका से करीब 50% अधिक उत्पादन भी करते हैं. मिडिल ईस्ट क्रूड ऑयल का सबसे बड़ा निर्यातक भी है. लेकिन...लेकिन...ध्यान दीजिए की रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट के निर्यात में अमेरिका दुनिया में नंबर-1 है.
सिंगापुर में होती है सबसे ज्यादा तेल की खपत
दुनिया में प्रतिव्यक्ति पेट्रोलियम खपत की लिस्ट में सिंगापुर नंबर वन है. जो भंडार, उत्पादन, निर्यात आदि की लिस्ट में कही नहीं दिखता है. जबकि अमेरिका नौंवे नंबर पर है और आइसलैंड 10वें नंबर है. अमेरिका की प्रतिव्यक्ति पेट्रोलियम खपत इसलिए कम बताई जाती है कि वहां गैस और बिजली का इस्तेमाल ज्यादा है. जबकि ऊर्जा जरूरतों में बदलाव का जो डेटा है उसमें जापान, जर्मनी, ब्राजील और कनाडा आगे हैं. पेट्रोलियम खपत बढ़ने में चीन-भारत आगे हैं. अमेरिका दोनो में कहीं टॉप पर नहीं है.
जानें अमेरिका कहां करता है खर्च
अमेरिका में खाना बनाने, हीटिंग, पानी गर्म करने, उद्योग, पॉवर प्लांट में नेचुरल गैस का इस्तेमाल ज्यादा है. बिजली का उत्पादन भी पूरी तरह से कोयला, गैस, न्यूक्लियर और रिन्यूएब्ल्स पर है. अमेरिका में हल्का स्वीट क्रूड ऑयल पैदा करता है. जबकि अमेरिकी रिफाइनरी हैवी क्रूड के लिए डिजायन हैं. जैसे वेनेजुएला,कनाडा, मिडिल ईस्ट का तेल. इसलिए अमेरिका अपना हल्का तेल निर्यात कर देता है, लेकिन घरेलू रिफानरी चलाने के लिए उसे हैवी क्रूड ऑयल चाहिए.
ऑयल सेक्टर में लाखों लोगों को मिलती है नौकरी
अमेरिका के जीडीपी में ऑयल और नेचुरल गैस इंडस्ट्री का योगदान 8% है. ऑयल और गैस निकालने का हिस्सा जीडीपी में 0.9% है. करीब 10.6 मिलियन नौकरी देता है. अमेरिका के प्राइमरी एनर्जी उपभोग में पेट्रोलियम की हिस्सेदारी 38% है. ट्रांसपोर्ट इकोनॉमी, लॉजिस्टिक्स, एविएशन, डिफेंस, और केमिकल उद्योग अपनी ऊर्जा जरूरत के लिए पेट्रोलियम पर लगभग 100% निर्भर है. दुनिया के कुल व्यापार का 20% हिस्सा पेट्रोलियम का है.
तेल उत्पादक देशों की चीन से दोस्ती पर क्यों भड़कता है अमेरिका?
अब पेट्रोलियम बाजार को लेकर अमेरिका की आक्रामकता का मतलब आपको समझ में आ गया होगा. पेट्रोलियम देशों में चीन के पहुंचते ही अमेरिका क्यों भड़क जाता है ये भी पता चल गया होगा. और ये भी समझ में आ गया होगा कि अगर दुनिया में कोई नया वर्ल्ड ऑर्डर बनाना है तो ऊर्जा जरूरत के नीचे से पेट्रोलियम को बदलना पड़ेगा. उत्पादन का तरीका बदलना होगा. दुनिया में सर्वमान्य करेंसी का नाम बदलना होगा. इसी काम में चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है.
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