- राष्ट्रपति लूला के भारत दौरे के दौरान निवेश और टेक्नोलॉजी सहयोग बढ़ाने से लेकर कई अहम समझौते संभव हैं.
- उनके साथ आ रहा विशाल शिष्टमंडल व्यापार में विस्तार का संकेत है. जो द्विपक्षीय रिश्ते की अहमियत दर्शाता है.
- भारत-ब्राजील की साझेदारी ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत कर सकती है तो वैश्विक संतुलन में नया अध्याय खोल सकती है.
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा 18 से 22 फरवरी 2026 तक भारत के राजकीय दौरे पर आ रहे हैं. विदेश मंत्रालय के अनुसार वे भारत के निमंत्रण पर आ रहे हैं और 19 से 20 फरवरी को होने वाले AI समिट में भी हिस्सा लेंगे. यह यात्रा सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि आर्थिक, तकनीकी और भू-राजनीतिक लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है. राष्ट्रपति लूला का भारत दौरा सिर्फ एक औपचारिक राजनयिक यात्रा नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में दो बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच रणनीतिक तालमेल का संकेत है. यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक राजनीति बहुध्रुवीय ढांचे की ओर बढ़ रही है और विकासशील देश अपनी सामूहिक आवाज मजबूत करना चाहते हैं. भारत और ब्राजील लंबे समय से दक्षिण दक्षिण सहयोग के समर्थक रहे हैं और अब ये दोनों देश अपने रिश्ते को नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी में लगे हैं.

लूला के दौरे की अहमियत
यह लूला की छठी बार भारत यात्रा है. 2004 में गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के तौर पर वो यहां पहली बार आए थे. जबकि 2023 में आखिरी बार जी20 समिट के दौरान उन्होंने भारत का दौरा किया था. पिछले साल (जुलाई 2025 में) पीएम मोदी ब्राजील के राजकीय दौरे पर गए थे, जो कि पिछले 57 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की ब्राजील की पहली यात्रा थी.
राष्ट्रपति लूला की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया आर्थिक अस्थिरता, सप्लाई चेन संकट, जियो-पॉलिटिकल तनाव और टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है. ऐसे समय में बड़े विकासशील देशों के बीच सहयोग वैश्विक संतुलन के लिहाज से अहम है. भारत की गिनती दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होती है जबकि ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. दोनों देश वैश्विक मंचों पर मिलकर सुधार की मांग करते रहे हैं. यही कारण है कि जानकार इसे केवल द्विपक्षीय दौरा नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण मान रहे हैं.
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सबसे बड़ा बिजनेस मिशन और निवेश संकेत
रिपोर्ट्स के मुताबिक राष्ट्रपति लूला के साथ सैकड़ों कंपनियों का एक विशाल प्रतिनिधिमंडल भारत आ रहा है, यहां 21 फरवरी को बिजनेस फोरम होगा. यह संकेत देता है कि ब्राजील भारत को निवेश और व्यापार विस्तार के बड़े अवसर के रूप में देख रहा है. कुछ रिपोर्ट्स में राष्ट्रपति लूला के साथ आ रही कंपनियों के प्रमुखों की संख्या 260 या उससे भी अधिक बताई जा रही है. ये संख्या दिखाता है कि ब्राजील भारत में व्यापार बढ़ाना चाहता है और अमेरिका और चीन जैसे पारंपरिक बाजारों पर निर्भरता कम करना चाहता है.
ब्राजील की सरकारी व्यापार प्रोत्साहन एजेंसी एपेक्सब्रासील (ApexBrasil) भारत में अपना ऑफिस खोलने की योजना बना चुकी है. यानी ब्राजील, भारतीय बाजार में अपनी स्थाई आर्थिक मौजूदगी चाहता है. भारत और ब्राजील के बीच व्यापार पिछले वर्षों में लगातार बढ़े हैं लेकिन जानकारों की माने तो अब भी इसकी क्षमता पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुई है. लिहाजा अगर दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी, डिजिटल सर्विस और मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा तो व्यापार कई गुना तक बढ़ सकता है.
भारत और ब्राजील के बीच 15 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है. इसे AI समेत अन्य क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ा कर 2030 तक 20 बिलियन डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है. भारत के लिए यह दौरा ऊर्जा सुरक्षा, कृषि सहयोग, एयरोस्पेस और तकनीकी निवेश के लिहाज से अहम है. ब्राजील के साथ मजबूत रिश्ते भारत को लैटिन अमेरिका में रणनीतिक साझेदार दिलाते हैं जहां अब तक चीन की आर्थिक मौजूदगी ज्यादा रही है. इसके अलावा बहुपक्षीय मंचों पर ब्राजील का समर्थन भारत की कूटनीतिक स्थिति मजबूत करता है.
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किन क्षेत्रों में सहयोग की सबसे ज्यादा संभावना
कृषि और खाद्य सुरक्षा: ब्राजील दुनिया के सबसे बड़े कृषि निर्यातकों में शामिल है. सोयाबीन, चीनी, मांस और कॉफी जैसे उत्पादों में उसकी मजबूत पकड़ है. दूसरी ओर भारत कृषि तकनीक और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को आधुनिक बनाने पर जोर दे रहा है. दोनों देशों के बीच बीज अनुसंधान, सिंचाई तकनीक, कृषि मशीनरी और सप्लाई चेन प्रबंधन में सहयोग संभावित है. यह साझेदारी वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकती है.
ऊर्जा और बायोफ्यूल: ब्राजील ने एथेनॉल उत्पादक और बायोफ्यूल तकनीक के अग्रणी के रूप में अपनी पहचान बनाई है. बायोफ्यूल के उत्पादक देश के रूप में ब्राजील का स्थान अमेरिका के बाद दूसरे पायदान पर आता है. हालांकि भारत भी इस मामले में दुनिया में तीसरे पायदान पर है. भारत पेट्रोल में एथेनॉल के इस्तेमाल बढ़ाने की नीति पर काम कर रहा है. इसलिए स्वच्छ ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधन सहयोग दोनों देशों के संबंधों के बीच अहम कड़ी बन सकता है. राष्ट्रपति लूला के दौरे में ऐसे में ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कटौती और जलवायु तकनीक में संयुक्त परियोजनाओं को लेकर इस दौरे में कुछ समझौते सामने आ सकते हैं.
फार्मा और स्वास्थ्यः फार्मा सेक्टर में भारत अव्वल है. यहां की जेनेरिक दवाएं दुनिया भर में सप्लाई की जाती हैं. ब्राजील लैटिन अमेरिका में सबसे अधिक आबादी वाला देश है. ऐसे में 21 करोड़ से अधिक आबादी वाला ब्राजील लैटिन अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में एक बड़ा बाजार है. इस समय भारत का फार्मा निर्यात सबसे अधिक अमेरिका में होता है. जहां भारत अपने फार्मा निर्यात का करीब एक तिहाई हिस्सा भेजता है. अब भारत अपने फार्मा निर्यात को जिन तीन देशों में बढ़ाने पर जोर दे रहा है उनमें से एक ब्राजील है. अन्य दो रूस और नीदरलैंड्स हैं. ब्राजील को भारत अब सबसे अधिक दवा निर्माण, टीकाकरण, मेडिकल उपकरण और डिजिटल हेल्थ सिस्टम में सहयोग करना चाहता है ताकि दोनों देशों को लाभ हो और लोगों को सस्ती दवाएं मुहैया कराई जा सकें.
रक्षा और विमानन: ब्राजील की विमान निर्माता कंपनी एम्ब्राएर (Embraer) भारत के साथ रक्षा और एविएशन सहयोग में रुचि दिखाती रही है. भारत की मेक इन इंडिया नीति विदेशी कंपनियों को संयुक्त उत्पादन के अवसर देती है. ऐसे में अगर रक्षा तकनीक और उत्पादन में समझौते होते हैं तो यह साझेदारी रणनीतिक महत्व की होगी.
टेक्नोलॉजी कूटनीति और AI सहयोगः चूंकि राष्ट्रपति लूला दिल्ली में आयोजित किए जा रहे अंतरराष्ट्रीय AI सम्मेलन में भाग ले रहे हैं, जो यह संकेत देता है कि टेक्नोलॉजी अब कूटनीति का नया आयाम बन चुकी है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और डिजिटल गवर्नेंस ऐसे क्षेत्र हैं जहां सहयोग भविष्य की अर्थव्यवस्था तय करेगा. भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल को वैश्विक स्तर पर साझा करने की कोशिश कर रहा है जबकि ब्राजील डिजिटल इनोवेशन में निवेश बढ़ा रहा है. दोनों देश मिलकर टेक्नोलॉजी मानकों और नियमों पर भी साझी भूमिका निभा सकते हैं.

रणनीतिक साझेदारी को नया स्तर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में बातचीत के बाद कहा कि भारत-ब्राजील रणनीतिक साझेदारी नए शिखर छूने वाली है और दोनों देशों का सहयोग ग्लोबल साउथ के हितों के लिए जरूरी है. भारत और ब्राजील दोनों लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करते रहे हैं. चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद हो या अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं, दोनों देशों का मानना है कि वर्तमान संरचना पुरानी शक्ति संतुलन पर आधारित है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता.
दोनों देश ब्रिक्स समूह के प्रमुख सदस्य हैं और इसे ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने का मंच मानते हैं. इस मंच के जरिए वित्तीय सहयोग, विकास परियोजनाओं और वैकल्पिक वित्त व्यवस्था पर चर्चा होती है. लूला की रणनीति यह रही है कि विकासशील देश मिलकर पश्चिमी प्रभुत्व वाले संस्थागत ढांचे में संतुलन लाएं. भारत भी इसी दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है.
आज दुनिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अन्य बड़ी उभरती शक्तियां खुद को रणनीतिक ध्रुव के रूप में स्थापित करना चाहती हैं. भारत और ब्राजील दोनों किसी एक शक्ति गुट से पूरी तरह नहीं जुड़ते. ये बहुपक्षीय सहयोग और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हैं. राष्ट्रपति लूला का भारत दौरा इस संदर्भ में संतुलन की नीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. हाल के वर्षों में विकासशील देशों की चिंताएं लूला उठाते रहे हैं, उन्होंने कई मौके पर कहा है कि विकासशील देशों को मिलकर अपनी आर्थिक और राजनीतिक आवाज मजबूत करनी चाहिए. ऐसा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करते रहे हैं लिहाजा दोनों नेताओं की सोच मिलती है.
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ब्राजील के लिए क्या है अहम?
ब्राजील की अर्थव्यवस्था को निवेश, निर्यात और रोजगार बढ़ाने की जरूरत है. भारत जैसे विशाल बाजार के साथ साझेदारी ब्राजील के उद्योगों को नए अवसर दे सकती है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय कूटनीति लूला की घरेलू राजनीतिक छवि को भी मजबूत करती है क्योंकि इससे वे खुद को वैश्विक नेता के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं.
कहां हो सकते हैं समझौते, चुनौतियां क्या हैं?
जानकारों के मुताबिक राष्ट्रपति लूला भारत के साथ कई अहम समझौते कर सकते हैं. इनमें व्यापार करने में आसानी, ऊर्जा को लेकर साझेदारी, फार्मा अनुसंधान में सहयोग, रक्षा उत्पादन परियोजनाएं और शिक्षा एवं विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग हो सकते हैं. इन समझौतों ने आकार लिया तो दोनों देशों की दोस्ती दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.
हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की दिशा में कुछ ऐसी बाधाएं भी हैं जो चिर-स्थायी है. इसमें दोनों देशों के बीच दूरी का अधिक होना शामिल है जो लॉजिस्टिक्स लागत को बढ़ाता है. साथ ही दोनों देशों में बिजनेस को लेकर नियमों में अंतर का होना भी एक-दूसरे के देश में निवेश करने वाली कंपनियों के लिए शुरुआती चुनौती बन सकती हैं. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं भी बड़े निवेश फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं. हालांकि दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुखों की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ये बाधाएं तात्कालिक हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है.
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