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क्यों हिमंता के ‘हिंदू मुक्त कांग्रेस’ अभियान का हिस्सा बन गए प्रद्युत बोरदोलोई?

असम में भाजपा के ‘कांग्रेस से हिंदू नेताओं को बाहर लाने’ मिशन के तहत मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने वरिष्ठ नेता प्रद्युत बोरदोलोई को पार्टी में शामिल कराया. सरमा द्वारा कांग्रेस को कमजोर करने की इस रणनीति में बोरदोलोई का कदम अहम माना जा रहा है, खासकर चुनावी माहौल में.

क्यों हिमंता के ‘हिंदू मुक्त कांग्रेस’ अभियान का हिस्सा बन गए प्रद्युत बोरदोलोई?
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  • असम में चुनाव से पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रद्युत बोरदोलोई ने पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं.
  • CM हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस से सभी हिंदू नेताओं को भाजपा में लाने की रणनीति स्पष्ट रूप से घोषित की है.
  • कांग्रेस में असम यूनिट के भीतर असहमति और असहजता बढ़ने से कई नेता भाजपा की ओर रुख कर चुके हैं.
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असम में विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने कांग्रेस पर अपनी सबसे तीखी रणनीतिक चोट करते हुए एक और बड़ा चेहरा अपने पाले में कर लिया है. मंगलवार को वरिष्ठ कांग्रेस नेता लोकसभा सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने पार्टी छोड़ी. इसके बाद आज वो भाजपा में शामिल हो गए. यह कदम सीधे तौर पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की उस राजनीतिक मुहिम से जोड़ कर देखा जा रहा, जहां सीएम ने ‘कांग्रेस से हिंदू नेताओं की पूरी सफाई' का ऐलान किया था. हिमंता ने कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस को हिंदू-मुक्त करने की बात कही थी.

हिमंता का खुला ऐलान: 'कांग्रेस के सभी हिंदू नेता BJP में आएंगे'

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा था, 'हम कांग्रेस के सभी हिंदू नेताओं को भाजपा में लेकर आएंगे… 70% कांग्रेस नेता आज भी मुझे फॉलो करते हैं.' उन्होंने दावा किया था कि कई और कांग्रेस नेता जल्द भाजपा में शामिल होने वाले हैं. यह बयान स्पष्ट संकेत था कि हिमंता अपने पुराने दल कांग्रेस की संरचना को लगातार कमजोर करने के अभियान पर हैं.

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क्यों प्रद्युत बोरदोलोई बने इस अभियान का नया चेहरा?

बोरदोलोई का कांग्रेस छोड़ना और भाजपा का दामन थामना कई वजहों से अहम माना जा रहा है.

1. हिमंता-बोरदोलोई की पुरानी पहचान

बोरदोलोई असम की राजनीति में जाना-पहचाना नाम हैं. वे कॉटन कॉलेज और जेएनयू से पढ़े हुए हैं और 2016 तक मार्गेरिटा सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं. राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से माना जाता रहा है कि बोरदोलोई और हिमंता की कार्यशैली में कई समानताएं हैं.

2. कांग्रेस में बढ़ती असहजता

हाल के महीनों में कांग्रेस में असम यूनिट के भीतर नेतृत्व को लेकर असहमति बढ़ी है. इससे पहले भी 2026 की शुरुआत में पूर्व असम कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा और उसके बाद तीन विधायक भाजपा में चले गए.

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3. हिमंता की रणनीति से मेल

हिमंता के अभियान की रणनीति दो दिशाओं में चल रही है. कांग्रेस के हिंदू नेताओं को बाहर लाकर भाजपा की सामाजिक-राजनीतिक पकड़ मजबूत करना. दूसरी और सबसे बड़ी रणनीति है, 'कांग्रेस को चुनाव से पहले सांगठनिक रूप से कमजोर करना.' बोरदोलोई का शामिल होना इन दोनों लक्ष्यों को एक साथ पूरा करता है.

बीजेपी में शामिल होते ही हिमंता का बड़ा संकेत

प्रद्युत बोरदोलोई का सदस्यता कार्यक्रम भी एक राजनीतिक संदेश बनकर सामने आया. प्रद्युत को जॉइन कराते हुए हिमंता ने मुस्कुराते हुए कहा, 'कांग्रेस के जो भी अच्छे नेता बचे हैं, हम उन्हें भाजपा में लाएंगे.' उन्होंने यह भी कहा कि बोरदोलोई को विधानसभा चुनाव लड़वाने का अनुरोध भाजपा की असम यूनिट केंद्र नेतृत्व से करेगी.

कांग्रेस के लिए बढ़ती मुश्किलें

2015 में जब हिमंता ने कांग्रेस छोड़ी थी, तो जल्द ही उनके साथ 9 विधायक भी चले गए थे. 2016 चुनाव में इसका सीधा परिणाम दिखा, जब भाजपा पहली बार राज्य में सत्ता में आई. अब 2026 में वही कहानी दोहराई सी लग रही है.

  • कांग्रेस के चेहरों का पलायन जारी है.
  • हिमंता का विपक्ष को कमजोर करने का ‘मिशन' तेजी से चल रहा है. 
  • भाजपा की वापसी का अभियान आक्रामक है. 

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क्या प्रद्युत का जाना कांग्रेस के 'Hindu leadership vacuum' की शुरुआत है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमंता जिस रणनीति पर चल रहे हैं, उसका लक्ष्य 2026 के चुनाव से पहले कांग्रेस को धार्मिक-सामाजिक प्रतिनिधित्व के मामले में कमजोर करना है. बोरदोलोई जैसे पुराने और जमीनी नेता का जाना इसी रणनीतिक दिशा को और मजबूत करता है.

आसान भाषा में समझें तो प्रद्युत बोरदोलोई का भाजपा में शामिल होना केवल एक दल-बदल नहीं, बल्कि हिमंता बिस्वा सरमा की कांग्रेस को हिंदू नेतृत्व से खाली करने की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है. असम की राजनीति में इसका बड़ा असर पड़ना तय है. और भाजपा आगामी चुनाव में इसी मोमेंटम को भुनाने की तैयारी में है.

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