- राज ठाकरे की मनसे नगर निगम चुनाव में अपने कमजोर संगठन, कांग्रेस की दूरी और वोट ट्रांसफर फेल होने से असफल रही.
- विकास और प्रशासन के मुद्दों पर फोकस करने वाले बीजेपी-शिंदे गुट की रणनीति मतदाताओं को ज्यादा पसंद आई.
- इस चुनाव नतीजे के बाद राज ठाकरे का राजनीतिक भविष्य सवालों में है, उन्हें अपनी राजनीतिक दिशा बदलने की जरूरत है.
2025 में महाराष्ट्र की राजनीति ने कभी असंभव माने जाने वाले दो भाइयों के मिलन को देखा. करीब 20 साल पहले अगल हो चुके राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक ही मंच पर एक-दूसरे की तारीफ करते और मुंबई नगर निगम चुनाव में साथ लड़ने का संकेत देते हुए नजर आए. दोनों चचेरे भाइयों का राजनीतिक मिलन राज्य की सबसे बड़ी हेडलाइन बनी. उनके समर्थकों को यह उम्मीद थी कि ठाकरे ब्रांड की मुंबई की राजनीति में वापसी होगी और यह मिलन बीजेपी-शिंदे (शिवसेना) गुट को बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में कड़ी चुनौती देगा. लेकिन चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि ठाकरे बंधुओं की जोड़ी जनता को भरोसे में नहीं ले सकी, यानी यह प्रयोग राजनीतिक तौर पर असफल रहा.
महाराष्ट्र की सभी 29 महानगरपालिकाओं के 2869 वार्डों में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) करीब दर्जन भर सीटों पर जीत के करीब है. पिछली बार 2017 के चुनाव में मनसे को मुंबई में भारी नुकसान हुआ था. पार्टी की सीटें 2012 की 28 सीटों से घटकर मात्र 7 सीटों पर आ गई थीं लेकिन बाद में इनमें से 6 पार्षद शिवसेना में शामिल हो गए थे.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका मुख्यालय
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2026 के चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी का यह प्रदर्शन उनकी उम्मीदों के अनुरूप तो बिल्कुल नहीं है. दरअसल अपने मनमुटाव को पीछे रखते हुए वो उद्धव ठाकरे से जा मिले तो मकसद इन चुनावों में अपनी साख को पाना था. तो सवाल ये है कि आखिर राज ठाकरे का उद्धव के साथ जाना क्यों काम नहीं कर पाया? इसमें रणनीतिक चूक कहां हुई? क्या इससे राज ठाकरे का राजनीतिक भविष्य और कमजोर हुआ है? और आगे उनके पास क्या रास्ते बचे हैं?
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यह गठबंधन बना क्यों, मजबूरी या रणनीति?
दरअसल, बीते कुछ सालों से दोनों भाइयों राज और उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है. राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पिछले कई चुनावों में एक भी बड़ी जीत दर्ज नहीं की है. तो उद्धव ठाकरे को शिवसेना के टूटने, सत्ता जाने और संगठन बिखरने का झटका लगा. ऐसे में बीएमसी चुनाव से पहले दोनों के सामने एक जैसी चुनौती थी कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता कैसे बचाई जाए?
ऐसे में नगर निगम चुनाव खासकर BMC (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) इसलिए अहम थे क्योंकि करीब 75000 करोड़ रुपये के बजट वाली यह देश की सबसे अमीर निकाय है और मुंबई की राजनीति का असली पावर सेंटर यहीं हैं. जो बीएमसी चुनाव जीतता है, उसका महाराष्ट्र की राजनीति में असर दिखता है. दोनों ठाकरे बंधुओं को लगा कि अगर वे अलग-अलग लड़ेंगे तो बीजेपी और शिंदे गुट के सामने टिक नहीं पाएंगे इसलिए भावनात्मक एकता और मराठी अस्मिता के नाम पर साथ आने का फैसला हुआ. लेकिन यही फैसला बाद में उनके लिए सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ.
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चुनाव आयोग के खिलाफ 01 नवंबर 2025 को प्रदर्शन करते राज ठाकरे अपने चचेरे भाई उद्धव और एनसीपी (शरद पवार) प्रमुख शरद पवार के साथ
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क्या कांग्रेस का साथ नहीं आना बड़ी विफलता का कारण बना?
इस पूरे प्रयोग की सबसे पहली और सबसे बड़ी कमजोरी थी कांग्रेस का इस गठबंधन से दूर रहना. कांग्रेस ने स्पष्ट किया था कि वो राज ठाकरे के साथ नहीं जाएगी क्योंकि MNS की राजनीति उत्तर भारतीय और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए असहज है और नगर निगम जैसे चुनावों में सामाजिक संतुलन की अहमियत सर्वोपरि मानी जाती है. नतीजा ये हुआ कि विपक्षी वोट पूरी तरह बंट गया. एक तरफ ठाकरे भाई, दूसरी तरफ कांग्रेस और सामने शिंदे गुट के साथ पहले से बेहद मजबूत बीजेपी. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर तीनों साथ होते, तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता था. लेकिन विपक्ष तालमेल नहीं बना पाया और यह ठाकरे गठबंधन की हार की बड़ी वजहों में से एक बना.
जमीनी स्तर पर संगठन कमजोर
दोनों ठाकरे बंधुओं की राजनीति शुरू से ही नेतृत्व केंद्रित रही है, यहां संगठन गौण ही माना जाता रहा है. हालांकि बाल ठाकरे के समय बूथ लेवल नेटवर्क मजूबत था जो अब कमजोर हो चला है. आज स्थिति तो ये है कि वार्ड स्तर पर इनके पास मजबूत प्रत्याशी नहीं हैं. यही कारण है कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के जोश में भारी कमी देखने को मिलती है. इसके मुकाबले बीजेपी और शिंदे गुट के पास नगरसेवकों का एक मजबूत नेटवर्क है. इसके कार्यकर्ता लगातार फील्ड में सक्रिय रहते हैं, यहां बूथ मैनेजमेंट यानी वार्ड स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट पर ध्यान दिया जाता है. यही कारण है कि राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के भाषण मंच से तो गूंजे लेकिन मतदान केंद्रों तक असर नहीं छोड़ सके. शायद ठाकरे बंधुओं को भावनात्मक अपील के साथ-साथ मशीनरी और वार्ड के बूथ स्तर पर मैनेजमेंट पर जोर देना चाहिए था. इस मोर्चे पर वो पीछे रह गए.
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आपसी भरोसा भी कायम नहीं हुआ
दोनों भाइयों ने मंच पर तो हाथ मिला लिए पर उनके समर्थक पुरानी रंजिश भुला नहीं सके. महाराष्ट्र में चुनाव की खबर पर नजर रखने वाले संवाददाताओं ने कई जगहों पर यह देखा कि दोनों गुटों के कार्यकर्ता एक दूसरे के प्रत्याशियों के लिए प्रचार नहीं कर रहे थे. लिहाजा वोट ट्रांसफर न के बराबर हुआ. गठबंधन सिर्फ ऊपर से दिखा, अंदर से खोखला रहा. राजनीतिक जानकार ने इसे 'टॉप लेवल दोस्ती, ग्राउंड लेवल दुश्मनी' कहा जो चुनाव में किसी भी गठबंधन की विफलता का बड़ा कारण बनती है.

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पहचान की राजनीति बनाम नगर निगम का चुनाव
राज ठाकरे की राजनीति लंबे समय तक मराठी अस्मिता, भाषा विवाद और सांस्कृतिक मुद्दों पर केंद्रित रही है. वहीं उद्धव ठाकरे पिछले कुछ सालों में खुद को मध्यमार्गी और विकासवादी नेता के तौर पर पेश कर रहे थे. राज ठाकरे के ये मुद्दे बड़े चुनावों में भी अपनी साख खो चुके हैं तो बीएमसी के चुनाव में तो असली मुद्दे पानी, सड़क, अस्पताल, स्कूल, ट्रैफिक, ड्रेनेज, बिजली- मुंबई की रोजमर्रा की जिंदगी की समस्याएं होती हैं. यहां मतदाता पूछते हैं कि सड़क कब बनेगी? पानी कब आएगा? कचरा कब उठेगा? ट्रैफिक कब सुधरेगा?
यहां भावनात्मक राजनीति काम नहीं करती बल्कि लोग आपके परफॉर्मेंस और भरोसेमंद नेतृत्व की उम्मीद में वोट डालते हैं. बीजेपी और शिंदे गुट ने इन्हीं मुद्दों पर फोकस किया. ठाकरे गठबंधन ने भी इन मुद्दों पर बात की पर उनका नैरेटिव ज्यादातर पहचान और भावनाओं के आसपास घूमता रहा.
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अचानक बनी दोस्ती पर जनता को भरोसा नहीं
राजनीति में गठबंधन तभी काम करता है जब जनता को यह लगे कि वह स्वाभाविक है और लंबे समय तक टिका रहेगा, न कि केवल सत्ता या चुनावी मजबूरी का गठजोड़ हो. राज ठाकरे और उद्व ठाकरे का मिलन वो भी ठीक चुनाव से पहले लोगों को मौकापरस्ती जैसा ही लगा. लोगों के बीच यह सवाल उठा कि जो कल तक एक दूसरे को दुश्मन कहते थे वो आज अचानक भाई-भाई कैसे बन गए? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस गठबंधन की विश्वसनीयता पर लोगों के इस अविश्वास ने इसे गहरा नुकसान पहुंचाया.
दूसरी तरफ बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना राज्य में स्थिर सरकार चला रहे हैं. उन्होंने इन चुनावों में खुद को एक भरोसेमंद और सक्षम विकल्प के तौर पर पेश किया. चुनावी कैंपेन में कहा गया, "हम जोड़ने वाले लोग हैं, तोड़ने वाले नहीं." विपक्ष की आपसी लड़ाई को मुद्दा बनाया.
संजय राउत के पिछले साल जून में दिए उस बयान को नए तर्ज पर उछाला गया जिसमें उन्होंने कहा था कि 'हम भविष्य की ओर देखते हैं, आप कब तक अतीत पर सोचते रहेंगे.' कहा गया कि "ठाकरे बंधुओं की राजनीति अतीत की राजनीति है, भविष्य की नहीं."
बीजेपी-शिंदे गुट का नारा था- भावनाओं का नहीं, काम की राजनीति
एकनाथ शिंदे ने कहा कि 'विरोधी आते हैं, आरोप लगाते हैं और चले जाते हैं. अब हमें इसकी आदत हो गई है. मैं अब आरोपों का जवाब शब्दों से नहीं, हमारे काम से देता हूं', और यह मैसेज खासकर शहरी मध्यम वर्ग और युवाओं में असरदार साबित हुआ.

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राज को ज्यादा हुआ नुकसान
हालांकि चुनावी नुकसान दोनों को हुआ, लेकिन राज ठाकरे को इसका असर ज्यादा गहरा पड़ा. वजह बनी- राज की पार्टी पहले से कमजोर स्थिति में थी. उद्धव के पास अभी भी शिवसेना का बड़ा वोट बेस है. राज के पास हार से उबरने का संगठनात्मक ढांचा नहीं है. हालांकि यह चुनाव राज ठाकरे की राजनीति के लिए बहुत अहम था क्योंकि इसे उनके राजनीतिक पुनर्जन्म का मौका माना जा रहा था लेकिन इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि उनकी पकड़ कमजोर हुई है.
हालांकि राज ठाकरे की विफलता के पीछे उनकी वही पुरानी कमजोरी भी बड़ी वजह मानी जा रही है, जिसे वो अब तक सुधारने में नाकाम रहे हैं. करीब ढाई दशक की उनकी राजनीति में जानकार उनकी रणनीति को अस्थिर मानते रहे हैं क्योंकि कभी वो बीजेपी के करीब आते हैं तो कभी कांग्रेस के विरोध में खड़े हो जाते हैं. कभी हिंदुत्व की बात करते हैं तो कभी सेक्युलर राजनीति की वहीं मराठी मानुष के अस्तित्व की लड़ाई और उत्तर भारतीयों के प्रति उनकी नाराजगी तो जग जाहिर है. इससे उनकी पहचान कन्फ्यूज राजनेता की बनी है जो किसी एक मुद्दे पर नहीं टिक सकता है. बेशक राज ठाकरे एक दमदार वक्ता है लेकिन उनकी चुनावी रणनीति अधूरी है, जो बार बार साबित भी हो रही है.

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राज ठाकरे का राजनीतिक भविष्य क्या?
चुनावी नतीजे से राज ठाकरे की पार्टी में निराशा बेशक बढ़ी है. फिलहाल वो उद्धव के साथ बने ही रहेंगे नहीं तो मौकापरस्ती का आरोप उनकी राजनीतिक करियर पर गंभीर असर छोड़ेगा. हां ऐसी स्थिति में गठबंधन में उनकी भूमिका सीमित हो सकती है. इस नतीजे ने अगले चुनाव में सीटों के बंटवारे पर सौदेबाजी की उनकी ताकत को घटा दिया है. ऐसे में उनके पास वही विकल्प है जो एक हाशिए पर सिमटती राजनीतिक पार्टी को करना चाहिए. उन्हें संगठन को फिर से खड़ा करने पर जोर देना होगा. जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं, युवाओं को तरजीह देते हुए स्थानीय मुद्दों पर काम करना होगा. इससे वोट बैंक बढ़ेगा और वापसी संभव हो सकेगी. अपनी विचारधारा (गैर-मराठी मुद्दे) में बदलाव लाकर रोजमर्रा के मुद्दों जैसे रोजगार, शिक्षा, शहरी विकास आदि पर फोकस करना होगा.
इसके साथ ही उन्हें आगे किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा बनना पड़ेगा, भले ही वहां उनकी भूमिका सीमित ही क्यों न हो. राज ठाकरे को अपनी राजनीतिक दिशा बदलनी होगी अन्यथा उनका राजनीतिक भविष्य और कमतर होता जाएगा. राजनीति में वापसी असंभव भी नहीं है पर सवाल यही है कि क्या राज ठाकरे खुद को नए अवतार में गढ़ पाएंगे?
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