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मिडिल ईस्ट संकट के बीच वैकल्पिक ऊर्जा पर भारत का फोकस, जानें- सोलर, हाइड्रोजन और न्यूक्लियर पर सरकार की क्या तैयारी?

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत सौर, ग्रीन हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा पर तेजी से काम कर रहा है. 2030-35 लक्ष्यों के जरिए आयात निर्भरता घटाने, स्थिर बिजली सुनिश्चित करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की रणनीति पर सरकार आगे बढ़ रही है.

मिडिल ईस्ट संकट के बीच वैकल्पिक ऊर्जा पर भारत का फोकस, जानें- सोलर, हाइड्रोजन और न्यूक्लियर पर सरकार की क्या तैयारी?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराते जोखिमों के बीच भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर तेजी से दांव लगाना शुरू कर दिया है. पुख्ता सरकारी सूत्रों के मुताबिक, तेल-गैस निर्भरता कम करने के लिए सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा को एक साथ आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम हो रहा है, ताकि संकट की स्थिति में भी देश की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित न हों.

सरकार का बड़ा लक्ष्य 2070 तक नेट-जीरो हासिल करना है, लेकिन इसकी बुनियाद 2030 के टारगेट्स से ही रखी जा रही है. सूत्र बताते हैं कि 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन और परमाणु ऊर्जा में बड़े विस्तार की तैयारी इसी रणनीति का हिस्सा है.

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सौर ऊर्जा: सबसे तेज और सबसे बड़ा विकल्प

सूत्रों के अनुसार, सौर ऊर्जा को भारत की पहली लाइन ऑफ डिफेंस माना जा रहा है. 

पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के तहत 2026-27 तक 1 करोड़ घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने का लक्ष्य रखा गया है. इसके लिए सब्सिडी और आसान लोन की व्यवस्था की गई है. सरकार 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता हासिल करना चाहती है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा का होगा. इसके अलावा, जलाशयों पर फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स जैसे ओंकारेश्वर को भी तेजी से बढ़ाया जा रहा है, जिससे जमीन की कमी की समस्या भी हल हो सके.

क्या फायदा?

  • आयातित तेल-गैस पर निर्भरता कम.
  • घरेलू बिजली उत्पादन सस्ता.
  • संकट के समय विकेंद्रीकृत ऊर्जा (रूफटॉप सोलर) से स्थिर सप्लाई.

ग्रीन हाइड्रोजन: भविष्य का गेमचेंजर

सरकारी सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को ऊर्जा ट्रांजिशन का 'लॉन्ग-टर्म हथियार' माना जा रहा है. 2030 तक 5 MMT ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है. इसके लिए सरकार ने SIGHT कार्यक्रम के तहत 19,744 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज को मंजूरी दी है, जिससे इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण और उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा. भारत सरकार ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत कांडला (गुजरात), पारादीप (ओडिशा) और तूतीकोरिन (तमिलनाडु) के बंदरगाहों को प्रमुख 'ग्रीन हाइड्रोजन हब' के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है. 

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क्या फायदा?

रिफाइनरी, इस्पात और उर्वरक जैसे भारी उद्योगों में क्लीन फ्यूल मिलेगा. क्रूड ऑयल आयात में कमी आएगी. इससे भविष्य में निर्यात का बड़ा अवसर मिलेगा. 

परमाणु ऊर्जा: 24x7 स्थिर बिजली का भरोसा

सूत्रों के मुताबिक, जब सौर और पवन ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती, तब परमाणु ऊर्जा 'बेसलोड सपोर्ट' देती है. इसी वजह से सरकार SHANTI पहल के जरिए इस सेक्टर को मजबूत कर रही है. वर्तमान 8.78 गीगावाट क्षमता को बढ़ाकर 2035 तक 22.4 गीगावाट करने की योजना है. इसमें स्वदेशी PHWR (प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर) तकनीक पर खास जोर दिया जा रहा है.

क्या फायदा?

लगातार और भरोसेमंद बिजली सप्लाई

मौसम पर निर्भरता नहीं

लंबे समय में कम कार्बन उत्सर्जन

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भारत की नई ऊर्जा रणनीति

सरकारी सूत्रों के अनुसार, असली रणनीति इन तीनों को जोड़ने में है. सरकार का प्लान है कि सौर ऊर्जा से बिजली पैदा होगी. उसी बिजली से ग्रीन हाइड्रोजन बनेगा और परमाणु ऊर्जा बैकअप व बेसलोड सप्लाई देगी. यानी एक 'हाइब्रिड एनर्जी मॉडल' तैयार किया जा रहा है, जिससे मिडिल ईस्ट जैसे संकटों का असर भारत पर कम से कम पड़े.

क्यों जरूरी है ये रणनीति?

मिडिल ईस्ट में तनाव का सीधा असर तेल की कीमतों और सप्लाई पर पड़ता है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है. ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत न सिर्फ पर्यावरण बल्कि रणनीतिक मजबूरी भी बन चुके हैं. सरकार की यह तैयारी सिर्फ क्लाइमेट टारगेट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में बड़ा कदम है. जहां तेल संकट, युद्ध या सप्लाई चेन बाधित होने पर भी देश की रफ्तार नहीं रुकेगी.

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